राकेश चौरासिया
इस साल 2024 में 25 मार्च को रंग खेलने वाली होली है, जिसे धुलेंडी होली कहते हैं. इसके एक दिन पहले होलिका दहन होगा. फागुन मस्ती भरा महीना और त्योहार भरा है. फागुन माह के प्रारंभ से ही फाग-फगवा गायन शुरू हो जाता है. मगर इन दिनों रमजान का महीना चल रहा है, जो इबादत का महीना है और मुस्लिम भाईयों के रोजे यानी व्रत-उपवास चल रहे हैं. इसलिए होली के दौरान रोजेदारों की भावना का सम्मान करना हम सभी एक सामाजिक जिम्मेदारी है.
होली रंगों का त्योहार है, जो खुशी, उत्साह और भाईचारे का प्रतीक है. यह एक ऐसा त्योहार है, जिसे सभी धर्मों और समुदायों के लोग मिलकर मनाते हैं. होली में हंसी-ठिठोली, बड़जोरी, रंग-गुलाल-अबीर और जबरन रंग लगाने को भी सामाजिक स्वीकार्यता है. हालांकि किसी को जबरन रंग लगाना कानून का उल्लंघन है और दंड का विधान भी है, क्योंकि यह किसी की निजता का उल्लंघन है.
सवाल यह है कि होली के दौरान रोजेदारों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिस पर हमें विचार करना चाहिए. रोजे के दौरान मुस्लिम भाई-बहन पानी या रंगों का प्रयोग नहीं करते हैं. उन पर रंग डालने से उनका रोजा खंडित हो सकता है. रंग अगर उनके मुंह चला गया, तो यह रोजा टूटने जैसा पाप हो जाएगा. इस पाप में आप बराबर के भागीदार होंगे.
भारतीय संस्कृति सभी के विश्वासों और भावनाओं का सम्मान करने की अवधारणा पर आधारित है. कोई किसी भी मत या धर्म का पालन करता हो, लेकिन एक केंद्रीय बात यह है कि सभी एक ही ईश्वर की पूजा या इबादत करते हैं. हम जिसे किसी अन्य रूप में पूजते हैं, कोई उसी की ही अन्य स्वरूप या निराकार स्वरूप में इबादत कर सकता है.
इसका शास्त्रोकत प्रमाण भी हैः
‘‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’’ - ऋगवेद (1ः164ः46). भावार्थ - सत्य एक है, पर ज्ञानीजन उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं.
रोजेदारों का सम्मान
रोजेदारों के साथ मिलकर त्योहार मनाएं
यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि सभी धर्मों का सम्मान करना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है. होली के दौरान रोजेदारों का सम्मान करके हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं.
(यह लेख धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं है. इसका उद्देश्य लोगों को रोजेदारों के प्रति संवेदनशील बनाने और होली के दौरान उनके प्रति उचित व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित करना है.)
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