पक्षियों को भी चाहिए स्पेस: क्या हम सच में प्रकृति संरक्षण के लिए तैयार हैं?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 03-09-2025
Birds need space too: Are we really ready for nature conservation?
Birds need space too: Are we really ready for nature conservation?

 

fआशीष दत्त

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स स्थित एक फुटबॉल स्टेडियम में घटी एक घटना ने वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित किया.एक लैपविंग पक्षी ने स्टेडियम के मैदान में अंडे दिए, जिसके बाद संबंधित प्रशासन ने पूरे स्टेडियम को एक महीने के लिए बंद कर दिया.यह निर्णय इसलिए लिया गया ताकि देशी और संरक्षित पक्षी प्रजाति के प्रजनन में कोई बाधा न उत्पन्न हो.यह उदाहरण दर्शाता है कि कुछ देश वन्यजीवों और पक्षियों के लिए किस हद तक प्रतिबद्ध हैं.

सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर काफी चर्चा हुई—कुछ लोगों ने इसे प्रकृति संरक्षण की दिशा में प्रशंसनीय कदम बताया, तो कुछ ने इसे अतिशय प्रतिक्रिया कहा.किंतु जब हम वैश्विक घटनाओं को गहराई से देखते हैं, तो समझ में आता है कि ऐसे निर्णय उन देशों के मजबूत पर्यावरणीय सिद्धांतों, कानूनों और नागरिकों की संवेदनशीलता का परिणाम होते हैं.

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इसी तरह की एक अन्य घटना अमेरिका के मिनेसोटा में सामने आई, जहाँ एक ऑस्प्रे पक्षी ने हाई स्कूल स्टेडियम की लाइट पोस्ट पर घोंसला बना लिया.प्रशासन को न केवल खेल प्रतियोगिता का समय बदलना पड़ा, बल्कि रात के खेल को दिन में आयोजित करना पड़ा ताकि तेज रोशनी से पक्षी या उसका घोंसला प्रभावित न हो.

इसी तरह, 2019में न्यू जर्सी के एक फुटबॉल मैदान को 'किल्डियर' नामक पक्षी की सुरक्षा के लिए अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया, क्योंकि वह मैदान के गोलपोस्ट के पास अपना घोंसला बना चुका था.किल्डियर अमेरिका-कनाडा प्रवासी पक्षी संधि के अंतर्गत संरक्षित है और उसे नुकसान पहुंचाना कानूनी अपराध माना जाता है.

2014 में अमेरिका के ह्यूस्टन स्थित एक पार्क में मवेशी बगुलों की प्रजनन गतिविधियों के कारण उसे आम लोगों के लिए अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया था.

पार्क के प्रवेश द्वार पर एक सूचना बोर्ड लगाया गया जिसमें स्पष्ट किया गया कि "पक्षियों के प्रजनन के कारण पार्क बंद है." इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक गहरी समझ और गंभीरता विकसित हो चुकी है.

केवल अमेरिका या ऑस्ट्रेलिया ही नहीं, यूनाइटेड किंगडम और वेल्स के शहरों में भी पक्षियों के घोंसले बनने की स्थिति में जलपार्क और अन्य मनोरंजक स्थल अस्थायी रूप से बंद किए जाते हैं.वहाँ के लोग इस असुविधा को सहर्ष स्वीकार करते हैं, क्योंकि उनके लिए प्रकृति के साथ संतुलन बनाना एक जिम्मेदारी है, न कि बोझ.

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यदि हम अपने देश की बात करें, तो भारत में भी प्रकृति संरक्षण की दिशा में कई सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं.उदाहरणस्वरूप, सुंदरबन क्षेत्र में हर साल जून से अगस्त के बीच तीन महीनों तक स्थानीय वनपालों, मछुआरों और पर्यटकों के प्रवेश पर प्रतिबंध रहता है.

यह प्रतिबंध इस उद्देश्य से लगाया जाता है कि वन्यजीवों और मछलियों को उनके प्रजनन काल में किसी प्रकार की बाधा न हो और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को विश्राम का अवसर मिले.

इसके अलावा, बंगाली गिद्ध जैसे गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षियों के संरक्षण के लिए भी भारत ने उल्लेखनीय प्रयास किए हैं.यह गिद्ध प्रजाति भारत, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान समेत दक्षिण एशिया के कई देशों में पहले सामान्य रूप से पाई जाती थी, लेकिन अब इसकी संख्या चिंताजनक रूप से घट चुकी है.

भारत के सिलहट और रेमा-कलेंगा वन्यजीव अभयारण्य में यह पक्षी अभी भी देखा जा सकता है.वन विभाग और IUCN जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की सहायता से इस पक्षी की प्रजनन प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए नियमित रूप से मृत पशु मांस की आपूर्ति की जाती है, जिससे इसकी प्राकृतिक जीवन प्रक्रिया बाधित न हो.

प्राकृतिक संरक्षण के लिए केवल कानून या प्रतिबंध पर्याप्त नहीं होते.इसके लिए आम नागरिकों की समझ, सहनशीलता और सहभागिता भी उतनी ही आवश्यक है.

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आज हम देख रहे हैं कि वनों का अंधाधुंध दोहन, नगरीकरण, कृषि विस्तार और औद्योगिक विकास के चलते वन्यजीवों और पक्षियों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ते जा रहे हैं.इसके कारण ये जीव मानव बस्तियों, शहरों, खेतों और मानव निर्मित संरचनाओं में शरण लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं.यह स्थिति न केवल उनके लिए खतरनाक है, बल्कि मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को भी जन्म देती है.

हमें यह समझना होगा कि सह-अस्तित्व ही भविष्य का मार्ग है.जब कोई पक्षी हमारे स्टेडियम या पार्क में घोंसला बनाता है, तो हमें उसे सिर्फ़ एक रुकावट के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि हमने ही उसके प्राकृतिक आवास छीन लिए हैं.हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्या हम अपने विकास की योजनाओं में वन्यजीवों के लिए जगह छोड़ रहे हैं या नहीं?

प्राकृतिक और सुरक्षित वैकल्पिक आवास बनाना, वनों के संरक्षण को प्राथमिकता देनाऔर जनमानस में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जगाना—ये सभी कदम ज़रूरी हैं ताकि भविष्य में हम ऐसी स्थिति से बच सकें जहाँ किसी पक्षी को जीवित रहने के लिए स्टेडियम या लाइट पोस्ट का सहारा लेना पड़े.

जाने-माने ब्रिटिश पर्यावरणविद् जेन गुडॉल ने कहा था:"यदि हम समझेंगे, तभी हम परवाह करेंगे.यदि हम परवाह करेंगे, तभी हम मदद करेंगे.और यदि हम मदद करेंगे, तभी हम सभी को बचा सकेंगे."

यह संदेश हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा केवल सरकारों की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जवाबदेही है.इसलिए, जब अगली बार कोई पक्षी आपके आँगन, बालकनी, पार्क या स्टेडियम में घोंसला बनाए, तो उसे रुकावट नहीं, बल्कि अवसर समझें—प्रकृति से फिर से जुड़ने का अवसर.

(आशीष दत्त, सहायक प्रोफेसर, प्राणीशास्त्र विभाग)