Making history by writing with her feet: Juha, a Class 12 topper, dreams of becoming a judge.
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
जिंदगी में चुनौतियां हर किसी के सामने आती हैं, लेकिन कुछ लोग उन्हीं चुनौतियों को अपनी ताकत बना लेते हैं। जुहा राशिद ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल हैं। जन्म से ही हाथ और पैर नहीं होने के बावजूद जुहा ने न सिर्फ चलना सीखा, बल्कि अपने पैरों की उंगलियों से लिखना सीखा, पढ़ाई जारी रखी, घर के रोजमर्रा के काम खुद करना सीखा और अब 12वीं कक्षा की परीक्षा में स्पेशल कैटेगरी में जिला स्तर पर टॉप कर अपनी अलग पहचान बनाई है। उनकी कहानी केवल संघर्ष की नहीं, बल्कि परिवार के सहयोग, आत्मविश्वास, मेहनत और जिंदगी को पूरी तरह जीने के जज्बे की कहानी है।
अपनी माँ के अटूट समर्थन से, ज़ुहा ने सिर्फ़ अपने पैरों का इस्तेमाल करके लिखना, खाना बनाना, सिलाई करना और अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीना सीखा। आज, उसने 10वीं में 83% और 12वीं में 78% अंक हासिल किए हैं, कई सम्मान पाए हैं, और वह वकील बनकर उन लोगों के लिए आवाज़ उठाना चाहती है जिन्हें समाज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता है।
जुहा बताती हैं कि उनके जन्म के समय परिवार के लिए वह बेहद भावुक और मुश्किल दौर था। उन्होंने अपनी मां से बचपन में एक सवाल पूछा था, जिसने उनकी मां को भावुक कर दिया था। जुहा कहती हैं, मैं अम्मी से पूछा करती थी कि अम्मी, सबके हाथ हैं, मेरे हाथ क्यों नहीं हैं?” इस सवाल पर उनकी मां रो पड़ती थीं। लेकिन यही सवाल आगे चलकर जुहा के जीवन की सोच को बदलने वाला साबित हुआ। जुहा के मुताबिक, उन्होंने धीरे-धीरे यह समझना शुरू किया कि उन्हें अपनी जिंदगी को दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी क्षमताओं के साथ स्वीकार करना है। वह कहती हैं, “मैंने सोच लिया था कि इस क्वेश्चन से कुछ नहीं होगा और अम्मी को अब नहीं रुलाना। अब अम्मी को बस खुश रखना है। जैसे भी अम्मी खुश रहें। मुझे ऐसे खुद जीना है और खुलकर जीना है, जिससे मेरी अम्मी-अब्बू खुश रहें।”
जन्म के बाद लोगों ने कहा- यह ज्यादा दिन नहीं जिएगी
जुहा के जीवन का शुरुआती दौर बेहद कठिन था। वह बताती हैं कि उनके जन्म के बाद कुछ लोगों ने परिवार को यहां तक कह दिया था कि बच्ची ज्यादा दिन नहीं जिएगी। उनकी मां को सलाह दी गई कि उसे दूध पिलाते समय ही मार दें। जुहा कहती हैं, “सबसे बड़ा चैलेंज तो मेरे लिए चलना ही था, क्योंकि लोग बोल रहे थे कि ये तो मर जाएगी पैदा होते ही और कुछ कह रहे थे कि इसको मार दो। मेरी अम्मी से कह रहे थे फीड कराते वक्त इसको मार देना और यह चल भी नहीं पाएगी। चार दिन की जिंदगी है इसकी।”
लेकिन जुहा की मां ने लोगों की बातों को स्वीकार करने के बजाय अपनी बेटी को आगे बढ़ाने का फैसला किया। उन्होंने जुहा को चलना सिखाया। जुहा बताती हैं कि सामान्य बच्चों की तरह उनके लिए चलना सीखना संभव नहीं था, क्योंकि उनके हाथ नहीं थे। वह गिरती थीं और चोट लगती थी। “मेरी अम्मी ने मुझे चलना सिखाया। मैं गिरती थी। मेरी ठोड़ी फटती थी। क्योंकि बच्चा हाथ पकड़कर चलना सीख लेता है। मेरे हाथ भी नहीं थे। मेरी अम्मी मुझे कमर से पकड़कर चलवाती थीं। मैं गिर जाती थी, मेरी ठोड़ी फटती थी। फिर ऐसे गिरते-गिरते मैंने चलना सीखा,” जुहा बताती हैं।
