शिक्षा से बदल रही है मुस्लिम समाज की तकदीर : मकसूद अहमद

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 31-07-2026
The Muslim Community in a Changing India: Seeking the Reality Through the Eyes of a Social Worker
The Muslim Community in a Changing India: Seeking the Reality Through the Eyes of a Social Worker

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

भारत जैसे विशाल और विविध देश में समाज की तस्वीर हमेशा एक जैसी नहीं होती। अलग-अलग दौर में अलग-अलग कहानियां सामने आती रही हैं। कुछ कहानियां उम्मीद जगाती हैं, कुछ चिंता पैदा करती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जिन पर बहस शुरू हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में एक बड़ा नैरेटिव देखने को मिला कि सरकार बदलने के बाद मुसलमानों की स्थिति हर क्षेत्र में कमजोर होती चली गई है। यह कहा जाने लगा कि शिक्षा, नौकरियों, विश्वविद्यालयों, आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति के क्षेत्र में मुस्लिम समुदाय पीछे धकेला जा रहा है। लेकिन क्या जमीन की वास्तविकता भी यही कहती है?

इसी सवाल को समझने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे मकसूद अहमद से बातचीत की गई। आवाज द वाॅयस के खास कार्यक्रम ‘दीन और दुनिया’ में साकिब सलीम से बातचीत में उन्होंने कहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आंकड़ों और वास्तविक अनुभवों को देखना जरूरी है। उनके अनुसार, पिछले वर्षों में एक ऐसा माहौल बनाया गया कि सरकार बदलने के बाद मुसलमानों के लिए अवसर खत्म हो गए हैं, लेकिन वह इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं मानते। उनका कहना था कि हकीकत को समझने के लिए 2014 से पहले और बाद के आंकड़ों को देखना जरूरी है।

मकसूद अहमद ने सबसे पहले देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि अगर यह बात सही होती कि मुसलमानों की सरकारी सेवाओं में भागीदारी लगातार कम हो रही है, तो यूपीएससी के आंकड़े भी यही कहानी बताते। उन्होंने बताया कि 2006-07 के आसपास आईएएस में मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या लगभग 27 थी। इसके बाद अलग-अलग वर्षों में यह संख्या बदलती रही। 2008 में लगभग 30, 2009 में करीब 31, 2010 में लगभग 21, 2012 में करीब 30 और 2013 में लगभग 34 उम्मीदवार चयनित हुए।

इसके बाद उन्होंने कहा कि 2014 के बाद तस्वीर में बदलाव दिखाई देता है। 2015 में संख्या बढ़ी, 2016 में यह लगभग 50 के करीब पहुंची और 2017 में करीब 51 उम्मीदवार सफल हुए। कोविड काल में इसमें उतार-चढ़ाव आया, लेकिन बाद के वर्षों में फिर वृद्धि देखने को मिली। उनके अनुसार, 2023 में लगभग 50 और 2026 के सत्र में करीब 53 मुस्लिम उम्मीदवारों के चयन की बात सामने आई।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि किसी भी सफलता का पूरा श्रेय केवल किसी एक सरकार को नहीं दिया जा सकता। उनके अनुसार, किसी भी उपलब्धि के पीछे कई लोगों का योगदान होता है, जिसमें पिछली सरकारों की नीतियां, परिवारों का सहयोग, शिक्षकों की मेहनत, विश्वविद्यालयों का योगदान और विद्यार्थियों की अपनी मेहनत शामिल होती है। लेकिन जब परिणाम सामने आते हैं तो राजनीतिक बहस में अक्सर उसका श्रेय उसी दौर को दिया जाता है। उनका तर्क था कि अगर यह धारणा सही होती कि मुस्लिम समुदाय हर क्षेत्र में पीछे जा रहा है, तो यूपीएससी जैसे क्षेत्रों में यह वृद्धि दिखाई नहीं देती।

शिक्षा संस्थानों की चर्चा करते हुए मकसूद अहमद ने मुस्लिम अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि अक्सर यह कहा जाता है कि मुस्लिम समुदाय के लिए विश्वविद्यालयों के अवसर कम हुए हैं, लेकिन उनके अनुसार अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों की संख्या में वृद्धि हुई है। उन्होंने सबसे पहले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का उदाहरण दिया और कहा कि यह केवल एक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक आंदोलन का परिणाम है, जिसकी स्थापना सर सैयद अहमद खान के प्रयासों से हुई थी। सर सैयद का उद्देश्य केवल धार्मिक शिक्षा देना नहीं था, बल्कि आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देना था ताकि भारतीय मुसलमान विज्ञान, प्रशासन और आधुनिक क्षेत्रों में आगे बढ़ सकें।

