इक्कीसवीं सदी के भारत में मौलाना मौदूदी की राजनीतिक विचारधारा के लिए कोई जगह क्यों नहीं

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 22-09-2026
Why is there no place for Maulana Maududi's political ideology in twenty-first-century India?
Why is there no place for Maulana Maududi's political ideology in twenty-first-century India?

 

ffसाकिब सलीम

“बेशक!मुझे इस बात से कोई आपत्ति नहीं होगी, भले ही भारत के मुसलमानों को सरकार के उस रूप में 'शूद्रों' और 'मलेच्छों' (अछूतों) की तरहट्रीटकिया जाए और उन पर मनु के कानून लागू किए जाएं, जिससे उन्हें सरकार में और एक नागरिक के अधिकारों में कोई हिस्सा न मिले।” 1953 की जस्टिस मुनीर आयोग की रिपोर्ट में दर्ज मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी का यह बयान वह पहला प्रसंग था जिसने मुझे भारतीय मुसलमानों के संदर्भ में मदूदी के राजनीतिक विचारों पर गहराई से सोचने के लिए प्रेरित किया।

पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस मुनीर ने 1953 में अहमदिया-विरोधी दंगों की जाँच का नेतृत्व किया था और नोट किया था: "जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा बिल्कुल सीधी है। इसका उद्देश्य पूरी दुनिया में अल्लाह की संप्रभुता (प्रभुसत्ता) की स्थापना करना है, जिसका दूसरे शब्दों में अर्थ एक ऐसे धर्म-राजनीतिक (रिलीज़ियो-पॉलिटिकल) तंत्र की स्थापना है जिसे जमात 'इस्लाम' कहती है।

इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए यह न केवल प्रचार में विश्वास रखती है, बल्कि संवैधानिक माध्यमों से और जहाँ संभव हो बलपूर्वक राजनीतिक नियंत्रण हासिल करने में विश्वास रखती है। ऐसी सरकार जो जमात की अवधारणा पर आधारित न हो, उदाहरण के लिए जहाँ यह राष्ट्र की अवधारणा पर आधारित हो, वह मौलाना अमीन अहसान इसलाही के अनुसार एक 'शैतानी सरकार' है, और खुद मौलाना अबुल आला मदूदी के अनुसार 'कुफ्र' (अधर्म) है, और ऐसी सरकार में प्रशासक के रूप में या अन्यथा भाग लेने वाले, या ऐसे तंत्र के आगे स्वेच्छा से झुकने वाले सभी व्यक्ति पापी हैं।"

मौदूदी 1903 में औरंगाबाद में जन्मे एक पत्रकार थे जिन्होंने 1941 में जमात-ए-इस्लामी की स्थापना की थी। बाद में, वे पाकिस्तान की एक इस्लामिक संविधान की मांग के पीछे मुख्य वैचारिक रणनीतिकार बने।

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राज्य के सिद्धांत (थ्योरी ऑफ़ द स्टेट) के बारे में मदूदी के दृष्टिकोण को उनकी किताबें  'अल जिहाद फिल इस्लाम' और 'द इस्लामिक लॉ एंड द कॉन्स्टिट्यूशन' पढ़कर समझा जा सकता है।

इन दोनों किताबों को आज, लिखे जाने के लगभग एक सदी बाद पढ़ने पर कोई भी यह समझ सकता है कि मौदूदी की राजनीति का दृष्टिकोण-भले ही उसे उसके अपने तर्क के भीतर कितनी भी सावधानी से और लगातार गढ़ा गया हो,भारतीय संविधान या इक्कीसवीं सदी की दुनिया के साथ किसी भी तरह से मेल नहीं खा सकता।

इसकी शुरुआत एक सीधी सी बात से होती है। संप्रभुता सिर्फ और सिर्फ ईश्वर की है। मौदूदी 'द इस्लामिक लॉ एंड द कॉन्स्टिट्यूशन' में लिखते हैं, "इस्लाम ईश्वर के अलावा किसी अन्य की संप्रभुता को स्वीकार नहीं करता है और परिणामस्वरूप, उसके अलावा किसी अन्य कानून-निर्माता को मान्यता नहीं देता है।"

चूंकि केवल ईश्वर ही संप्रभु है, इसलिए कोई भी संसद और नागरिकों की कोई भी आम सहमति कानून बना या उनमें संशोधन नहीं कर सकती है।इसी पुस्तक में वे आगे लिखते हैं, "ईश्वर की डी जुरे (कानूनी) संप्रभुता के आधार पर स्थापित कोई भी राज्य, कुरान और सुन्नत के विपरीत जाकर कानून नहीं बना सकता, भले ही उसके लोगों की आम सहमति इसकी मांग ही क्यों न करे।"