चलना सीखने के बाद भी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। उन्होंने अपने पैरों की उंगलियों की मदद से लिखना सीखा। एक बार पेंसिल शार्प करते समय उन्हें गंभीर चोट भी लगी। जुहा बताती हैं, “पैर से उंगली से पकड़कर मैंने लिखना सीखा। एक बार मैं पेंसिल शार्प कर रही थी तो मेरी नीप अंदर घुस गई थी। बहुत ज्यादा ब्लीडिंग हुई थी और मैं रो रही थी, क्योंकि जब भी मैं कुछ काम करती थी, पहले चोट ही लगती थी।”
इसके बावजूद उन्होंने किसी काम को छोड़ने का फैसला नहीं किया। उनकी मां हमेशा उन्हें प्रोत्साहित करती रहीं। जुहा कहती हैं, “मेरी अम्मी कहती हैं कि बेटा, करते-करते ही आएगा। अगर एक बार ठान लिया कि करना है तो करना ही है। अगर मैं ये सोच लेती कि चलने से गिर जाते हैं तो फिर मैं चल नहीं पाती, एग्जाम नहीं दे पाती, पढ़ नहीं पाती।”
पैरों से पढ़ाई, टैब की मदद से सीखने का सफर
जुहा ने अपनी पढ़ाई के लिए भी अपनी शारीरिक परिस्थितियों को बाधा नहीं बनने दिया। वह पैरों की मदद से पढ़ाई करती हैं और टैबलेट का इस्तेमाल करती हैं। वह स्कूल भी जाती हैं। स्कूल में भी उन्हें अलगाव या भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। इसके उलट, शिक्षकों ने उनका पूरा सहयोग किया। जुहा बताती हैं, “टीचर्स ने मुझे बिल्कुल ऐसा सपोर्ट किया है जैसे पेरेंट्स करते हैं। कभी भी भेदभाव नहीं किया।”
खेल के समय भी शिक्षकों ने उन्हें बाकी बच्चों से अलग नहीं रखा। जुहा के मुताबिक, गेम्स पीरियड में शिक्षिकाएं ऐसे खेल करवाती थीं, जिनमें वह भी हिस्सा ले सकें। वह बताती हैं, “जब भी गेम्स पीरियड होता था तो मैम मुझे सबसे आगे रखती थीं कि बेटा, तुम भी खेलोगी। तुम अकेली नहीं कि बैठी हो और सब बच्चे खेल रहे हैं। मैम ऐसे गेम खिलवाती थीं कि मैं भी खेल सकूं, जैसे पकड़म-पकड़ाई और हाइड एंड सीक।” इस तरह स्कूल ने उन्हें यह महसूस नहीं होने दिया कि वह दूसरे बच्चों से कम हैं। जुहा के अनुसार, स्कूल के कार्यक्रमों में भी उन्हें आगे रखा जाता था।
दूसरों से तुलना नहीं, अपनी जिंदगी में खुश रहना सीखा
जुहा से जब पूछा गया कि क्या उन्हें कभी दूसरे लोगों को देखकर यह महसूस होता है कि उनके हाथ-पैर हैं और उनकी जिंदगी सामान्य है, तो उन्होंने बेहद अलग नजरिया पेश किया। वह बताती हैं कि उनकी मां ने उन्हें हमेशा अपनी जिंदगी में मौजूद चीजों के लिए शुक्र अदा करना सिखाया। जुहा कहती हैं, “मेरी अम्मी कहती हैं कि अल्लाह ने आपको जो दिया है, उसी में शुक्र अदा करना चाहिए।” वह आगे कहती हैं, “अगर अपने से ऊपर देखोगे कि इसके पास यह है, वो है, तो कभी इंसान खुश रह नहीं पाएगा। ऐसे ही कंपटीशन में लगा रहेगा कि इससे ज्यादा, इससे ज्यादा।”
उनकी यह सोच उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। वह मानती हैं कि इंसान को लगातार अपने से ज्यादा सुविधा वाले लोगों से तुलना करने के बजाय अपनी जिंदगी और अपनी उपलब्धियों को देखना चाहिए।
