विदुषी गौड़/ नई दिल्ली
कश्मीर की वादियों से एक ऐसी खबर आई है जो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती है। कश्मीर की जांबाज पर्वतारोही नाहिदा मंजूर ने एक बार फिर इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया। उन्होंने 5,146 मीटर ऊंचे माउंट कोह-ए-नूर (दक्षिण-पश्चिम) की कठिन और चुनौतीपूर्ण चढ़ाई सफलतापूर्वक पूरी कर ली। इस पर्वत शिखर पर बीते करीब पांच दशकों से सन्नाटा पसरा हुआ था। नाहिदा मंजूर ने इस चोटी को फतेह कर न केवल कश्मीर का नाम रोशन किया, वह इस चोटी पर परचम लहराने वाली दुनिया की पहली महिला पर्वतारोही भी बन गई हैं।
श्रीनगर के पास जेवान गांव की रहने वाली नाहिदा की यह कामयाबी बेहद खास है। माउंट कोह-ए-नूर (SW) पर आखिरी बार 1976 में इंसानी कदम पड़े थे।
उसके बाद से यह चोटी इंसानी पहुंच से दूर बनी हुई थी। लगभग 48 साल के लंबे इंतजार के बाद सितंबर 2026 में कश्मीर के ही कुछ निडर पर्वतारोहियों ने इस पर्वत को दोबारा खंगालने का फैसला किया।
6 सितंबर 2026 को यासिर खान के नेतृत्व में चार सदस्यीय कश्मीरी टीम ने इस पर पहली चढ़ाई की। इसके बाद 9 सितंबर को दूसरी स्थानीय टीम ने कामयाबी हासिल की। 14 सितंबर 2026 को नाहिदा मंजूर अपनी पांच सदस्यीय टीम के साथ इस खतरनाक मिशन पर निकलीं।
उनकी टीम में शौकत लोन, मुदासिर लोन, शेख फरजान और इरफान लोन शामिल थे। भारी बर्फबारी और माइनस तापमान के बावजूद इस टीम ने 14 सितंबर को चोटी पर भारत का तिरंगा फहरा दिया।
अपनी इस ऐतिहासिक चढ़ाई के बाद नाहिदा मंजूर ने सोशल मीडिया पर अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने लिखा कि इस पर्वत शिखर का इतिहास गवाह है कि इससे पहले किसी महिला ने माउंट कोह-ए-नूर पर कदम नहीं रखा था।
इस चोटी पर पहुंचने वाली पहली महिला बनना उनके लिए एक बड़ा सम्मान है। नाहिदा का मानना है कि पहाड़ कभी पुरुष और महिला में फर्क नहीं करते।
पहाड़ सिर्फ आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति, तैयारी और हौसले का इम्तिहान लेते हैं। यह सफलता उन सभी महिलाओं के नाम है जो बड़े सपने देखने की हिम्मत रखती हैं।
नाहिदा मंजूर कोई साधारण नाम नहीं हैं। वह पूरे जम्मू-कश्मीर के युवाओं और खास तौर पर लड़कियों के लिए एक मिसाल हैं। लगभग सात साल पहले जब नाहिदा की उम्र महज 23 साल थी, तब उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8,848 मीटर) को फतेह किया था।
वह माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ने वाली कश्मीर की पहली मुस्लिम महिला पर्वतारोही बनी थीं। उस समय उनकी इस कामयाबी ने पूरी कश्मीर घाटी में एक नई उम्मीद और जोश भर दिया था।
एवरेस्ट तक पहुंचने का नाहिदा का यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाली नाहिदा के पिता श्रीनगर में एक छोटी सी दुकान चलाते हैं।
नाहिदा को बचपन से ही पहाड़ों से गहरा लगाव था। जब वह केवल 10 साल की थीं, तब से ही उन्होंने छोटी-मोटी पहाड़ियों पर चढ़ना शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे पहाड़ों की यह ठंडक और ऊंचाई उनका जुनून बन गई।

साल 2017 में नाहिदा ने पर्वतारोहण को अपने करियर के रूप में चुना। उन्होंने उत्तरकाशी के मशहूर नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग (NIM) और गुलमर्ग के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्कीइंग एंड माउंटेनियरिंग से रॉक क्लाइंबिंग, स्कीइंग और पर्वतारोहण का कड़ा प्रशिक्षण लिया।
एवरेस्ट के बड़े मिशन से पहले उन्होंने खुद को साबित करने के लिए कई कठिन चोटियों को सर किया। इनमें मनाली की देव टिब्बा चोटी (6,001 मीटर), हिमाचल की फ्रेंडशिप पीक (5,289 मीटर), श्रीनगर की माउंट महादेव और पीर पंजाल रेंज की माउंट टाटाकूटी शामिल थीं।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी एवरेस्ट मिशन के लिए पैसों का इंतजाम करना। एवरेस्ट चढ़ाई के लिए नेपाल सरकार की फीस और बाकी तैयारियों में लगभग 30 लाख रुपये का खर्च आ रहा था। एक गरीब परिवार की लड़की के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाना नामुमकिन जैसा था।
लेकिन नाहिदा ने हार नहीं मानी। उन्होंने सोशल मीडिया पर ऑनलाइन क्राउड फंडिंग कैंपेन शुरू किया। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए लिखा था कि भले ही वह आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं, लेकिन गरीबी उनके सपनों को रोक नहीं सकती।
उनकी यह हिम्मत देखकर कई लोग मदद के लिए आगे आए। श्रीनगर के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर शाहिद चौधरी और कई स्थानीय प्रायोजकों ने नाहिदा की वित्तीय मदद की।
पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती समेत कई दिग्गजों ने उनकी इस कोशिश की तारीफ की थी। 21 अप्रैल को एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने के बाद नाहिदा ने मई महीने में एवरेस्ट की चोटी पर भारत का झंडा फहरा दिया था।
नाहिदा मंजूर केवल एक पर्वतारोही ही नहीं हैं। वह एक बेहतरीन ऑलराउंडर खिलाड़ी भी हैं। फाइन आर्ट्स की पढ़ाई कर चुकी नाहिदा को टेबल टेनिस, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, हॉर्स राइडिंग और शूटिंग का भी बेहद शौक है। वह खुद को एक एडवेंचरस अल्पाइन क्लाइंबर मानती हैं।
माउंट कोह-ए-नूर की इस नई कामयाबी के बाद नाहिदा मंजूर के फेसबुक और इंस्टाग्राम पेज पर बधाइयों का तांता लग गया है।
देश-विदेश से लोग उनकी इस जांबाजी को सलाम कर रहे हैं। कश्मीरवासी अपनी इस बेटी की कामयाबी पर जश्न मना रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि नाहिदा ने यह साबित कर दिया है कि अगर मन में पक्का इरादा हो तो कोई भी ऊंचाई नामुमकिन नहीं होती।
कोह-ए-नूर पर नाहिदा की यह ऐतिहासिक जीत सिर्फ एक नया रिकॉर्ड नहीं है। यह कश्मीर की बेटियों के नए आत्मविश्वास की कहानी है।
यह उन तमाम बंदिशों और बाधाओं का करारा जवाब है जो महिलाओं के सपनों के आड़े आती हैं। आज नाहिदा की यह सफलता कश्मीर के उन हजारों युवाओं को सही रास्ता दिखा रही है जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर दुनिया में अपना नाम बनाना चाहते हैं।