साकिब सलीम
भारत में ब्रिटिश राज के दौरान कलम और आवाज पर पाबंदियां लगाना कोई नई बात नहीं थी। इतिहास गवाह है कि जब भी भारतीयों ने कला के जरिए अपनी आवाज उठाई, अंग्रेजों ने उसे दबाने की कोशिश की। साल 1876 में एक ऐसा ही कानून आया था जिसने भारतीय रंगमंच की आजादी को छीन लिया था। इस कानून को लाने के पीछे एक बंगाली नाटक की बहुत बड़ी भूमिका थी। उस नाटक का नाम था नील दर्पण। इस नाटक ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिलाकर रख दिया था।
वायसराय का वह दमनकारी अध्यादेश
तारीख थी 29 फरवरी 1876। भारत के वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रुक ने एक अध्यादेश जारी किया। इस अध्यादेश में साफ तौर पर कहा गया था कि सरकार किसी भी ऐसे नाटक को प्रतिबंधित कर सकती है जो बदनाम करने वाला हो। इसके साथ ही राजद्रोही, अश्लील या सार्वजनिक हित के खिलाफ दिखने वाले नाटकों पर भी रोक लगाने की बात कही गई। अंग्रेजी सरकार ने कभी यह साफ नहीं किया कि असल में राजद्रोही क्या होता है।
पुलिस को यह पूरी छूट दे दी गई थी कि वे किसी भी नाटक को रोक सकते थे। वे नाटक करने वाले कलाकारों को सीधे गिरफ्तार भी कर सकते थे। यह सब कुछ अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे बंगाली कलाकारों की एक लंबी लड़ाई थी। इन कलाकारों ने अपनी कला से अंग्रेजों के अत्याचारों को जनता के सामने ला खड़ा किया था।

दीनबंधु मित्र और नील दर्पण की शुरुआत
इस पूरे विवाद की जड़ में नील दर्पण नाटक था। इस नाटक को साल 1860 में दीनबंधु मित्र ने बंगाली भाषा में लिखा था। दीनबंधु मित्र कोई आम इंसान नहीं थे। वह ब्रिटिश डाक और तार सेवा में एक सरकारी कर्मचारी थे। नौकरी के सिलसिले में उन्हें पटना, ओडिशा और बंगाल के नादिया जिले के ग्रामीण इलाकों में जाना पड़ता था। इन दौरों के दौरान उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि नील की खेती करने वाले किसानों पर क्या गुजरती थी। उन्होंने देखा कि अंग्रेज बागान मालिक किस तरह से भारतीय किसानों का खून चूस रहे थे।
अंग्रेज बागान मालिक अनपढ़ ग्रामीणों को अपने जाल में फंसाते थे। इसके लिए वे दादन नाम की एक व्यवस्था का इस्तेमाल करते थे। दादन असल में एक अग्रिम भुगतान यानी एडवांस पैसा होता था। यह पैसा देखने में तो एक मदद जैसा लगता था लेकिन असल में यह एक गहरा दलदल था। जो किसान एक बार दादन ले लेता था, वह कर्ज के जाल में फंस जाता था।
अगर कोई किसान पर्याप्त नील नहीं उगा पाता था, तो उसे कानून के नाम पर प्रताड़ित किया जाता था। दीनबंधु मित्र ने इस भयानक शोषण को बहुत करीब से देखा था। इस शोषण ने उनके दिल को झकझोर कर रख दिया था। सरकारी नौकरी में होने के कारण वह अपना नाम सामने नहीं ला सकते थे। इसलिए उन्होंने नील दर्पण को बिना अपने नाम के गुमनाम तरीके से प्रकाशित करवाया था।
अंग्रेजी अनुवाद और अदालत का फैसला