घर के लगभग सभी काम खुद करती हैं जुहा
जुहा की क्षमता केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है। वह रोजमर्रा के कई ऐसे काम खुद कर लेती हैं, जिन्हें देखकर दूसरे लोग हैरान रह जाते हैं। वह बताती हैं, “मैं सारे काम कर लेती हूं। झाड़ू लगाना, पोछा लगाना, बर्तन धोना और कपड़े धोना, रोटी बनाना। हैंडपंप भी चला लेती हूं। ब्रश खुद कर लेती हूं। कपड़े चेंज कर लेती हूं। अपने हिजाब बांध लेती हूं।” उनकी यह क्षमता उनके परिवार के निरंतर सहयोग और खुद सीखने की इच्छा का परिणाम है। जुहा के मुताबिक, उनकी मां बचपन से ही उन्हें हर काम सिखाती थीं। “बचपन से ही अम्मी हर चीज मुझे सिखाती थीं कि बेटा ऐसे करो, वो ऐसे करो। अब्बू भी हर चीज लेकर आते हैं मेरे लिए, जिस चीज की मुझे जरूरत होती है,” वह बताती हैं।
उनके पिता और मां ने कभी उन्हें किसी चीज से वंचित रखने या अलग व्यवहार करने की कोशिश नहीं की। जुहा कहती हैं कि उनके माता-पिता ने दूसरे भाई-बहनों की तरह उन्हें भी हर जरूरी चीज उपलब्ध कराई।
2023 में शुरू किया यूट्यूब चैनल, अब लाखों लोग देखते हैं
जुहा की कहानी सोशल मीडिया के जरिए भी बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंची। उन्होंने 2023 में अपना यूट्यूब चैनल शुरू किया। इसकी शुरुआत भी एक दिलचस्प घटना से हुई। जुहा बताती हैं कि पासपोर्ट बनवाने के लिए जब वह बैंक और अन्य जगहों पर गईं तो लोगों ने उनकी प्रतिभा और आत्मविश्वास को देखकर उनके पिता से कहा कि उन्हें अपनी बेटी के वीडियो बनाने चाहिए।
वह बताती हैं, “सब ने मुझसे कहा कि आप इतनी टैलेंटेड हैं कि आप अपना वीडियो बनाया करें। मेरे अब्बू से कहा कि आप वीडियो क्यों नहीं बनाते अपनी बेटी की? बहुत ही ज्यादा लोगों को मोटिवेट करेगी।” पासपोर्ट के लिए हस्ताक्षर करने की बात पर भी जुहा ने अपनी क्षमता साबित की। लोगों ने उनसे कहा था कि वह हस्ताक्षर नहीं कर पाएंगी और अंगूठा लगा दें। लेकिन जुहा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।
“उन्होंने कहा कि आप सिग्नेचर कैसे करोगी? आप अंगूठा ही लगाओ। तो मैंने कहा कि नहीं, मैं सिग्नेचर करूंगी। मैं 10th क्लास में हूं। मैं क्यों अंगूठा लगाऊं?” इसके बाद उनके पिता ने उनका वीडियो बनाया। लोगों ने उनके पिता को लगातार प्रोत्साहित किया और फिर अगस्त में चैनल शुरू किया गया। जुहा के मुताबिक, 18 अगस्त को चैनल शुरू हुआ और करीब तीन महीने बाद वह मोनेटाइज हो गया। वह बताती हैं कि तीन महीने में उनके एक लाख सब्सक्राइबर हो गए थे। अब उनके यूट्यूब चैनल पर करीब छह लाख सब्सक्राइबर होने वाले हैं, जबकि इंस्टाग्राम पर भी करीब तीन लाख फॉलोअर्स हैं। उनके भाई और पिता वीडियो बनाने में उनका सहयोग करते हैं।
पढ़ाई के साथ गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाती हैं
