मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली
एशियन गेम्स 2026 में भारत का परचम लहराने के लिए देश के युवा एथलीट पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इस महाकुंभ में भारत को ऐतिहासिक स्वर्ण पदक के बेहद करीब पहुंचाने में एक नाम सबसे आगे चल रहा है, और वह नाम है रोअर सलमान खान का। सलमान ने सतनाम सिंह और बलराज पंवार के साथ मिलकर क्वाड्रपल रोइंग फाइनल के लिए शानदार क्वालिफाई कर लिया है।

इस सफलता के पीछे उनकी सालों की कड़ी मेहनत, कभी न हार मानने वाला जज्बा और एक ऐसा संघर्षपूर्ण अतीत है जो हर किसी को हैरान कर देता है। एक विशेष बातचीत में सलमान खान ने अपने जीवन के काले पन्नों से लेकर खेल के मैदान की चमक तक के सफर को बेहद खुलकर साझा किया है। उन्होंने बताया कि कैसे कम उम्र में आई विपत्तियों ने उन्हें मजबूत बनाया और उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के पुरे ढिंगाई (खैरहना) में जन्मे सलमान का बचपन बहुत अभावों में बीता। उनके पिता मोहम्मद कासिम खान हरियाणा के तौरू में ट्रक निर्माण का काम करते थे। परिवार में चार भाई और दो बहनें थीं। सबसे बड़े होने के नाते जिम्मेदारियां कम उम्र में ही उनके कंधों पर आ गईं।

जब सलमान मात्र 18 साल के थे, तब डेंगू की वजह से उनके पिता का निधन हो गया। इस सदमे ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। छोटे भाई-बहन पढ़ाई कर रहे थे और घर की आर्थिक हालत बेहद खराब थी। बचपन से सेना में जाने का जो सपना उन्होंने देखा था, वह कहीं पीछे छूट गया। परिवार का पेट पालने के लिए उन्हें मजबूरी में दिल्ली की सड़कों पर दिन-रात उबर कैब चलानी पड़ी।
एक दिन टैक्सी चलाने के बाद जब वे आराम कर रहे थे, तब उनके एक करीबी दोस्त का फोन आया। दोस्त ने उनकी अच्छी लंबाई और शारीरिक बनावट को देखकर याद दिलाया कि उन्हें सेना में जाने का अपना सपना नहीं छोड़ना चाहिए। इस एक सलाह ने उनकी सोई हुई उम्मीदों को फिर से जगा दिया।
सलमान ने बिना देर किए टैक्सी दूसरे ड्राइवर को सौंप दी और पूरी तरह से तैयारी में जुट गए। चार महीने तक दिन-रात एक करके उन्होंने कठिन मेहनत की। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने भर्ती रैली, मेडिकल और लिखित परीक्षा पास कर ली। 25 सितंबर 2018 को उन्होंने बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप, किरकी, पुणे में ज्वाइन कर लिया।
प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षकों की नजर उनकी शारीरिक बनावट पर पड़ी। उन्होंने सलमान को नौकायन यानी रोइंग से परिचित कराया। शुरुआत में सलमान का इस खेल से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था और उनकी इसमें कोई रुचि भी नहीं थी। उन्हें लगता था कि खेल जैसी चीजें उनके जैसे आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों के लिए नहीं हैं।
उन्होंने कई बार मना किया, लेकिन कोचों की जिद और उनकी छिपी हुई प्रतिभा को पहचानने की क्षमता ने उन्हें पानी में उतार दिया। पहली अंतर-केंद्रीय नौका प्रतियोगिता में रजत पदक जीतने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा।
साल 2021 उनके करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब उन्होंने एर्गोमीटर के मानकों को पार किया और सीएमई पुणे में आर्मी रोइंग नोड के लिए चुने गए। देश के सर्वश्रेष्ठ रोवरों के साथ ट्रेनिंग ने उन्हें इस खेल का दीवाना बना दिया।
सलमान अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने परिवार, विशेष रूप से अपनी मां और पत्नी साहिबा खातून को देते हैं, जिन्होंने हर मुश्किल वक्त में उनका साथ निभाया। इसके अलावा, सेना के अधिकारियों और कोचों का मार्गदर्शन उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं रहा।

चाहे वह 2022 के राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीतना हो, या 2024 में दक्षिण कोरिया में एशियाई रोइंग कप में अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक हासिल करके भारतीय सेना में नायब सूबेदार बनना हो, सलमान ने हर कदम पर अपनी काबिलियत साबित की है। इस दौरान उन्हें सेना में तरक्की भी मिली और उनका हौसला भी बढ़ा।
आज सलमान अपनी टीम के साथियों बलराज पंवार, सतनाम सिंह और जकार खान के साथ जापानी जलधाराओं में इतिहास रचने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका पूरा ध्यान 2000 मीटर की इस रेस में अपनी रणनीति को सटीक रूप से लागू करने पर है।
उबर कैब के स्टीयरिंग से लेकर देश के लिए तिरंगा फहराने तक का सलमान खान का सफर हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों से लड़कर अपने सपनों को सच करना चाहता है। पूरा देश अब उनके इस ऐतिहासिक फाइनल मुकाबले का इंतजार कर रहा है।