मौदूदी ने अपनी इच्छित व्यवस्था के लिए एक नया शब्द गढ़ा, इसे लोकतंत्र (डिमॉक्रसी) न कहकर 'थियो-डेमॉक्रसी' (ईश्वरीय-लोकतंत्र) कहा। वे लिखते हैं: "यदि मुझे एक नया शब्द गढ़ने की अनुमति दी जाए, तो मैं सरकार की इस प्रणाली को 'थियो-डेमॉक्रसी' के रूप में वर्णित करूँगा, यानी एक दैवीय लोकतांत्रिक सरकार, क्योंकि इसके तहत मुसलमानों को ईश्वर की आधिपत्य (सुज़ेरंटी) के अधीन एक सीमित लोकप्रिय संप्रभुता दी गई है... यह उस अर्थ में एक धर्मतंत्र (थियोक्रसी) है जहाँ ईश्वर या उनके पैगंबर का कोई स्पष्ट आदेश पहले से मौजूद हो, तो कोई भी मुस्लिम नेता या विधायिका, या कोई भी धार्मिक विद्वान स्वतंत्र निर्णय नहीं बना सकता है, यहाँ तक कि दुनिया के सभी मुसलमान मिलकर भी इसमें जरा सा भी बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं रखते हैं।"

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संविधान से है समाज । एआई प्रतिकात्मक तस्वीर

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इसकी तुलना भारतीय संविधान की शुरुआती पंक्ति से कीजिए। "हम, भारत के लोगों ने, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ-निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सुरक्षित करने के लिए..."

भारत का गणराज्य, या इस मामले में दुनिया का कोई भी आधुनिक राष्ट्र, किसी ग्रंथ से अपना अधिकार प्राप्त नहीं करता है। यह इसे स्वयं लोगों से प्राप्त करता है, चाहे वे किसी भी धर्म के हों या किसी के नहीं, एक ऐसी संसद के माध्यम से जिसे वोट देकर बदला जा सकता है और एक ऐसे संविधान के माध्यम से जिसे उनके चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा संशोधित किया जा सकता है। इसलिए, कानून बनाने या संशोधित करने की शक्ति जनता में निहित है।

मौदूदी का सिद्धांत इस संभावना को नकारे जाने से शुरू होता है। उन्होंने एक वैचारिक राज्य का आह्वान किया, जिसमें "राज्य भौगोलिक, नस्लीय, भाषाई या किसी अन्य भौतिकवादी अवधारणाओं पर नहीं, बल्कि इस्लामी विचारधारा के सिद्धांतों और आदर्शों पर आधारित होगा।"

एक ही धर्म की विचारधारा पर बना राज्य, चाहे वह कितनी भी ईमानदारी से क्यों न माना गया हो, डेढ़ अरब नागरिकों वाले ऐसे देश में कोई जगह नहीं पा सकता जो हजारों अलग-अलग तरीकों से इबादत करते हैं।

'द इस्लामिक लॉ एंड द कॉन्स्टिट्यूशन' में वे कानूनी सटीकता के साथ यह तय करते हैं कि गैर-मुसलमान उनके इस्लामिक राज्य के भीतर क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। मौदूदी लिखते हैं, "गैर-मुसलमान प्रमुख पदों पर काबिज नहीं हो सकते, ऐसे पदों पर जहाँ से राज्य की वैचारिक नीति को प्रभावित किया जा सके, लेकिन वे सामान्य प्रशासनिक पदों पर कब्जा कर सकते हैं और राज्य की सेवाओं में कार्य कर सकते हैं।"

राज्य का मुखिया "अनिवार्य रूप से एक मुसलमान होगा।" जनवरी 1951 में कराची में मौदूदी द्वारा खुद आयोजित उलेमाओं के एक सम्मेलन में यह संकल्प लिया गया कि "राज्य का प्रमुख हमेशा एक पुरुष मुसलमान होगा, जिसकी धर्मपरायणता, विद्या और निर्णय की सुदृढ़ता में लोगों या उनके चुने हुए प्रतिनिधियों को विश्वास हो।"

आधुनिक समय के किसी भी देश के संविधान में ऐसे खंड (क्लॉज) की कल्पना करने की कोशिश कीजिए जहाँ सर्वोच्च पद किसी विशेष लिंग, धर्म या जाति तक सीमित हो।

'जिम्मी' (जिम्मियों) के प्रति मौदूदी का विचार यानी एक ऐसा संरक्षित लेकिन स्थायी रूप से अधीनस्थ गैर-मुसलमान जो मुस्लिम शासन के तहत रहने के लिए 'जिज़िया' कर चुकाता है,एक ऐसे गणतंत्र में कोई स्थान नहीं रखता और रख भी नहीं सकता जहाँ एक मुसलमान राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा दे चुका हो, ठीक इसलिए क्योंकि संविधान किसी भी नागरिक को धर्म के आधार पर ऊंचा या नीचा नहीं मानता है।