जुहा की दिनचर्या भी उनके संघर्ष और जिम्मेदारी की भावना को दर्शाती है। वह सुबह उठकर अपनी इस्लामिक क्लास और तजवीद की पढ़ाई करती हैं। इसके बाद वीडियो बनाने का काम करती हैं और फिर अपनी पढ़ाई करती हैं। लेकिन उनका दिन यहीं खत्म नहीं होता। वह आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को मुफ्त में पढ़ाती हैं। जुहा बताती हैं, “मैं गरीब बच्चों को पढ़ाती हूं। क्योंकि कुछ पेरेंट्स फीस नहीं दे पाते बच्चों के लिए और स्कूल वाले ऐसे पढ़ाते नहीं हैं सरकारी स्कूल में ज्यादातर, तो मैं बच्चों को बुलाती हूं कि आप मेरे पास आओ, मैं आपको फ्री में पढ़ाऊंगी।”
वह शाम करीब पांच-छह बजे तक बच्चों को पढ़ाती हैं। बच्चों की कॉपियां जांचना, उन्हें काम देना और पढ़ाना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। इसके बाद वह अपने वीडियो एडिट करती हैं, वॉइस ओवर करती हैं और उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करती हैं। इसके अलावा वह अपने छोटे कजिन्स के साथ भी समय बिताती हैं।
कुछ ही सेकंड में सुई में डाल देती हैं धागा
इंटरव्यू के दौरान जुहा ने अपनी एक और क्षमता का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपने पैरों की मदद से कुछ ही सेकंड में सुई में धागा डालकर दिखाया। यह देखकर इंटरव्यू लेने वाली भी हैरान रह गईं। उन्होंने जुहा के प्रदर्शन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह जिस सोच के साथ उनसे मिलने आई थीं, बातचीत के बाद उनका नजरिया पूरी तरह बदल गया। जुहा ने यह भी दिखाया कि वह अपना नाम लिख सकती हैं। इसके अलावा वह कपड़ों की सिलाई भी कर लेती हैं। अगर कपड़ा फट जाए तो वह उसे खुद सी लेती हैं।
जिंदगी में हार न मानने का संदेश
जुहा से जब पूछा गया कि वह उन बच्चों से क्या कहना चाहेंगी जिनके हाथ-पैर सही हैं, लेकिन वे जिंदगी में जल्दी हार मान लेते हैं, तो उन्होंने माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी की बात कही। जुहा कहती हैं, “आपके पेरेंट्स आपको जो चीजें दे रहे हैं, वह यह सोचकर दे रहे हैं कि हमें नहीं मिला, हमारे बच्चों को मिलना चाहिए। तो वहीं आपको यह भी देखना चाहिए कि हमारे पेरेंट्स हमारे लिए इतना कर रहे हैं। तो हमें भी उनके लिए कुछ करना चाहिए। उनका नाम रोशन करना चाहिए।”
वह मानती हैं कि माता-पिता की सबसे बड़ी इच्छा यही होती है कि उनका बच्चा कामयाब हो। जुहा के मुताबिक, बच्चों को भी अपने माता-पिता के लिए कुछ करने और उनके बुढ़ापे का सहारा बनने के लिए खुद को सक्षम बनाना चाहिए। उनका संदेश है कि सफलता के लिए मेहनत और लगातार प्रयास जरूरी है।
मां को खुश रखना बनी जिंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणा
जुहा की सबसे बड़ी प्रेरणा उनके माता-पिता हैं, खासकर उनकी मां। वह बताती हैं कि जन्म के समय मां को रोते देखकर उनके मन में यह भावना पैदा हुई कि वह अपनी मां को दोबारा दुखी नहीं करेंगी। जुहा कहती हैं, “जब मैं पैदा हुई थी ना तो रो रहे थे सब और अम्मी को भी बहुत ज्यादा रोना आ रहा था और मैं अम्मी से पूछा करती थी कि अम्मी, सबके हाथ हैं, मेरे हाथ क्यों नहीं हैं? तो मेरी अम्मी रोया करती थी कि जुहा ने मुझसे ऐसा क्वेश्चन पूछा है।” इसके बाद उन्होंने तय किया कि वह अपनी मां को खुश रखेंगी।