इसके बाद उन्होंने जामिया हमदर्द का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय शिक्षा मंत्री रहे डॉ. मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में इसे विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। उन्होंने कहा कि धीरे-धीरे अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी और आज लगभग 23 मुस्लिम अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों का उल्लेख किया जाता है।

उनका दावा था कि पहले इनकी संख्या लगभग 6-7 थी, जो बाद के वर्षों में बढ़कर लगभग 23 तक पहुंची। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इसका पूरा श्रेय किसी एक सरकार को देना सही नहीं होगा, क्योंकि कई संस्थानों के पीछे पुरानी सरकारों का योगदान रहा होगा, जैसे जमीन उपलब्ध कराना, प्रारंभिक सहायता देना और ढांचा तैयार करना। लेकिन किसी संस्था को आधिकारिक मान्यता या मंजूरी जिस समय मिलती है, उस समय की सरकार को उसका श्रेय दिया जाता है।

इंटरव्यू में इसके बाद सवाल उठा कि क्या अल्पसंख्यक संस्थानों को नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है। मकसूद अहमद ने कहा कि यह मुद्दा केवल मुस्लिम विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, जब किसी संस्था में विवाद होता है तो कई बार कारण केवल उसका मुस्लिम होना नहीं होता, बल्कि प्रबंधन और प्रशासन से जुड़े मतभेद भी होते हैं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि देश में कई मुस्लिम संस्थान अच्छे तरीके से काम कर रहे हैं, जिनमें अल-अमीन मेडिकल कॉलेज, बंदे नवाज मेडिकल कॉलेज, केरल के कई मुस्लिम प्रबंधन वाले संस्थान, महाराष्ट्र में मौलाना गुलाम मुस्तफा द्वारा बनाया गया मेडिकल कॉलेज, लखनऊ की इंटीग्रल यूनिवर्सिटी और नदवा से जुड़े संस्थान शामिल हैं। उनका कहना था कि अगर समस्या केवल मुस्लिम संस्थानों से होती तो इन सभी संस्थानों में भी लगातार हस्तक्षेप दिखाई देता।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल पर मकसूद अहमद ने माना कि वर्तमान केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम मंत्री नहीं है। उन्होंने इसे एक वास्तविक तथ्य बताया, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया कि केवल मुस्लिम चेहरा होना पर्याप्त है या वह व्यक्ति समुदाय के लिए कितना काम करता है। उन्होंने पूर्व मंत्री सैयद मुख्तार अब्बास नकवी का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ फैसलों से मुस्लिम शिक्षा संस्थानों और छात्रवृत्ति योजनाओं पर असर पड़ा। उन्होंने मौलाना आजाद एजुकेशन फाउंडेशन, बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति और एमफिल-पीएचडी छात्रों की छात्रवृत्ति जैसे मुद्दों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि नेतृत्व का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि नेता मुस्लिम है, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि वह समाज के लिए क्या करता है।

जब मुस्लिम प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की बात आगे बढ़ी तो चर्चा विकास की राजनीति बनाम पहचान की राजनीति तक पहुंची। मकसूद अहमद का कहना था कि इतिहास में ऐसे कई मुस्लिम नेता हुए जिन्होंने अपनी राजनीति को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि विकास को अपना आधार बनाया।

उन्होंने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री Abdul Rahman Antulay और रेलवे मंत्री रहे C. K. Jaffer Sharief का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, इन नेताओं की राजनीति का केंद्र केवल मुस्लिम मुद्दे नहीं थे, बल्कि सड़क, शिक्षा, रोजगार, विकास और आम जनता की समस्याएं थीं। यही कारण था कि उन्हें केवल मुस्लिम नेता के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि पूरे समाज के नेता के रूप में स्वीकार किया गया।

उन्होंने दिल्ली की राजनीति का उदाहरण देते हुए Tajdar Babar का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि नई दिल्ली के मेंटो रोड क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाली ताजदार बेगम के क्षेत्र में मुस्लिम मतदाता बहुत कम संख्या में थे। वहां मुस्लिम आबादी लगभग 4 प्रतिशत थी, जबकि बाकी आबादी हिंदू थी, फिर भी लोग उन्हें प्यार से "मम्मी" कहकर चुनाव जिताते थे। उनके अनुसार, इसका कारण उनकी धार्मिक पहचान नहीं बल्कि उनका काम और जनता के साथ उनका संबंध था। उनका संदेश था कि समाज की सेवा पहचान के आधार पर नहीं बल्कि काम के आधार पर होती है।

