फरहान इजरायली/ जयपुर
जयपुर की पुरानी चुंगी और ऐतिहासिक चार दरवाजा के पास स्थित हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन शाह-ए-विलायत (रहमतुल्लाह अलैह) का आस्ताना सिर्फ एक मजहबी जगह नहीं है। यह राजस्थान की साझी विरासत और गंगा-जमुनी तहजीब का एक बड़ा केंद्र है। लगभग दो सौ सालों से यह खानकाह मोहब्बत, इंसानियत और आपसी भाईचारे का पैगाम बांट रही है। यहां मजहब और जात-पात से ऊपर उठकर हर समुदाय के लोग मन्नतें मांगने आते हैं।
दरगाह परिसर के भीतर मुगल स्थापत्य कला से बनी मस्जिद, आस्ताने, खानकाह, खानदान के कब्रस्तान, बागीचे और ताल-तलैया मौजूद हैं। यह पूरा परिसर उस दौर की याद दिलाता है जब सूफी आस्ताने केवल इबादत के लिए ही नहीं बनते थे। वे रूहानी तालीम, उम्दा अखलाक, समाजी खिदमत और सीधे रास्ते का बड़ा जरिया हुआ करते थे।
दरगाह के मौजूदा सज्जादानशीन और गद्दीशीन सैयद ज़ियाउद्दीन ज़ियाई (ज़िया मियां) इस रूहानी सिलसिले के बारे में बताते हैं। उनका कहना है कि उनका सिलसिला फखरी निज़ामी चिश्ती है। हालांकि उनका परिवार चिश्तिया, कादरिया, सुहरवर्दिया और नक्शबंदिया जैसे कई सिलसिले से जुड़ा है, लेकिन उनकी मुख्य पहचान चिश्तिया निज़ामिया चिश्ती सिलसिले से ही है।
हज़रत मौलाना फखरूद्दीन फखर-ए-जहां देहलवी (आरए) इस सिलसिले के बहुत बड़े बुजुर्ग हुए हैं। उन्हीं की रूहानी डोर से जुड़कर हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब ने काम शुरू किया था। पूरे राजस्थान और हिंदुस्तान में उन्हें "मौलाना साहिब जयपुरी" के नाम से जाना और माना जाता है।
हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब का जन्म 1150 हिजरी में दिल्ली के ग्यासपुर इलाके में हुआ था। वह एक संभ्रांत सैयद परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके माता और पिता दोनों की पीढ़ी हसनी-हुसैनी चिश्ती परंपरा से मिलती है।
सूफी परंपरा में ऐसे पाक परिवार को 'नजीबुत-तरफैन' कहा जाता है। मौलाना साहिब को चिश्ती, कादरिया, नक्शबंदिया, सुहरवर्दिया, नूरबख्शिया, शत्तारी और फिरदौसिया जैसे कई सूफी सिलसिलों में मुरीद बनाने की खास इजाजत हासिल थी। उनके चाहने वाले उन्हें रूहानी रहनुमा और अपने दौर का कुतुब मानते हैं।

दिल्ली से जयपुर का सफर और जयनगर की ज़मीन
भारत में चिश्तिया सिलसिले की नींव हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती गरीब नवाज़ अजमेरी ने रखी थी। उनके बाद यह जिम्मेदारी ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, बाबा फरीदुद्दीन गंज-ए-शकर और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया महबूब-ए-इलाही के पास आई। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के बाद यह धारा चिश्तिया निज़ामिया के नाम से मशहूर हो गई।
समय के साथ इस सिलसिले में कई बदलाव आए। आगे चलकर हज़रत शेख कलीमुल्लाह जहानाबादी और उनके जानशीनों ने इसे एक नई ताकत दी। हज़रत मौलाना फखरूद्दीन फखर-ए-जहां देहलवी इसी कड़ी के एक मशहूर बुजुर्ग थे। हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब उनके सबसे प्रमुख और चहेते खलीफाओं में गिने जाते थे।
मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब जब जयपुर आए, तब इस शहर को जयनगर के नाम से जाना जाता था। उन्होंने धीरे-धीरे जयपुर को अपनी रूहानी और समाजी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बना लिया। उनकी खानकाह में दिन-रात लोगों का तांता लगा रहता था। सभी समाजों के लोग उनसे जुड़ने लगे थे।
