देस-परदेस : ‘ट्रंप-टैंट्रम’ के बाद यूरोप से ‘मदर ऑफ ऑल डील्स!’

Story by  प्रमोद जोशी | Published by  [email protected] | Date 27-01-2026
Around the World: After the 'Trump Tantrum,' a 'Mother of All Deals!' from Europe!
Around the World: After the 'Trump Tantrum,' a 'Mother of All Deals!' from Europe!

 

fप्रमोद जोशी

गणतंत्र दिवस की परेड एक तरफ भारत की सांस्कृतिक-विविधता और सामरिक शक्ति का प्रदर्शन करती है, वहीं विदेश-नीति की झलक भी पेश करती है. कम से कम इस साल ऐसा ही हुआ है. इस साल मुख्य अतिथि के रूप में यूरोपीय संघ को बुलाया गया. यह पहला मौका था, जब 27 देशों के संघ को मुख्य अतिथि बनने का आमंत्रण दिया गया. आज 27 जनवरी को नई दिल्ली में यूरोपीय संघ के साथ एक व्यापार समझौते पर दस्तखत होने जा रहे हैं.

ईयू का प्रतिनिधित्व, यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय कौंसिल के प्रेसीडेंट एंटोनियो कोस्टा ने किया. उर्सुला वॉन डेर लेयेन, जहाँ जर्मनी की रक्षामंत्री रह चुकी हैं, वहीं भारतीय मूल के कोस्टा पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री हैं.
स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक फोरम में शिरकत करते हुए उर्सुला वॉन डेर लेयेन कह चुकी हैं कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ होने जा रही है.

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रक्षा और रणनीतिक भी

यह केवल व्यापार समझौता ही नहीं होगा, बल्कि रक्षा और दूसरे रणनीतिक मसलों पर भी सहमतियाँ बनने जा रही हैं. उर्सुला ने कहा कि यूरोप, अरब प्रायद्वीप के रास्ते महाद्वीप को भारत से जोड़ने वाले एक नए व्यापारिक गलियारे में निवेश करेगा. 
इस प्रस्तावित व्यापार मार्ग को भारत–पश्चिम एशिया–यूरोप आर्थिक गलियारा नाम दिया गया है. इसे 2023 में अमेरिका और खाड़ी देशों के समर्थन से घोषित किया गया था. ग़ज़ा में इसराइल के सैन्य अभियान के बाद इस पर काम ठहर गया है. 
बहरहाल दोनों पक्षों के बीच 24 मुद्दों पर स्पष्ट और स्वीकार्य सहमति बनने के बाद ही मुक्त व्यापार संधि का रास्ता साफ होगा.

उत्पादों का कारोबार, उत्पत्ति का बिंदु, बौद्धिक संपदा, पारदर्शिता, सरकारी खरीद के नियम, छूट, नियामक ढाँचे, पूंजी के आवागमन-नियम कायदे और विवादों का हल जैसे मुद्दे इसमें शामिल होंगे.इसका मतलब है कि भारत को भी कई प्रकार के आर्थिक-सुधार करने होंगे, क्योंकि पुरानी ‘कमांड इकोनॉमी’ के बहुत से अवशेष अब भी खत्म नहीं हुए हैं.    वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है. 

दो दशक के प्रयास

लगभग दो दशक की लंबी और कठिन बातचीत के बाद हो रहे इस समझौते को बहुत अहमियत दी जा रही है. यह समझौता पिछले चार साल में भारत का नौवाँ फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफ़टीए) होगा. इससे पहले भारत ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड और कुछ दूसरे देशों के साथ समझौते कर चुका है.

ईयू के लिए यह मर्कोसुर व्यापार समूह (दक्षिण अमेरिकी ट्रेडिंग ब्लॉक) के साथ हुए हालिया समझौते के बाद अगला बड़ा क़दम होगा. मर्कोसुर दक्षिण अमेरिका का एक क्षेत्रीय व्यापार समूह है. इसमें ब्राजील, अर्जेंटीना, उरुग्वे, पैराग्वे जैसे देश शामिल हैं.

यूरोपीय संघ 27 यूरोपीय देशों का राजनीतिक और आर्थिक संघ है. 31 जनवरी 2020 को यूनाइटेड किंगडम के अलग होने के बाद, इसमें अब 27 सदस्य राष्ट्र हैं, जो साझा आर्थिक और राजनीतिक नीतियों का पालन करते हैं. यह एक बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में कार्य करता है. महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि पिछले साल भारत और यूके के बीच भी व्यापार समझौता हो चुका है. ये समझौते ऐसे मौके पर हुए हैं, जब अमेरिका के साथ हमारा समझौता ‘कुछ’ कारणों से अटका पड़ा है. 

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अमेरिका पर दबाव

केवल समझौता ही नहीं अटका है, बल्कि अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा है. ईयू के साथ समझौता होने के बाद अमेरिका पर भी दबाव पड़ेगा. इसके दो कारण हैं. एक, अमेरिका और यूरोपीय देशों के रिश्तों में कड़वाहट आ रही है, दूसरे भारतीय बाजारों में यूरोपीय सामग्री का प्रवेश होगा, जिससे अमेरिकी सामान के रास्ते में रुकावटें आएँगी. 