कारोबार और उद्यमिता पर चर्चा करते हुए मकसूद अहमद ने कहा कि वह इस बात से सहमत नहीं हैं कि मुसलमान व्यापार में लगातार पीछे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम आबादी लगभग 14 प्रतिशत है, जबकि हिंदू आबादी इससे कई गुना अधिक है, इसलिए केवल संख्या के आधार पर तुलना करना सही नहीं है।

उनका कहना था कि मुस्लिम उद्यमियों द्वारा चलाई जा रही कई कंपनियां लगातार आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने दवा क्षेत्र की कंपनी Cipla, जूते के क्षेत्र में Metro Brands, LuLu Group International और उसके मालिक M. A. Yusuff Ali का उदाहरण दिया।

इसके अलावा उन्होंने Alana Group, Hamdard Laboratories, Prestige Group, Farhan Azmi के होटल व्यवसाय और Javed Habib के सैलून व्यवसाय का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि इन उदाहरणों से पता चलता है कि मुस्लिम उद्यमिता खत्म नहीं हुई है बल्कि कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है।

राजनीति और कारोबार के बीच विवाद पर उन्होंने Alana Group का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि इस ग्रुप ने राजनीतिक दलों को चंदा दिया। उनका कहना था कि भारत के कानून में कंपनियों को राजनीतिक चंदा देने की व्यवस्था रही है और किसी कंपनी का फैसला उसका व्यावसायिक निर्णय होता है। उनके अनुसार, किसी उद्योगपति को केवल उसकी राजनीतिक पसंद के आधार पर गलत ठहराना उचित नहीं है।

उन्होंने दिल्ली के दरियागंज का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने आसपास व्यापारिक माहौल में बदलाव देखा है। उनके अनुसार, 10-20 साल पहले वहां कुछ ही दुकानें थीं, लेकिन समय के साथ कई नए कारोबार खड़े हुए। आज कई छोटे व्यापारी करोड़ों रुपये की संपत्ति और कारोबार की बात करते हैं। उनका तर्क था कि अगर जमीन पर जाकर देखा जाए तो तस्वीर केवल निराशा की नहीं है।

शिक्षा और नौकरियों में बदलाव का उदाहरण देते हुए मकसूद अहमद ने अपने शिक्षक जीवन का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1992 में उनकी नियुक्ति एक स्कूल में जीव विज्ञान शिक्षक के रूप में हुई थी। उस समय जब कोई मुस्लिम छात्र मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेता था तो यह पूरे स्कूल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने बताया कि 1996 में एक छात्र के एमबीबीएस में पहुंचने पर स्कूल में मिठाई बांटी गई और 2007 में दो और छात्रों के मेडिकल में चयन पर भी खुशी मनाई गई। लेकिन उनके अनुसार, 2014 से 2025 के बीच उनके स्कूल से अकेले 74 बच्चे मेडिकल क्षेत्र में चयनित हो चुके हैं। उनका कहना था कि यह बदलाव केवल एक संस्था तक सीमित नहीं है।

उन्होंने इंजीनियरिंग और पुलिस सेवाओं में भी मुस्लिम युवाओं की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख किया। उनके द्वारा स्थापित Allama Rafiq Institute से भी दो विद्यार्थी आईआईटी तक पहुंचे। उनका कहना था कि रोजगार की कमी की धारणा का एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले नौकरी दिलाने के नाम पर बिचौलियों की भूमिका अधिक थी। लोग गार्ड की नौकरी, सफाई कर्मचारी की नौकरी या छोटी सरकारी और निजी नौकरियों के लिए दलालों को पैसे देते थे, लेकिन अब ऐसे माध्यम कम हुए हैं।

मकसूद अहमद का कहना था कि मुस्लिम समाज में सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा को लेकर आया है। उनके अनुसार, पहले समाज के अंदर छोटे-छोटे विवादों में पैसा और ऊर्जा खर्च होती थी। वकीलों की फीस, थानों के खर्च और आपसी विवादों में संसाधन लग जाते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे वही संसाधन बच्चों की पढ़ाई और भविष्य बनाने में लगाए जा रहे हैं।