दरगाह की पुरानी रिवायतों के मुताबिक, उनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखकर कुछ लोगों ने तत्कालीन महाराजा सवाई प्रताप सिंह के दरबार में शिकायत कर दी। महाराजा ने मौलाना साहिब को दरबार में पेश करने के लिए अपने सिपाहियों को भेजा। कहते हैं कि सिपाही मौलाना साहिब के करीब तक पहुंच ही नहीं पाए और आगे बढ़ने में नाकाम रहे।
इस घटना को लोग एक करामात के रूप में याद करते हैं। इसके बाद महाराजा सवाई प्रताप सिंह खुद मौलाना साहिब से मिलने उनके ठिकाने पर पहुंचे। पहली ही मुलाकात में राजा मौलाना साहिब के रूहानी व्यक्तित्व और सादगी से इतने प्रभावित हुए कि उनके दिल में गहरा सम्मान पैदा हो गया। इसके बाद यह आस्ताना ज्ञान, सूफीवाद और लोक कल्याण का बहुत बड़ा केंद्र बन गया।

तालीम और रूहानी तरबियत का बड़ा केंद्र
जयपुर आने के शुरुआती दिनों में मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब ने कमानगरान मोहल्ले में अपना ठिकाना बनाया था। बाद में उन्होंने चार दरवाजा के पास हांडीपुरा मोहल्ले को अपना मुख्य केंद्र बनाया। उनकी ज्ञान की सभाएं यहीं की मदरसा मौलाना साहिब और मस्जिद मौलाना साहिब में लगने लगीं।
धीरे-धीरे यह जगह धार्मिक शिक्षा और आत्मिक सुधार का केंद्र बन गई। यहां सिर्फ किताबों की पढ़ाई ही नहीं होती थी। इंसान के चरित्र को सुधारने और उसमें इंसानियत जगाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था।
कुरान, हदीस और फिकह की तालीम के साथ-साथ सूफी विचारों को सिखाया जाता था। छात्र यहां आकर किताबी ज्ञान के साथ-साथ ईमानदारी, खुद का आकलन करना और मानवता के गुण सीखते थे।
इस खानकाह का नाम सिर्फ जयपुर या राजस्थान तक सीमित नहीं था। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, दक्कन, अफगानिस्तान और यहां तक कि चीन से भी छात्र और अकीदतमंद तालीम और दुआएं लेने यहां आते थे।
खानकाह के दो हिस्से काफी मशहूर हैं। पहला है 'गुलाबी दालान', जहां मदरसे की कक्षाएं चलती थीं, जनसभाएं होती थीं और जलसे आयोजित किए जाते थे। दूसरा है 'संदली दालान', जो हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब की व्यक्तिगत इबादत की जगह थी। यहां बैठकर वे लंबी साधना, ज़िक्र और रियाज़त किया करते थे।

दरगाह, मस्जिद और निर्माण का किस्सा
अठारहवीं सदी के अंत में हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब ने चार दरवाजा के पास खानकाह, मस्जिद और दरगाह परिसर का निर्माण शुरू करवाया। यह परिसर आगे चलकर उनकी रूहानी विरासत का स्थायी घर बन गया।
निर्माण कार्य से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा आज भी लोग सुनते हैं। मौलाना साहिब मजदूरों को मजदूरी देने के लिए अपने मुसल्ले (जायामाज़) के नीचे से सिक्के निकालकर देते थे। एक मजदूर के मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि मुसल्ले के नीचे खजाना छुपा है। उसने रात के अंधेरे में जाकर उस जगह की खुदाई की, लेकिन उसे वहां मिट्टी के अलावा कुछ नहीं मिला।
अगले दिन जब वह मजदूर काम पर आया, तो मौलाना साहिब ने मुस्कुराते हुए उसे दो दिन की मजदूरी थमा दी। उन्होंने कहा कि तुमने रात में भी बहुत मेहनत की है। मौलाना साहिब की इस बात और मखमली दिल को देखकर वह मजदूर रो पड़ा और तुरंत उनका मुरीद बन गया।

टोंक के नवाब मीर खान का समर्पण
मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब का प्रभाव जयपुर के बाहर भी दूर-दूर तक फैला हुआ था। टोंक के नवाब मीर खान से जुड़ी एक कहानी दरगाह के इतिहास में दर्ज है। एक बार नवाब की कैद से भागा हुआ एक शख्स मौलाना साहिब के एक शिष्य काजी साहिब की शरण में आ गया। काजी साहिब ने उस बेबस शख्स को नवाब के हवाले करने से साफ मना कर दिया।
