
हरजिंदर
उस समय जब दुनिया भर में इस्लामफोबिया और समुदायों की आपसी नफरत चिंता का विषय बनी हुई है ताईवान में जो हो रहा है वह उम्मीद की एक किरण देता है।पहले बात करते हैं ताईवान में रहने वाले मुसलमानों की। चीन से अलग होकर बने इस देश में मुसलमानों की आबादी बहुत कम है।
इनमें ज्यादातर वे हैं जो चीन की मुख्यभूमि से 1949 में यहां उस समय आकर बसे थे जब जब एक तरह से दोनों देशों का विभाजन हुआ था। वैसे यह विभाजन एक अलग तरह की कहानी है जिसमें दोनों ही देश अपने आप को वास्तविक चीन मानते हैं।
आज जिसे हम ताईवान कहते हैं वह कभी एक द्वीप के रूप में चीन का ही एक हिस्सा था था और उसे फारमोसा के नाम से भी जाना जाता था इसके अलावा ताईवान में मुसलमानों की एक छोटी सी आबादी वह भी है जो इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों से मजदूरी या रोजगार के लिए आए फिर यहीं बस गए।

पिछले दिनों सरकारी प्रयासों से राजधानी ताईपेयी में देश के मुस्लिम नेताओं की एक बैठक हुई जिसमें कईं सरकारी अधिकारियों ने भाग लिया। इस बैठक में कहा गया कि देश के मुसलमान ताईवान की एक ‘रणनीतिक संपदा‘ हैं।
इस जुमले की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि ताईवान पिछले कुछ समय से दुनिया के मुस्लिम देशों से अपने रिश्ते और व्यापारिक संबंध मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है उसका मानना है कि इस काम में देश का मुस्लिम समुदाय उसकी मदद कर सकता है।
इस काम में सबसे ज्यादा मदद ली गई है ताईपेयी ग्रैंड माॅस्क फाउंडेशन के चेयरमैन तेंग चाई-सियांग की। चाई-सियांग तुर्की में ताईवान के राजदूत भी रह चुके हैं। वहां उन्होंने जो सिलसिला शुरू किया था अब उसे ही आगे बढ़ाया जा रहा है।
Bu bir devrimdir!
Singapur’da Müslümanların oranı % 17.
Ama cumhurbaşkanı Müslüman bir hanım ve destan yazıyor…
Singapur’da uyuşturucu ve tecavüzün karşılığı idam cezası.
Zina, fuhuş ağır şekilde cezalandırılıyor.
Toplum huzur ve güven içinde.
Bu ülkenin ve ortamın mimarı…
— yusuf kaplan (@yenisafakyazari) August 16, 2026
ग्यारह अगस्त को हुई इस बैठक में मुस्लिम देशों से रिश्ते सुधारने के लिए ताईपेयी ग्रैंड माॅस्क को शो-केस करने की भी बात हुई।चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद उससे अलग हो जाने वाले इस देश का इतिहास बड़ा अजीब रहा है।
चीन कभी भी उस पर कब्जा करने की कोशिश कर सकता है यह डर लगातार उसकी मानसिकता का हिस्सा बना हुआ है। हालांकि इस बीच उसने अपने आप को एक विकसित देश जरूर बना लिया है।
उसे लंबे समय तक अमेरिका से सैनिक मदद भी मिलती रही है। लेकिन अमेरिका की बदलती सोच के बीच वह अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी में अब खुद के पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहा है। आर्थिक तौर पर तो खैर वह अपने पैरों पर खड़ा ही है।

ऐसे में वह अपने अल्पसंख्यकों को जिस तरह से मदद ले रहा है उससे दुनिया चाहे तो सबक ले सकती है। वह दुनिया जहां अल्पसंख्यकों को समस्या माना जाता है और राजनीति उनके प्रति नफरत को बढ़ावा देती है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
ALSO READ यह समझौता ‘मुस्लिम नाटो‘ तो नहीं ही है