उन्होंने अपने सामाजिक कार्यों के बारे में बताते हुए कहा कि उन्होंने Allama Rafiq Trust की स्थापना की। इस नाम के पीछे एक प्रेरणादायक कहानी है। जब वह एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके कॉलेज में एक कार्यक्रम हुआ था। उस कार्यक्रम में एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री Vishwanath Pratap Singh बैठे थे और दूसरी कुर्सी खाली थी। कुछ देर बाद एक धार्मिक विद्वान वहां पहुंचे। उनसे मिलने के बाद मकसूद अहमद प्रभावित हुए। बाद में उन्हें पता चला कि वह विद्वान कारी तैयब साहब के खलीफा थे, मौलाना अशरफ अली थानवी की परंपरा से जुड़े थे और धार्मिक शिक्षा के साथ सामाजिक सेवा में सक्रिय थे। उनके अनुसार, वह व्यक्ति केवल धार्मिक विद्वान नहीं बल्कि समाज और देश की जरूरतों को समझने वाले व्यक्ति थे। इसी प्रेरणा से उन्होंने उनके नाम पर Allama Rafiq Trust की स्थापना की।

मकसूद अहमद ने बताया कि Allama Rafiq Trust का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों तक शिक्षा पहुंचाना है। उनका मानना है कि समाज में वास्तविक बदलाव केवल भाषणों या नारों से नहीं आता, बल्कि शिक्षा के माध्यम से आता है। इसी सोच के साथ ट्रस्ट ने छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में स्कूल स्थापित करने का काम शुरू किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में कुछ स्कूल खोले गए, लेकिन बाद में इसे व्यवस्थित संस्था के रूप में चलाने के लिए ट्रस्ट का पंजीकरण कराया गया, जमीन खरीदी गई और शिक्षा के क्षेत्र में काम को आगे बढ़ाया गया।

उन्होंने बताया कि हापुड़ जिले के सिंभावली क्षेत्र में एक स्कूल स्थापित किया गया, जिसके लिए लगभग दो एकड़ जमीन ली गई और स्कूल को मान्यता दिलाई गई। उनके अनुसार, यह स्कूल पिछले लगभग 20 वर्षों से लगातार अच्छे परिणाम दे रहा है। दसवीं कक्षा के परिणाम लगातार 90 प्रतिशत से अधिक रहे हैं और एक वर्ष में स्कूल के 231 विद्यार्थियों ने दसवीं की परीक्षा दी, जिसमें लगभग 95.5 प्रतिशत परिणाम रहा।

उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा बदलाव मुस्लिम परिवारों में बेटियों की शिक्षा को लेकर आया है। पहले कई परिवारों में लड़कियों की उच्च शिक्षा को लेकर झिझक होती थी, लेकिन अब मुस्लिम लड़कियां मेडिकल, इंजीनियरिंग, शिक्षण और अन्य क्षेत्रों में आगे आ रही हैं।

जब उनसे 1990 के दशक और आज के समय के अंतर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा परिवर्तन समाज की प्राथमिकताओं में आया है। पहले बहुत सी ऊर्जा आपसी विवादों में खर्च हो जाती थी, लेकिन अब वही पैसा बच्चों की शिक्षा, कारोबार और भविष्य बनाने में लगाया जा रहा है। उनके अनुसार, समाज वही है और लोग वही हैं, लेकिन सोच में बदलाव आया है।

दीन और दुनिया के संबंध पर उन्होंने कहा कि वह दोनों को अलग-अलग नहीं मानते। उनके अनुसार, इंसान का हर अच्छा काम दीन का हिस्सा हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति साफ-सफाई के साथ जीवन जीता है, जरूरतमंद की मदद करता है या डॉक्टर बनकर किसी की जान बचाता है तो यह भी धार्मिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस्लाम का मूल संदेश दूसरों की परेशानी कम करना है।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी पढ़ना, विज्ञान सीखना या आधुनिक शिक्षा हासिल करना केवल दुनियावी चीजें नहीं हैं। अगर ज्ञान हासिल करके इंसान समाज की मदद करता है तो वह भी सेवा और धर्म का हिस्सा बन जाता है। उनके अनुसार, कुरान में केवल इबादत का नहीं बल्कि न्याय, इंसाफ, ज्ञान और जिम्मेदारी का भी संदेश दिया गया है।

ज्ञान की कमी और गलतफहमियों पर उन्होंने कहा कि समाज में कई विवाद जानकारी के अभाव से पैदा होते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई लोग धार्मिक शब्दों और परंपराओं को सही संदर्भ में नहीं समझते। उनके अनुसार, जानकारी बढ़ने से समाज में दूरी और गलतफहमियां कम हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि अलग-अलग भाषाओं में ईश्वर के लिए अलग-अलग शब्द इस्तेमाल होते हैं। अल्लाह अरबी भाषा का शब्द है, रब फारसी और पंजाबी परंपरा में भी प्रयोग होता है, ईश्वर हिंदी का शब्द है और ओम संस्कृत परंपरा से जुड़ा शब्द है। उनके अनुसार, शब्द अलग हो सकते हैं लेकिन इंसान की खोज और विश्वास की भावना में समानता हो सकती है।