नवाब की सेना ने काजी साहिब के घर को घेर लिया। संकट में देखकर काजी साहिब ने अपने पीर मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब का ध्यान किया। जब नवाब मीर खान को इस बात की पूरी सच्चाई पता चली, तो वह खुद चलकर जयपुर आए। वह मौलाना साहिब की खिदमत में हाजिर हुए और उनके कदमों में अपनी तलवार और पगड़ी रख दी। नवाब ने मौलाना साहिब के सामने अपना सिर झुकाया और उनके मुरीद बन गए।
खिदमत-ए-हल्क: इंसानियत की निस्वार्थ सेवा
इस खानकाह की सबसे बड़ी ताकत इसकी निस्वार्थ सेवा भावना थी। चिश्ती सिलसिले में भगवान की बनाई दुनिया की सेवा करने को सबसे बड़ी इबादत माना जाता है। इसीलिए इस आस्ताने के दरवाजे हर गरीब, भूखे, मुसाफिर और परेशान इंसान के लिए हमेशा खुले रहते थे।
यहां आने वाले मेहमानों के रहने, खाने-पीने और दूसरी जरूरतों का पूरा ख्याल रखा जाता था। दूर-दराज से आने वाले यात्रियों के विश्राम का खास इंतजाम होता था। मौलाना साहिब का नियम था कि वे पहले आने वाले व्यक्ति की खातिरदारी करते थे, फिर उसकी समस्या सुनकर उसका समाधान निकालते थे।
मौलाना साहिब के सब्र और ठंडे मिजाज की भी एक मिसाल दी जाती है। एक बार उनकी मजलिस में बैठकर एक आदमी सूफियों और संतों की बुराई करने लगा। मौलाना साहिब ने न तो उसे टोका और न ही कोई गुस्सा दिखाया।
वे शांत मन से उसकी पूरी बात सुनते रहे। जब वह आदमी बोलते-बोलते थक गया, तो मौलाना साहिब ने उसे सम्मान के साथ मीठा खिलाया और मुस्कुराकर दोबारा आने का न्योता दिया।
वह आदमी मौलाना साहिब का यह व्यवहार देखकर हैरान रह गया। तब मौलाना साहिब ने कहा कि यह एक फकीर का घर है, और फकीर का काम लोगों के दिल जीतना होता है, उन्हें तोड़ना नहीं।
उर्स और बसंत की पुरानी परंपराएं
हज़रत मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब का उर्स हर साल इस्लामी महीने ज़िलकाद की 21 तारीख से 25 तारीख तक बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। 25 ज़िलकाद 1230 हिजरी को उनका देहांत हुआ था। उर्स के दौरान मिलाद शरीफ, मुशायरा, महफिल-ए-समां, कुल शरीफ और दुआओं के कार्यक्रम होते हैं।
इसके अलावा रजब के महीने में ख्वाजा गरीब नवाज की याद में भी विशेष सभाएं होती हैं। इस दरगाह में बीते एक शतक से बसंत उत्सव मनाने की अनोखी परंपरा चली आ रही है। बसंत पंचमी के दिन मजार शरीफ पर पीले सरसों के फूल पेश किए जाते हैं, जो हिंदू-मुस्लिम एकता की एक खूबसूरत मिसाल है।
सज्जादानशीनों की रूहानी विरासत
मौलाना ज़ियाउद्दीन साहिब के बाद उनके भतीजे हज़रत सैयद गुलाम रसूल साहिब ने दरगाह की गद्दी संभाली थी। मौजूदा गद्दीशीन सैयद ज़ियाउद्दीन ज़ियाई (ज़िया मियां) बताते हैं कि सज्जादानशीन का पद सिर्फ कोई कुर्सी या औहदा नहीं है। यह बुजुर्गों की दी हुई सीख, खानकाही परंपराओं और इंसानियत के संदेश को आगे बढ़ाने की एक बड़ी जिम्मेदारी है।
ज़िया मियां ने अपनी पढ़ाई जयपुर और राजस्थान विश्वविद्यालय से पूरी की है। इसके बाद उन्होंने औरंगाबाद से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की। वे बताते हैं कि सूफी परंपरा का असली मकसद इंसान के चरित्र को निखारना है। अपने पीर-ओ-मुर्शिद से मिली तालीम इंसान को सही-गलत का फर्क समझाती है और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाती है।
जैसे ही शाम ढलती है, दरगाह के खुले आंगन में चिराग जल उठते हैं। दुआ के लिए हाथ उठते ही अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखाई देते हैं। दो सौ सालों से खड़ा यह आस्ताना आज भी जयपुर शहर की साझा संस्कृति, प्यार और भाईचारे का संदेश दे रहा है।