यह नाटक बहुत तेजी से लोगों के बीच लोकप्रिय हो गया। बंगाली समाज में इसकी चर्चा हर तरफ होने लगी। इसके बाद मशहूर कवि माइकल मधुसूदन दत्त ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया। इस अंग्रेजी अनुवाद को रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने लोगों तक पहुंचाया। जेम्स लॉन्ग एक ईसाई मिशनरी थे। उन्होंने इस नाटक को बंगाल के साथ ही दूसरे राज्यों और इंग्लैंड के पाठकों तक भेजा।
इस नाटक के अंग्रेजी में आते ही हड़कंप मच गया। ब्रिटिश भारत के जमींदारों और व्यापारियों के संगठन ने जेम्स लॉन्ग पर मुकदमा दर्ज करवा दिया। यह संगठन असल में नील के अंग्रेज बागान मालिकों का प्रतिनिधित्व करता था। अदालत ने जेम्स लॉन्ग को सरकार के खिलाफ देशद्रोह का दोषी माना। उन्हें एक महीने की जेल की सजा सुनाई गई।
इसके साथ ही उन पर एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। जेम्स लॉन्ग का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने इस नाटक को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की थी। एक बंगाली सज्जन काली प्रसाद सिन्हा ने जेम्स लॉन्ग की तरफ से वह जुर्माना भरा था। जेम्स लॉन्ग की गिरफ्तारी इस बात का सबूत थी कि अंग्रेज इस नाटक से कितना डर गए थे।

नाटक की कहानी में ऐसा क्या था?
आखिर नील दर्पण में ऐसा क्या लिखा था जिसने ब्रिटिश सरकार को इतना गुस्सा दिला दिया? यह नाटक एक भारतीय जमींदार परिवार की बर्बादी की कहानी कहता है। इस परिवार को वुड और रॉग नाम के दो अंग्रेज बागान मालिक तबाह कर देते हैं। नाटक के अंत तक जमींदार गोलक बसु खुदकुशी कर लेते हैं। उनकी पत्नी सावित्री दुख के कारण पागल होकर मर जाती हैं। उनका बेटा नबीन माधव भी रॉग के हाथों मारा जाता है। रॉग उसका सिर फोड़ देता है।
नाटक के एक दृश्य में दो मजदूरों को मंच पर लात और कोड़ों से पीटते हुए दिखाया गया था। ये वे मजदूर थे जिन्होंने दादन लेने से मना कर दिया था। एक और दृश्य बहुत ही भयानक था। अंग्रेज अधिकारी रॉग एक गर्भवती ग्रामीण लड़की क्षेत्रमोनी को अकेले में घेर लेता है।
वह उससे कहता है कि मैं तुम्हारे बच्चे का पिता बनना चाहता हूं। वह उसे अपने साथ चलने के लिए मजबूर करता है। क्षेत्रमोनी अपनी जान की भीख मांगती है। वह डर के मारे उस अत्याचारी को पिता कहकर पुकारती है और छोड़ने की गुहार लगाती है। यह दृश्य भारतीय दर्शकों के दिलों को चीर कर रख देता था।
मंच पर वापसी और ऐतिहासिक सफलता
इस विवाद के बाद लगभग 12 सालों तक किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वे इस नाटक को खुलेआम मंच पर दिखा सकें। साल 1872 में कलकत्ता के ग्रेट नेशनल थिएटर ने नील दर्पण को मंच पर उतारने का फैसला किया। इस नाटक के पहले दो शो पूरी तरह से हाउसफुल रहे। इन शो से थियेटर ने पांच सौ रुपये से ज्यादा की कमाई की थी। उस जमाने में यह एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। असल में यह भारत में भारतीयों द्वारा किया गया पहला टिकट वाला नाटक था।