मकसूद अहमद का मानना था कि समाज में नफरत का बड़ा कारण अज्ञानता है। अगर सभी समुदायों में शिक्षा और जागरूकता बढ़ेगी तो दूरी कम होगी। उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि सिख, जैन, हिंदू, ईसाई, पारसी और मुस्लिम सभी समुदायों ने मिलकर समाज बनाया है। उनका विश्वास था कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब केवल अतीत की बात नहीं बल्कि आज भी मौजूद है।

अंत में उन्होंने कहा कि हर सरकार में अच्छी और कमजोरियां दोनों हो सकती हैं। समाज को हर बात को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए, बल्कि जमीन की वास्तविकता को समझना चाहिए।

मकसूद अहमद की बातचीत का मुख्य संदेश यह था कि किसी भी समाज की स्थिति को समझने के लिए केवल सोशल मीडिया के नैरेटिव पर्याप्त नहीं होते। शिक्षा, रोजगार, कारोबार, राजनीति और सामाजिक बदलाव—इन सभी क्षेत्रों में तस्वीर कई परतों वाली होती है। उनके अनुसार, चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन साथ ही प्रगति के उदाहरण भी मौजूद हैं। उनकी नजर में किसी भी समुदाय के आगे बढ़ने का सबसे बड़ा रास्ता है शिक्षा, जागरूकता, मेहनत और समाज के अंदर सकारात्मक सोच का विकास। 

विकास की राजनीति बनाम पहचान की राजनीति

जब मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात होती है तो चर्चा केवल नेताओं की संख्या तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह सवाल भी उठता है कि नेतृत्व का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए। मकसूद अहमद का कहना है कि इतिहास में ऐसे कई मुस्लिम नेता हुए जिन्होंने अपनी राजनीति को केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि विकास को अपना आधार बनाया। उन्होंने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री Abdul Rahman Antulay और पूर्व रेल मंत्री C. K. Jaffer Sharief का उदाहरण देते हुए कहा कि इन नेताओं की राजनीति का केंद्र केवल मुस्लिम मुद्दे नहीं थे, बल्कि सड़क, शिक्षा, रोजगार, विकास और आम जनता की समस्याएं थीं। यही कारण था कि उन्हें केवल मुस्लिम नेता के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि पूरे समाज के नेता के रूप में स्वीकार किया गया।

मकसूद अहमद ने दिल्ली की राजनीति का उदाहरण देते हुए Tajdar Babar का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली के मेंटो रोड क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाली ताजदार बेगम का इलाका ऐसा था जहां मुस्लिम मतदाता बहुत कम संख्या में थे। उनके अनुसार, वहां मुस्लिम आबादी लगभग 4 प्रतिशत थी, जबकि बाकी आबादी हिंदू थी, फिर भी लोग उन्हें प्यार से "मम्मी" कहकर चुनाव जिताते थे। उनका मानना था कि इसकी वजह उनकी धार्मिक पहचान नहीं बल्कि उनका काम और जनता के साथ उनका जुड़ाव था। उनका संदेश था कि मुस्लिम नेतृत्व को यह समझना होगा कि समाज की सेवा केवल पहचान के आधार पर नहीं बल्कि काम के आधार पर होती है।

इंटरव्यू में यह सवाल भी उठा कि अगर राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो रहा है तो क्या इसका समाज पर प्रभाव पड़ता है। इस पर मकसूद अहमद ने कहा कि प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल संख्या बढ़ जाना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, जब कोई मुस्लिम सांसद या नेता चुना जाता है तो उससे उम्मीद होती है कि वह समुदाय के संस्थानों और जरूरतों को भी समझे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ सांसदों ने मुस्लिम संस्थानों की सहायता की है। उन्होंने जावेद साहब का उदाहरण दिया जिन्होंने Jamia Millia Islamia को अपनी सांसद निधि से सहायता दी। हालांकि उनका सवाल था कि क्या सभी मुस्लिम सांसद मुस्लिम स्कूलों और संस्थानों की मदद करते हैं। उनके अनुसार, इस दिशा में अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

इसके बाद बातचीत मुस्लिम समुदाय की आर्थिक स्थिति और उद्यमिता पर पहुंची। सवाल था कि क्या मुसलमान व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में पीछे रह गए हैं। मकसूद अहमद ने कहा कि वह इस धारणा से सहमत नहीं हैं कि मुसलमान लगातार व्यापार में पीछे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में मुस्लिम आबादी लगभग 14 प्रतिशत है, जबकि हिंदू आबादी इससे कई गुना अधिक है, इसलिए केवल संख्या के आधार पर तुलना करना सही नहीं है। उनका कहना था कि मुस्लिम उद्यमियों द्वारा चलाई जा रही कई कंपनियां लगातार आगे बढ़ रही हैं और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही हैं।