जैसे ही यूरोपीय संघ के नेता दिल्ली पहुँचे और व्यापार समझौते की घोषणा की, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका द्वारा भारत की रूसी तेल की खरीद पर लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ को हटाने का एक रास्ता है. इधर रविवार को विदेशमंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी संसद के प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत-अमेरिका संबंधों पर चर्चा की. प्रतिनिधिमंडल में अमेरिकी सांसद माइक रॉजर्स, एडम स्मिथ और जिमी पैट्रोनिस शामिल थे. बैठक के दौरान भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद थे. राजदूत गोर ने कहा कि बातचीत सुरक्षा, व्यापार और प्रौद्योगिकी सहयोग सहित प्रमुख क्षेत्रों में भारत-अमेरिका साझेदारी को मजबूत करने पर केंद्रित थी.

टैरिफ हटेगा?

अमेरिकन डिजिटल राजनीतिक पत्रिका ‘पोलिटिको’ से एक साक्षात्कार में, बेसेंट ने कहा, हमने रूसी तेल खरीदने के लिए भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया है. इस वजह से भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद कम कर दी है. इसलिए, यह एक सफलता है..., पर 25 प्रतिशत रूसी तेल टैरिफ अभी जारी है। मुझे लगता है कि उसे हटाने का एक रास्ता है. 

इसके साथ ही उन्होंने यूरोपीय देशों पर कटाक्ष किया. उन्होंने कहा, ...हमारे यूरोपीय मित्रों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि वे भारत के साथ इस बड़े व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहते थे. यूरोप भी डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों के कारण भारी दबाव में है. यूरोप पहले से ही यूक्रेन पर रूसी हमले के कारण मुश्किल में था और अब ट्रंप ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़े की बात कर रहे हैं. 

ट्रंप ने धमकी दी है कि ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़े का जो भी देश विरोध करेगा, उस पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ़ लगेगा. उधर रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने सोशल मीडिया एक्स पर 18 जनवरी को लिखा, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन मतलब डेनमार्क को फिर से छोटा करो, यूरोप को फिर से ग़रीब बनाओ. अक्ल के दुश्मनो, यह बात क्या अब आपको समझ में आई?

भू-राजनीतिक महत्त्व

भारत और यूरोप के संबंधों का एक आर्थिक पहलू है और दूसरा भू-राजनीतिक. अमेरिका की वैश्विक-भूमिका कम होने के साथ दुनिया के देश अपने हितों की रक्षा के रास्ते खोज रहे हैं. यूरोपीय संघ (ईयू) भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार समूह है. वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2023–24 में दोनों के बीच कुल व्यापार 137.4 अरब डॉलर का रहा. यूरोपीय आयोग की वैबसाइट के मुताबिक 2023 में ईयू भारतीय उत्पादों का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार बना. 
उस वर्ष भारत ने अपने कुल उत्पादों का 12.2 फीसदी हिस्सा यूरोपीय बाजार तक पहुँचाया. नकदी में इस द्विपक्षीय कारोबार का मूल्य करीब 124 अरब यूरो आँका गया. 

उसी अवधि में यूरोपीय संघ ने भारत में सिर्फ अपने 2.2 फीसदी उत्पाद बेचे. हाल के बरसों में भारत यूरोपीय संघ के सदस्य देशों, जर्मनी, स्पेन, बेल्जियम, नीदरलैंड्स और पोलैंड को अच्छी खासी मात्रा में निर्यात कर रहा है.सर्विस सेक्टर में 2020 में दोनों पक्षों के बीच 30.4 अरब यूरो का कारोबार था, जो 2023 में बढ़कर 59.6 अरब यूरो हो गया. दोनों पक्ष अब इन संख्याओं को मुक्त व्यापार समझौते के जरिए कई गुना बढ़ाना चाहते हैं.

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दो अरब लोगों का बाजार

यूरोपीय संघ के लिए भारत के साथ क़रीबी व्यापारिक रिश्ते इसलिए अहम हैं क्योंकि भारत की आर्थिक ताक़त तेज़ी से बढ़ रही है. दावोस में वॉन डेर लेयेन ने कहा था कि यूरोपीय संघ और भारत साथ आते हैं तो दो अरब लोगों का एक विशाल मुक्त बाज़ार बनेगा, जो वैश्विक जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा होगा. 

इस समझौते को पूरी तरह लागू करने के पहले यूरोपीय संसद की मंज़ूरी ज़रूरी होगी. यूरोपीय संघ अभी तक भारत से मुख्य रूप से मशीनरी और उपकरण, रसायन, धातु, खनिज उत्पाद और वस्त्र आयात करता है. वहीं, वह भारत को मुख्य रूप से मशीनरी और उपकरण, परिवहन उपकरण और रसायन निर्यात करता है.

भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 2023 में बढ़कर 140.1 अरब यूरो हो गई, जो 2019 में 82.3 अरब यूरो थी. इससे यूरोपीय संघ भारत में अग्रणी विदेशी निवेशक बन गया है. वहीं, यूरोपीय संघ में भारत का एफडीआई 10.3 अरब यूरो था.