द इंग्लिशमैन नाम के अखबार ने 19 अप्रैल 1873 के अपने अंक में इस नाटक की तारीफ की थी। अखबार ने लिखा था कि बंगाली कलाकारों की अभिनय प्रतिभा को देखने के लिए यह सबसे बेहतरीन नाटक है। जिस नाटक के कारण मिस्टर लॉन्ग को जेल जाना पड़ा था, अब उसी नाटक को यूरोपीय दर्शकों को देखने की सलाह दी जा रही थी। नील दर्पण को उस समय का सबसे बेहतरीन शो बताया जाने लगा था।
लखनऊ का वह खौफनाक हंगामा
सभी अंग्रेज इस नाटक की तारीफ से खुश नहीं थे। साल 1875 में जब ग्रेट नेशनल थिएटर इस नाटक को लेकर लखनऊ पहुंचा, तो वहां हालात बदल गए। वहां रहने वाले अंग्रेज दर्शक इस नाटक को देखकर हिंसक हो उठे।
उस समय की मशहूर अभिनेत्री बिनोदिनी दास ने अपनी आत्मकथा अमर अभिनेत्री जुबा में उस शाम का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि जैसे ही मंच पर रॉग द्वारा क्षेत्रमोनी पर अत्याचार का दृश्य शुरू हुआ, अंग्रेज दर्शक भड़क गए। वे मंच के बिल्कुल पास आ गए। कुछ गोरे सैनिकों ने अपनी तलवारें निकाल लीं और मंच पर चढ़ गए। कलाकारों को लगा कि आज वे जिंदा नहीं बचेंगे।
थियेटर के मैनेजर धरमदास बाबू डर के मारे मंच के नीचे छिप गए थे। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मजिस्ट्रेट को किले से सैनिकों की एक टुकड़ी बुलानी पड़ी। तब जाकर मामला शांत हुआ। अंग्रेज सैनिकों ने उन निहत्थे कलाकारों पर तलवारें तान दी थीं जो सिर्फ अपने देश के लोगों पर हुए अत्याचार को अभिनय के जरिए दिखा रहे थे।
क्या लखनऊ की घटना ही कानून की वजह थी?
आम तौर पर यह माना जाता है कि लखनऊ के इसी हंगामे के कारण ब्रिटिश सरकार ने यह दमनकारी कानून बनाया था। लेकिन जाने माने रंगमंच इतिहासकार रुस्तम भरूचा का मानना कुछ अलग है। उनका कहना है कि इसके पीछे कुछ और भी कारण थे।
साल 1876 में ग्रेट नेशनल थिएटर ने एक और नाटक मंचित किया था जिसका नाम था गजादानंद ओ युबराज। इस नाटक में एक बंगाली वकील का मजाक उड़ाया गया था। उस वकील ने भारत दौरे पर आए प्रिंस ऑफ वेल्स को अपने घर की महिलाओं से मिलने की इजाजत दी थी। भरूचा का तर्क है कि ब्रिटिश सरकार अपने होने वाले सम्राट का ऐसा मजाक बर्दाश्त नहीं कर सकती थी।
पुलिस ने इस नाटक के दूसरे शो को बीच में ही रोक दिया था। इसके ठीक दस दिन बाद लॉर्ड नॉर्थब्रुक ने वह अध्यादेश जारी कर दिया था। थियेटर के कलाकारों ने भी चुप बैठना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अगले ही दिन द पुलिस ऑफ पिग एंड शीप नाम से एक नया व्यंग्य नाटक खेल दिया। इस नाटक के लिए आठ कलाकारों को गिरफ्तार किया गया था।
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ब्रिटिश साम्राज्य को हमेशा से रंगमंच से डर लगता था। वे जानते थे कि नाटक लोगों की सोच को बदल सकते हैं। बाद में यही डर उन्हें अखबारों और सिनेमा से भी हुआ। जब वे नाटकों को शारीरिक रूप से नहीं रोक पाए, तो उन्होंने कानून का सहारा लिया। लेकिन इतिहास गवाह है कि नील दर्पण जैसा नाटक हमेशा के लिए अमर हो गया और ब्रिटिश साम्राज्य का अंत हो गया।