
हरजिंदर
डोनाल्ड ट्रंप जब चुनाव लड़ रहे थे तो अमेरिका के मुसलमानों से और खासकर अरब मूल के लोगों से मिले थे। उनके वोट चाहिए थे इसलिए उनकी तारीफ भी की थी। बहुत से लोगों ने उनका इस उम्मीद में समर्थन भी किया था कि शायद तस्वीर बदल जाए। लेकिन तस्वीर बदली नहीं और अब ज्यादा ही बिगड़ रही है।
इस बात को जितना अमेरिकी शहरों और कस्बों की गलियों-सड़कों से समझा जा सकता है उससे ज्यादा उससे कहीं ज्यादा अमेरिका के विश्वविद्यालयों में देखा जा सकता है। नफरत को दौर जितना इन गलियों में दिख रहा है उससे कहीं ज्यादा वहां के परिसरों में दर्ज हो रहा है।

पिछले दिनों अमेरिका के कौंसिल आॅन अमेरिकन इस्लामिक रिलेशन ने यह मापने के लिए कि विश्वविद्यालयों में मुसलमानों के प्रति विरोध या फिर नफरत का भाव कितना है, उनकी रेटिंग की। कुल 51 बड़े विश्वविद्यालयों की रेटिंग की गई और जो नतीजा मिला वह चैकाने वाला था।
पूरे अमेरिका में कोई भी विश्वविद्यालय ऐसा नहीं मिला जिसकी रेटिंग सकारात्मक यानी पाॅज़िटिच हो। यानी कहीं भी इस विरोध या नफरत का भाव या फिर इस्लामफोबिया पूरी तरह से गायब हो।यह मामला इसलिए भी ज्यादा चिंता का है कि अमेरिकी शहरों की गलियों में जो दिखता है वह वहां का वर्तमान है, लेकिन विश्वविद्यालयों में जो हो रहा है उसे हम वहां का भविष्य मान सकते हैं।
सबसे खराब स्थिति सिटी यूनिवर्सिटी आॅफ न्यूयाॅर्क की है। उस समय जब न्यूयाॅर्क शहर एक मुसलमान जोहरान ममदानी को अपना मेयर चुनता है और इसे लोग इस महानगर की ताकत कहते हैं। ठीक उसी समय वहां के विश्वविद्यालय में जितनी नफरत पनप रही है, उसने अमेरिका के दूसरे परिसरों को काफी पीछे छोड़ दिया है।

न्यूयाॅर्क के इस विश्वविद्यालय के विपरीत छह विश्वविद्यालय ऐसे हैं जिनमें स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं लेकिन बेहतर है। कौंसिल की रिपोर्ट का कहना है कि यह तो नहीं कहा जा सकता कि इनमें मुसलमानों के प्रति विरोध का भाव पूरी तरह नदारत है लेकिन यहां हालात बाकी जगह जितने खराब नहीं हैं। इनमें अल्बामा विश्वविद्यालय सबसे आगे है।
वहां 12 विश्वविद्यालय ऐसे मिले जहां एंटीसेमीटिज़्म के नियम लागू हैं। यानी वहां आप यहूदियों के प्रति नफरत का भाव नहीं व्यक्त कर सकते। लेकिन इसका इस्तेमाल करते हुए इस्रायल और उसके अत्याचारों की आलोचना भी पूरी तरह रोक दी जाती है।

75 फीसदी विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां अगर लोग गाज़ा को लेकर प्रदर्शन करते हैं तो पुलिस बुला ली जाती है। कौंसिल के अध्यक्ष मरयम हसन ने बताया कि वैसे सभी विश्वविद्यालय यह कहते हैं कि फ्री स्पीच यानी बोलने की आजादी और अकादमिक आजादी होगी लेकिन मुसलमानों के मामले में यह ज्यादातर जगह यह प्रतिबद्धता गायब है।विश्वविद्यालयों की यह स्थिति बताती है कि अमेरिका में सोच किस तरफ जा रही है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
ALSO READ मतभेद से आगे ममदानी की राजनीति