उन्होंने दवा क्षेत्र की कंपनी Cipla का उदाहरण दिया और कहा कि कंपनी लगातार आगे बढ़ रही है। इसके अलावा उन्होंने जूते के क्षेत्र में Metro Brands, LuLu Group International और उसके मालिक M. A. Yusuff Ali का उदाहरण दिया। उन्होंने मोनजोनस बेकरी और फूड कारोबार, Alana Group, होटल उद्योग में Farhan Azmi, Prestige Group, Hamdard Laboratories और Javed Habib के सैलून व्यवसाय का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि इन उदाहरणों से पता चलता है कि मुस्लिम उद्यमिता खत्म नहीं हुई है, बल्कि कई क्षेत्रों में आगे बढ़ रही है।

बातचीत में Alana Group को लेकर होने वाले राजनीतिक विवाद का भी जिक्र हुआ। मकसूद अहमद ने कहा कि कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि इस ग्रुप ने राजनीतिक दलों को चंदा दिया। उनका कहना था कि भारत के कानून में कंपनियों के राजनीतिक चंदे की व्यवस्था रही है और किसी कंपनी का राजनीतिक निर्णय उसका व्यावसायिक फैसला होता है। उनके अनुसार, किसी उद्योगपति को केवल उसकी राजनीतिक पसंद के आधार पर गलत ठहराना उचित नहीं है।

उन्होंने दिल्ली के दरियागंज का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने अपने आसपास व्यापारिक माहौल में बड़ा बदलाव देखा है। उनके अनुसार, 10-20 साल पहले वहां कुछ ही दुकानें थीं, लेकिन समय के साथ कई नए कारोबार खड़े हुए। उन्होंने कहा कि आज कई छोटे व्यापारी करोड़ों रुपये की संपत्ति और कारोबार की बात करते हैं। उनका तर्क था कि अगर जमीन पर जाकर वास्तविक स्थिति देखी जाए तो तस्वीर केवल निराशाजनक नहीं है।

शिक्षा और नौकरियों में बदलाव का उदाहरण देते हुए मकसूद अहमद ने अपने शिक्षक जीवन का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1992 में उनकी नियुक्ति एक स्कूल में जीव विज्ञान शिक्षक के रूप में हुई थी। उस समय जब कोई मुस्लिम छात्र मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेता था तो यह पूरे स्कूल के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उन्होंने बताया कि 1996 में एक छात्र के एमबीबीएस में पहुंचने पर स्कूल में मिठाई बांटी गई और 2007 में दो और छात्रों के मेडिकल में चयन पर भी खुशी मनाई गई। लेकिन उनके अनुसार, वर्ष 2014 से 2025 के बीच उनके स्कूल से अकेले 74 बच्चे मेडिकल क्षेत्र में चयनित हो चुके हैं। उनका कहना था कि यह बदलाव केवल एक संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता को दिखाता है।

उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी मुस्लिम युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। उनके द्वारा स्थापित Allama Rafiq Institute से भी दो विद्यार्थी आईआईटी तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि पुलिस सेवाओं में मुस्लिम युवाओं की संख्या बढ़ी है और दिल्ली में शिक्षकों की भर्ती में भी भागीदारी बढ़ी है। उनके अनुसार, रोजगार की कमी की धारणा का एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले नौकरी दिलाने के नाम पर बिचौलियों की भूमिका अधिक थी। लोग गार्ड की नौकरी, सफाई कर्मचारी की नौकरी या छोटी सरकारी और निजी नौकरियों के लिए दलालों को पैसे देते थे, लेकिन अब ऐसे माध्यम धीरे-धीरे कम हुए हैं।

मकसूद अहमद का कहना था कि मुस्लिम समाज में सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा को लेकर आया है। उनके अनुसार, पहले समाज के अंदर छोटे-छोटे विवादों और झगड़ों में पैसा, समय और ऊर्जा खर्च होती थी। वकीलों की फीस, थानों के खर्च और आपसी विवादों में संसाधन लग जाते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे वही संसाधन बच्चों की पढ़ाई और भविष्य बनाने में लगाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव समाज के अंदर से आया है।

