हिंदी दिवसः हिंदी के लिए दो दबाएं

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] • 1 Years ago
हिंदी के लिए दो दबाएं, अंग्रेजी अभी भी नंबर एक

देशहित । मंजीत ठाकुर

फोन पर कभी किसी कंपनी के कस्टमर केयर में बात करते हों तो आपको हिंदी में बात करने के लिए दो दबाना होगा. यह स्थिति हिंदी पट्टी में भी है. अंग्रेजी अभी भी नंबर एक है. रहेगी ही. यह सवाल सिर्फ हिंदी की अस्मिता का नहीं है, यह हिंदी के साथ बुनियादी तौर पर जुड़ी कुछ समस्याओं का है.

हिंदी के साथ कई समस्याएं हैं. पहली समस्या इसके दिवस का मनाया जाना है. अंग्रेजी भाषा का भी कोई दिवस है इस बारे में मुझे ज्ञात नहीं. हो तो समझदार लोग ज्ञानवर्धन करें. कुछ वैसे ही जैसे ‘महिला दिवस’तो मनाया जाता है पर संभवतया कोई मर्द दिवस नहीं है. एनीवे.

हिंदी के साथ दूसरी समस्या यह है कि हिंदी में सामान्य पाठक वर्ग का घनघोर अभाव है. पढ़ते वही हैं जो लिखते हैं. यानी या तो साहित्य या राहित्य जो भी मुमकिन हो लिख डालते हैं. हिंदी क्षेत्र का सामान्य छात्र हिंदी में लिखे को पढ़ना प्रायः अपमानजनक, या अति अपमानजनक या घोर अपमानजनक मानता है. इसको आप पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण की तरह अधिक इंटेंस मानते चलें. वह अंग्रेजी में चेतन भगत पढ़ लेगा पर हिंदी में अज्ञेय या ऐसे ही किसी दूसरे लेखक का नाम सुनकर हंस देगा.

बचे हिंदी के राइटर्स. उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढते हैं (गलत नहीं है अंग्रेजी पढ़ना) अंग्रेजी बोलते हैं (यह भी गलत नहीं) अंग्रेजी से मुहब्बत करते हैं (किसी भी भाषा से मुहब्बत करें गलत नहीं है) पर अपने ही हिंदी में लिखने वाले पिता के लेखन को कुछ तुच्छ-सा, घटिया या दोयम दर्जे का या अत्यधिक शास्त्रीय समझते हैं.

 

तो स्मार्ट फोन पर इंस्टाग्राम के रील्स देखने में ज्यादा दिलचस्पी हिंदी प्रदेश के बालको में है (अन्यों में भी होगी, पर बात हिंदी की हो रही) सो उनका जरा भी मन हिंदी पढ़ने में नहीं लगता.

लगे भी कैसे, हिंदी में लिखने का मतलब सीधे-सीधे साहित्य वह भी दुरूह भाषा का लगा लिया जाता है. जो हिंदी में लिखता है वह क्या सिर्फ कविता लिखेगा, या कहानी? या उपन्यास? यह मानिए कि हिंदी में स्तरीय नॉन-फिक्शन खासकर इतिहास, भूगोल, राजनीति पर लेखन कम होता है. जो होता है उसकी कीमत औसत हिंदी पाठक की जेब से बाहर की होती है. इसलिए हिंदी वाले जो लोग पढ़ना चाहते हैं, वह खरीदना नहीं चाहते. वह चाहते हैं रिपब्लिक डे परेड या प्रगति मैदान के ट्रेड फेयर के पास की तरह किताब भी उनको मुफ्त में मिल जाए.

एक अन्य बड़ी समस्या भाषा की है. हिंदी के ज्यादातर लेखक ऐसी भाषा लिखते हैं (मेरा मतलब दुरूह से ही है) कि सामान्य पाठक सर पकड़कर बैठ जाता है. (ऐसी समस्या अंग्रेजी में नहीं है) हिंदी के विरोधी ज्यादा हैं इसलिए हिंदी में सरल लिखने का आग्रह टीवी और डिजिटल माध्यम में अधिक रहता है. यह आग्रह कई बार दुराग्रह तक चला जाता है. बाकी, देश में 3 फीसद अंग्रेजी बोलने वाले लोगों को सर्व करने वाले अंग्रेजी मीडिया में मीडियाकर्मियों की तनख्वाह की तुलना हिंदी वालों से कर लें तो माजरा समझ में आ जाएगा.

अंग्रेजी में फां-फूं करने वाले छात्र भी इंटरव्यू में शीर्ष पर बैठते हैं. बाकी देश में हिंदी की स्थिति क्या है यह वैसे किसी बालक से पूछिएगा जो हिंदी माध्यम से यूपीएससी वगैरह की परीक्षा में बैठता है. यूपीएससी में हिंदी की स्थिति वैसी ही है जैसे हिंदी फिल्मों में अमरीश पुरी के सामने मिमियाती हुई नायिकाओं को होती थी.

खैर, शुक्रिया कीजिए हिंदी सिनेमा का कि हिंदी का प्रसार किया. टीवी का भी. आखिरी बात, ऊंचे दर्जे के साहित्यकारों ने हिंदी के प्रसार के लिए कुछ भी नहीं किया है. हो सकता है समृद्धि आई हो हिंदी के खजाने में. पर प्रसार तो नहीं हुआ. फिर आजकल, नई वाली हिंदी की आवक भी है.

नई हो, पुरानी हो, तमिल, तेलुगू, बंगाली, बिहारी, मैथिली, ओडिया... चाहे जिस भी लहजे में हो, हिंदी, हिंदी ही है. रहेगी. हो सकता है अगले 50 साल में हिंदी विलुप्त हो जाए. कम से कम लिपि तो खत्म हो ही जाए. लेकिन तब तक अगर बाजार ने इसे सहारा दिए रखा तो चलती रहेगी, चल पड़ेगी. तब तक के लिए हैप्पी हिंदी डे डूड.