भारत के लिए यूरोपीय संघ पहले से ही उसका सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है. व्यापार समझौते के कारण वस्त्र, दवाएँ, इस्पात, पेट्रोलियम उत्पाद और मशीनरी जैसे प्रमुख निर्यात पर टैरिफ़ कम होंगे और अमेरिकी टैरिफ़ बढ़ने के कारण भारतीय कंपनियों को जो नुकसान हुआ है, उसकी कुछ भरपाई होगी. 

संवेदनशील मसले

समझौते की रूपरेखा सामने आने के बाद ही पता लगेगा कि क्या हो सकता है, अलबत्ता हमारे लिए कृषि और डेयरी उत्पाद संवेदनशील मसले हैं. भारत में किसान एक बड़ा वोट बैंक हैं, जहाँ लाखों छोटे किसान दो हेक्टेयर से कम भूमि के मालिक हैं.

यूरोप के लिए बौद्धिक संपदा संरक्षण (इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी प्रोटेक्शन) बड़ा मुद्दा है. वह बेहतर डेटा सुरक्षा और सख़्त पेटेंट नियम चाहता है. यूरोप की ओर से इस साल लागू किया गया नया कार्बन टैक्स, जिसे सीबीएएम कहा जाता है, भी बातचीत में एक बड़ी अड़चन है.

दोनों पक्षों का मानना है कि ये मुक्त व्यापार समझौता, भारत और यूरोपीय संघ के दो अरब लोगों को फायदा पहुँचाएगा. यूरोपीय संघ के 27 देश फिलहाल भारत के साथ अपनी राष्ट्रीय नीतियों के तहत कारोबार करते हैं. वहीं नई दिल्ली को भी हर यूरोपीय देश के साथ टेलर मेड समझौते करने पड़ते हैं.

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से दोनों पक्ष एक जैसे नियम कायदों से आपसी कारोबार कर सकेंगे. इस वक्त यूरोप की करीब 6,000 कंपनियां भारत में हैं. नई दिल्ली को कई मामलों में यूरोपीय तकनीक और हुनर की जरूरत है, वहीं यूरोप को ऐसे बड़े और विकसित होते बाजार की जरूरत हैं, जहाँ उसके उत्पादों और तकनीकों को मुनासिब दाम मिल सके.

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आठ साल ठंडे बस्ते में 

भारत, 1962 में यूरोपीय समुदाय के साथ राजनयिक रिश्ते स्थापित करने वाले शुरुआती देशों में था. इसके बाद 1994 में ईयू-इंडिया सहयोग समझौते पर भी दस्तखत हुए. 2004 में इसे अपग्रेड कर ‘रणनीतिक साझेदारी’ का नाम दिया गया. 
इसके बाद 2007 में दोनों पक्षों ने कारोबार और निवेश में द्विपक्षीय समझौते के लिए वार्ताएं शुरू कीं. 15 दौर की बातचीत का नतीजा कुछ नहीं निकला. 2013 में यह बातचीत पूरी तरह थम गई.

आठ साल ठंडे बस्ते में रहने के बाद मई 2021 में दोनों पक्षों ने ‘संतुलित, महत्वाकांक्षी, समग्र और दोनों के लिए लाभकारी’ कारोबारी समझौते को लक्ष्य बनाकर फिर बातचीत शुरू की. यूरोपीय आयोग और नई दिल्ली ने लक्ष्य रखा कि डील भारत के 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले कर ली जाएगी. ऐसा हो नहीं पाया, पर अब यह होने जा रहा है.

 

रूस पर निर्भरता कम 

 

साझेदारी में समुद्री सुरक्षा, साइबर मुद्दे, हाइब्रिड खतरे, लचीलेपन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी, संगठित अपराध और संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों में सहयोग और शांति अभियानों, अप्रसार और निरस्त्रीकरण, अंतरिक्ष सुरक्षा और रक्षा में सहयोग के क्षेत्र शामिल होंगे. 

यूरोपीय संघ के साथ सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर करने वाला भारत. एशिया का तीसरा देश होगा, अन्य दो देश जापान और दक्षिण कोरिया हैं.यूरोप चाहता है कि भारत की रूस पर निर्भरता कम हो. यह निर्भरता केवल ऊर्जा के मामले में ही नहीं है, बल्कि रक्षा उपकरणों के मामले में भी है. पिछले कुछ वर्षों में भारत ने फ्रांस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है. अब जर्मनी के साथ पनडुब्बी निर्माण का समझौता भी होने जा रहा है. 

हाल में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भारत आए थे. गत 12 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने कहा, 27 जनवरी को भारत-यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन में एक नई सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर करेंगे. 
उन्होंने कहा, हम रक्षा उद्योग सहयोग को भी बढ़ाना चाहते हैं. भारत संप्रभु राष्ट्र है और खरीद के बारे में अपनी पसंद खुद तय करेगा. लेकिन एक बात स्पष्ट है: यूरोप एक विश्वसनीय भागीदार है, रूस नहीं.

( लेखक हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)

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