इंटरव्यू में उन्होंने अपने सामाजिक कार्यों और Allama Rafiq Trust की स्थापना की कहानी भी साझा की। उन्होंने बताया कि जब वह एमएससी की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके कॉलेज में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था। उस कार्यक्रम में एक ओर पूर्व प्रधानमंत्री Vishwanath Pratap Singh बैठे थे और दूसरी कुर्सी खाली थी। कुछ समय बाद एक धार्मिक विद्वान वहां पहुंचे। उनसे मुलाकात के बाद मकसूद अहमद काफी प्रभावित हुए। बाद में उन्हें पता चला कि वह विद्वान कारी तैयब साहब के खलीफा थे, मौलाना अशरफ अली थानवी की परंपरा से जुड़े थे और धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक सेवा में भी सक्रिय थे। उनके अनुसार, वह व्यक्ति केवल धार्मिक विद्वान नहीं बल्कि समाज और देश की जरूरतों को समझने वाले व्यक्ति थे। इसी प्रेरणा से उन्होंने उनके नाम पर Allama Rafiq Trust की स्थापना की।
 
 
शिक्षा का आंदोलन, सामाजिक बदलाव और दीन-दुनिया की समझ

मकसूद अहमद ने बताया कि अल्लामा रफीक ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य समाज के उन वर्गों तक शिक्षा पहुंचाना है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उनका मानना है कि समाज में वास्तविक बदलाव केवल भाषणों या नारों से नहीं आता, बल्कि शिक्षा के माध्यम से आता है। इसी सोच के साथ ट्रस्ट ने छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में स्कूल स्थापित करने का काम शुरू किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में कुछ स्कूल खोले गए, लेकिन बाद में महसूस हुआ कि इस काम को एक व्यवस्थित संस्था के रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत है। इसके बाद ट्रस्ट का पंजीकरण कराया गया, जमीन खरीदी गई और शिक्षा के क्षेत्र में कार्य को विस्तार दिया गया।

मकसूद अहमद ने बताया कि उन्होंने हापुड़ जिले के सिंभावली क्षेत्र में एक स्कूल स्थापित किया। इसके लिए लगभग दो एकड़ जमीन ली गई और स्कूल को मान्यता दिलाई गई। उनके अनुसार, यह स्कूल पिछले लगभग 20 वर्षों से लगातार अच्छे परिणाम दे रहा है। उन्होंने बताया कि दसवीं कक्षा के परिणाम लगातार 90 प्रतिशत से अधिक रहे हैं। एक वर्ष में स्कूल के 231 विद्यार्थियों ने दसवीं की परीक्षा दी और लगभग 95.5 प्रतिशत परिणाम रहा। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि उत्तर प्रदेश में परीक्षा व्यवस्था काफी सख्त है और परीक्षा केंद्र कई बार दूर-दूर बनाए जाते हैं, इसके बावजूद बच्चों ने बेहतर प्रदर्शन किया।

मुस्लिम समाज में शिक्षा को लेकर बदलती सोच पर उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अब परिवार अपनी बेटियों की शिक्षा को पहले से अधिक महत्व देने लगे हैं। पहले कई परिवारों में लड़कियों की उच्च शिक्षा को लेकर झिझक होती थी, लेकिन अब मुस्लिम लड़कियां मेडिकल, इंजीनियरिंग, शिक्षण और अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ रही हैं। उनके अनुसार, शिक्षा को लेकर समाज की सोच में धीरे-धीरे सकारात्मक बदलाव आया है।

जब उनसे 1990 के दशक और आज के समय के अंतर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा परिवर्तन समाज की प्राथमिकताओं में आया है। उनके अनुसार, पहले बहुत सी ऊर्जा आपसी विवादों और छोटे-छोटे झगड़ों में खर्च हो जाती थी। पुलिस थाने, अदालत, वकीलों की फीस और विवादों से जुड़े खर्चों में पैसा चला जाता था। लेकिन अब धीरे-धीरे वही पैसा बच्चों की शिक्षा, कारोबार और भविष्य बनाने में लगाया जा रहा है। उनका कहना था कि समाज वही है और लोग वही हैं, लेकिन सोच में बदलाव आया है।

मुस्लिम समाज के सामाजिक और आर्थिक विकास पर बात करते हुए मकसूद अहमद ने कहा कि पिछले 20-25 वर्षों में बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। उनके अनुसार, सामाजिक जागरूकता बढ़ी है, आर्थिक स्थिति में सुधार आया है, शिक्षा के प्रति रुचि बढ़ी है और लोग पुराने सीमित सोच से बाहर निकल रहे हैं। उनका कहना था कि यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ है और इसे जमीन पर जाकर महसूस किया जा सकता है।