“मैंने सोच लिया था कि अम्मी को अब नहीं रुलाना। अब अम्मी को बस खुश रखना है। जैसे भी अम्मी खुश रहें। मुझे ऐसे खुद जीना है और खुलकर जीना है, जिससे मेरी अम्मी-अब्बू खुश रहें,” वह कहती हैं। जुहा मोटिवेशनल स्पीच भी सुनती और देखती हैं। इसके अलावा वह उन लोगों को देखकर भी प्रेरणा लेती हैं, जिन्हें कई सुविधाएं होने के बावजूद दूसरों की मदद की जरूरत पड़ती है। वह कहती हैं, “मैं सोचती हूं कि मैं इनसे बहुत ज्यादा बेहतर हूं। तो बस इसी से मुझे मोटिवेशन मिलता है।”
‘जो मिला है उसमें खुश रहें’, जुहा का संदेश
जुहा का मानना है कि जिंदगी में खुश रहने के लिए व्यक्ति को अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करना चाहिए और लगातार दूसरों से तुलना नहीं करनी चाहिए। वह कहती हैं, “सबसे कि जो आपको दिया है ऊपर वाले ने, उसी में खुश रहना चाहिए। अगर आप अपने से ऊपर देखेंगे तो आप कभी भी खुश नहीं रह पाएंगे। जो चीज दी है उसी में खुश रहना चाहिए।” वह अपनी स्थिति का उदाहरण देते हुए कहती हैं कि अगर वह लगातार यह सोचती रहें कि दूसरे लोगों के हाथ हैं और उनके नहीं हैं, तो वह कभी खुश नहीं रह पाएंगी।
“मैं सोचती हूं कि मैं सबसे अच्छी हूं और सब काम कर लेती हूं, तो मैं खुश रहती हूं कि हां, मैं और लोगों से बेहतर हूं। तो बस हार नहीं माननी चाहिए। मेहनत करते रहना चाहिए।” जुहा का विश्वास है कि मुश्किलें इंसान की परीक्षा भी होती हैं और मेहनत का परिणाम एक न एक दिन जरूर मिलता है। “कोई भी ऐसी चीज नहीं है दुनिया में जो नहीं पाई जा सकती। मेहनत करेंगे तो मिलेगी, तो मेहनत करते रहना चाहिए,” वह कहती हैं।
धार्मिक आस्था से भी मिलती है ताकत
जुहा अपनी जिंदगी की चुनौतियों को अपनी धार्मिक आस्था से भी जोड़ती हैं। वह मानती हैं कि मुश्किल समय में भी ईश्वर इंसान का साथ नहीं छोड़ता। वह कहती हैं, “जिसने आपको पैदा किया है, वह आपका साथ कभी नहीं छोड़ता। वह आपको मुश्किलें देता है, लेकिन इसलिए देता है कि मेरा जो बंदा है, वह मेरे साथ है या नहीं है।” वह आगे कहती हैं, “हमें दुनिया में इसलिए भेजा है कि हम उसकी प्रे करें। उसके लिए, बल्कि उसको हमारी जरूरत नहीं है, हमें उसकी जरूरत है।” इसी विश्वास के साथ वह लोगों को जिंदगी में हार न मानने और लगातार मेहनत करते रहने का संदेश देती हैं।
अब कानून की पढ़ाई कर जज बनना चाहती हैं जुहा
12वीं कक्षा में सफलता हासिल करने के बाद जुहा ने अपने भविष्य का लक्ष्य भी तय कर लिया है। वह कानून की पढ़ाई करना चाहती हैं और आगे चलकर जज बनने का सपना देखती हैं। जब उनसे पूछा गया कि 12वीं के बाद उनका क्या प्लान है, तो उन्होंने साफ कहा, “मैं लॉ करूंगी और जज बनूंगी।” उनके इस लक्ष्य के लिए इंटरव्यू के दौरान उन्हें शुभकामनाएं दी गईं और उम्मीद जताई गई कि वह आने वाले समय में भी इसी तरह सफलता हासिल करती रहेंगी।
पिता ने कहा- जिस दिन जुहा घर आई, खुशियां भी साथ आईं