मौदूदी लिखते हैं कि 'किताबियों' (अहल-ए-किताब) के खिलाफ युद्ध तब तक छेड़ा जा सकता है जब तक कि वे "अपनी अधीनता स्वीकार करते हुए कर (ट्रीब्यूट) न चुका दें," और वे समझाते हैं कि जिज़िया "जीते गए गैर-मुसलमानों पर लगाया जाने वाला कर है जो मुस्लिम राज्य के आश्रित बन जाते हैं।" संप्रभु राष्ट्रों की यह दुनिया, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर से बंधी है और अंतरराष्ट्रीय कानून के सामने समान है (चाहे उनके नागरिक किसी भी ईश्वर की प्रार्थना क्यों न करते हों), उस सभ्यतागत पदानुक्रम (सिविलाइजेशिनल हायार्की) को पहले ही खारिज कर चुकी है जिसे मदूदी ने अपनी राजनीति में गढ़ा था।

मौदूदी ने भारतीय सभ्यता के लिए अपने सबसे तीखे शब्दों का इस्तेमाल किया। 'अल जिहाद फिल इस्लाम' में मदूदी धर्म और युद्ध के तुलनात्मक अध्ययन पर एक पूरा अध्याय समर्पित करते हैं, और यहीं उनकी राजनीति भारत के साझी तासीर पर सबसे गहरी चोट करती है।

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संविधान। समाज। एकजुटता। एआई प्रतिकात्मक तस्वीर

वे वेदों को विस्तार से उद्धृत करते हुए यह निष्कर्ष निकालते हैं कि "आर्य लोग अपने दुश्मनों को मनुष्यों और बुरी आत्माओं के रूप में राक्षसों के रूप में मानते थे," और जाति व्यवस्था के बारे में वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं, "कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि हिंदू धर्म के अनुसार मानवता का स्तरीकरण, किसी अन्य चीज़ के बजाय नस्लवाद पर आधारित है।"

जाति के बारे में कोई कुछ भी सोचे अंबेडकर ने भारत का संविधान तैयार करने वाली समिति की अध्यक्षता करते हुए इसके बारे में कहीं अधिक कठोर बातें कही थीं,मौदूदी अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ पुल बनाने के लिए नहीं लिख रहे थे। वे यह साबित करने के लिए लिख रहे थे कि हिंदू और मुसलमान दो ऐसी सभ्यताओं से ताल्लुक रखते हैं जो एक सरकार को साझा करने के लिए बहुत अलग थीं।

यह याद रखने योग्य है कि मौलाना अबुल कलाम आजाद और मौलाना हुसैन अहमद मदानी, जो कुरान और हदीस में मदूदी जितने ही गहरे विद्वान थे, ने इसके विपरीत निष्कर्ष निकाला। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि 'कौम' और 'मिल्लत' एक चीज नहीं हैं और यह कि हिंदू और मुसलमान मिलकर एक भारतीय राष्ट्र बनाते हैं। संविधान सभा ने आज़ाद और मदानी का पक्ष लिया, जब उसने यह तय किया कि हर नागरिक, चाहे उसका धर्म कोई भी हो, एक ही निर्वाचन क्षेत्र में एक ही प्रतिनिधि के लिए वोट करेगा।

इस बात का एक अंतिम, लगभग विडंबनापूर्ण प्रमाण है कि मौदूदी का ब्लूप्रिंट कितना अव्यवहारिक साबित हुआ है, और यह प्रमाण उनके अपने संगठन से ही आता है। जमात-ए-इस्लामी हिंद, जिसे विभाजन के बाद उनके अनुयायियों ने भारत में बनाया था, आखिरकार भारतीय संविधान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने और इसके चुनावों में भाग लेने के लिए विवश हो गया, और उसने जनता की उसी संप्रभुता को अपना लिया जिसे इसके संस्थापक ने अपने जीवन भर नकारा था।

आज, जमात-ए-इस्लामी भारतीय लोकतंत्र को स्वीकार करती है, अदालतों में मामले लड़ती है, चुनाव लड़ती है और मुसलमानों के बीच उन लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए काम करती है जो मुसलमानों को मिले हुए हैं।

लेखक के बारे में : साकिब सलीम दिल्ली स्थित एक पब्लिक हिस्टोरियन (सार्वजनिक इतिहासकार) हैं, जिन्होंने लाल किले के अंदर के संग्रहालयों सहित कई संग्रहालयों के शोध का नेतृत्व किया है और वर्तमान में 'आवाज़ द वॉयस' के साथ काम कर रहे हैं।

‘ मीजान’ को समझने के लिए इस वीडियो को देखें .....