इंटरव्यू के अंतिम हिस्से में बातचीत दीन और दुनिया के संबंध पर पहुंची। जब उनसे पूछा गया कि "दीन और दुनिया" को साथ लेकर चलना कितना कठिन है, तो उन्होंने कहा कि वह दोनों को अलग-अलग नहीं मानते। उनका कहना था कि इंसान का हर अच्छा काम दीन का हिस्सा हो सकता है। अगर कोई व्यक्ति साफ-सफाई के साथ जीवन जीता है, अच्छे तरीके से व्यवहार करता है, किसी जरूरतमंद की मदद करता है या डॉक्टर बनकर किसी की जान बचाता है तो यह भी धार्मिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। उनके अनुसार, इस्लाम का मूल संदेश दूसरों की परेशानी कम करना और मानवता की सेवा करना है।

शिक्षा को इबादत का हिस्सा बताते हुए मकसूद अहमद ने कहा कि अंग्रेजी पढ़ना, विज्ञान सीखना या आधुनिक शिक्षा हासिल करना केवल दुनियावी चीजें नहीं हैं। अगर ज्ञान हासिल करके इंसान समाज की मदद करता है तो वह भी सेवा और धर्म का हिस्सा बन जाता है। उन्होंने कहा कि कुरान में केवल इबादत का संदेश नहीं बल्कि न्याय, इंसाफ, ज्ञान और जिम्मेदारी का भी संदेश दिया गया है। इसलिए शिक्षा और धर्म को अलग-अलग देखना सही नहीं है।

समाज में बढ़ती गलतफहमियों के कारणों पर उन्होंने कहा कि इसका एक बड़ा कारण ज्ञान की कमी है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई लोग धार्मिक शब्दों और परंपराओं को सही संदर्भ में नहीं समझते। उन्होंने "रिहान" का उदाहरण देते हुए कहा कि कुरान में जिस पौधे का उल्लेख आता है, उसके बारे में भी कई लोग पूरी जानकारी नहीं रखते। उनके अनुसार, जानकारी की कमी के कारण कई बार समाज में अनावश्यक दूरी और विवाद पैदा होते हैं।

भाषा और विश्वास के संबंध में उन्होंने कहा कि कई बार अलग-अलग शब्दों के कारण लोग एक-दूसरे से दूरी महसूस करने लगते हैं, जबकि भावनाएं समान हो सकती हैं। उनके अनुसार, अल्लाह अरबी भाषा का शब्द है, रब फारसी और पंजाबी परंपरा में भी प्रयोग होता है, ईश्वर हिंदी का शब्द है और ओम संस्कृत परंपरा से जुड़ा शब्द है। वैज्ञानिक भाषा में लोग प्रकृति और नेचर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना था कि शब्द अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसान की खोज और विश्वास की भावना में समानता हो सकती है।

नफरत खत्म करने के रास्ते पर मकसूद अहमद ने कहा कि समाज में नफरत का बड़ा कारण अज्ञानता है। अगर सभी समुदायों में जागरूकता और शिक्षा बढ़ेगी तो आपसी दूरी कम होगी। उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में सिख, जैन, हिंदू, ईसाई, पारसी और मुस्लिम सभी समुदायों ने मिलकर समाज बनाया है। उनका विश्वास था कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब केवल इतिहास की बात नहीं है, बल्कि आज भी समाज में मौजूद है।

सरकार और समाज की जिम्मेदारी पर उन्होंने कहा कि हर सरकार में अच्छाइयां और कमजोरियां दोनों हो सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार सरकारों से जुड़े कुछ लोग गलत काम करते हैं, जिससे सरकार की छवि प्रभावित होती है। उनके अनुसार, समाज को हर मुद्दे को केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए, बल्कि जमीन की वास्तविकता को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

मकसूद अहमद की पूरी बातचीत का मुख्य संदेश यह था कि किसी भी समाज की स्थिति को समझने के लिए केवल सोशल मीडिया के नैरेटिव पर्याप्त नहीं होते। शिक्षा, रोजगार, कारोबार, राजनीति और सामाजिक बदलाव—इन सभी क्षेत्रों में तस्वीर कई परतों वाली होती है। उनके अनुसार, चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन साथ ही प्रगति के उदाहरण भी मौजूद हैं। उनकी नजर में किसी भी समुदाय के आगे बढ़ने का सबसे बड़ा रास्ता शिक्षा, जागरूकता, मेहनत और समाज के अंदर सकारात्मक सोच का विकास है। यही वह रास्ता है जिससे कोई भी समुदाय आगे बढ़ सकता है और देश की प्रगति में अपनी भूमिका निभा सकता है। 

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