जुहा के पिता ने बेटी के संघर्ष और सफलता की कहानी साझा करते हुए कहा कि उनके जन्म के समय परिवार के लिए यह बेहद भावुक दौर था। आसपास के गांवों से लोग बच्ची को देखने आने लगे थे। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वह और उनकी पत्नी छिप-छिपकर रोते थे और सोचते थे कि आगे क्या होगा। इसी दौरान इलाके में आए एक सूफी संत ने उन्हें समझाया कि बच्ची का इस तरह पैदा होना उनके हाथ में नहीं था।
जुहा के पिता ने बताया कि संत ने उनके सिर पर हाथ रखकर कहा था, “इसमें आपका कोई रोल नहीं है। किसने दी है आपको? ईश्वर ने दी है, अल्लाह ने दी है। तो उसने दी है, तो आपका जो कर्म है आप सिर्फ वो निभाएं।” इस बात ने परिवार को अपनी सोच बदलने और जुहा को पूरी तरह स्वीकार कर उसका साथ देने की प्रेरणा दी। इसके बाद परिवार ने जुहा की पढ़ाई और उसकी जरूरतों पर पूरा ध्यान दिया। उनके पिता बताते हैं कि जिस दिन से जुहा घर आईं, उसी दिन से घर में खुशियां बढ़ने लगीं। उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे हमारे घर में आई, उस दिन से ही चार चांद हमारे घर में लगने शुरू हो गए और लक्ष्मी कहते हैं ना, वो लक्ष्मी साक्षात ही हमारे घर में आ गई।”
स्कूल में दाखिले के लिए भी करना पड़ा संघर्ष
जुहा के पिता के मुताबिक, परिवार चाहता था कि उनकी बेटी अच्छे स्कूल में पढ़े, लेकिन शुरुआत में कुछ स्कूलों ने उन्हें दाखिला देने में असमर्थता जताई। स्कूल प्रबंधन का कहना था कि उनकी देखरेख के लिए एक व्यक्ति को अलग से लगाना पड़ेगा। बाद में स्थानीय विधायक ठाकुर धीरेंद्र सिंह ने जुहा को अपने विद्यालय में पढ़ाने का निर्णय लिया। उनके पिता के अनुसार, विद्यालय उनकी माता के नाम पर शांति देवी कन्या विद्यालय था।
पिता बताते हैं कि विधायक ने स्कूल स्टाफ से कहा कि जुहा की जो भी जरूरतें हैं, उन्हें समय पर पूरा किया जाए और उन्हें हर संभव सहयोग दिया जाए। इसके बाद जुहा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने पढ़ाई में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया।
सफलता के बाद सम्मान की लगी कतार
हाई स्कूल में अच्छे परिणाम के बाद जुहा को विभिन्न स्तरों पर सम्मानित किया गया। उनके पिता के अनुसार, मानवाधिकार आयोग की अध्यक्ष श्रीमती बबीता चौहान, डीएम मनोज कुमार और कई आईपीएस अधिकारियों, मंत्रियों तथा विधायकों ने उन्हें सम्मानित किया। ग्रेटर नोएडा के प्रेस क्लब ने भी उन्हें बुलाकर सम्मानित किया। जुहा के पिता कहते हैं कि जिस बेटी के जन्म के समय परिवार के सामने चिंता और दुख का माहौल था, वही बेटी आज उनके परिवार की खुशी और गर्व का कारण बन चुकी है। “आज ये जो हमें रोने का जरिया बन रही थी, आज हमारे हंसने का जरिया बन चुकी है। जुहा अब हंसने का जरिया बन चुकी है,” उन्होंने कहा।
जुहा की कहानी यह दिखाती है कि शारीरिक सीमाएं किसी व्यक्ति की क्षमता और सपनों की सीमा तय नहीं करतीं। परिवार का सहयोग, शिक्षकों का प्रोत्साहन, आत्मविश्वास और लगातार मेहनत किसी भी चुनौती को पीछे छोड़ सकते हैं। 12वीं में जिला स्तर पर सफलता हासिल करने के बाद अब जुहा कानून की पढ़ाई कर जज बनने का सपना देख रही हैं। उनके शब्दों में, **“हार नहीं माननी चाहिए। मेहनत करते रहना चाहिए।” और शायद यही उनकी पूरी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख भी है।