ओनीका माहेश्वरी/नई दिल्ली
छोटे शहर से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सशक्त पहचान बनाने वाली लेखिका-पत्रकार तस्नीम खान पत्रकारिता और साहित्य के ज़रिये महिलाओं के सवालों को संवेदनशीलता और समाधान के साथ सामने रखती हैं। उनके लेखन और कार्यक्रम न केवल स्त्री संघर्ष की कहानी कहते हैं, बल्कि समाज की सोच को बदलने का साहसिक प्रयास भी करते हैं। यहाँ पढिये उनसे की गई खास बातचीत।

प्रश्न: तस्नीम, एक छोटे शहर से निकलकर पत्रकारिता और साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं होता। आपकी यात्रा कैसे शुरू हुई?
उत्तर: यह सच है कि महिलाओं के लिए रास्ते हमेशा आसान नहीं रहे। मैं राजस्थान के नागौर ज़िले के डीडवाना तहसील से हूँ। छोटे शहर में पली-बढ़ी, लेकिन मेरे माता-पिता शिक्षित थे और पढ़ने-लिखने का माहौल घर में था। मेरी माँ की पढ़ने की आदत मुझमें भी आई। बचपन से किताबों के बीच रहने से सोचने, बहस करने और तर्क करने की क्षमता विकसित हुई। स्कूल और कॉलेज में मैंने कई पुरस्कार भी जीते।
प्रश्न: आपने पत्रकारिता को करियर के रूप में कब चुना?
उत्तर: मैंने वर्ष 2005 में औपचारिक रूप से पत्रकारिता शुरू की। शुरुआत से ही मेरा झुकाव महिलाओं से जुड़े मुद्दों की ओर रहा। मैं लैंगिक संवेदनशीलता, घरेलू हिंसा और महिलाओं के सामाजिक अधिकारों पर लगातार लिखती रही। मेरे लिए पत्रकारिता सिर्फ खबर देना नहीं, बल्कि समाज से संवाद करना है।
प्रश्न: आपके टीवी कार्यक्रमों ने खास पहचान बनाई। उनके बारे में कुछ बताइए।
उत्तर: मैंने ‘समर शेष है’ नामक कार्यक्रम की मेज़बानी की, जिसमें महिलाओं के सामाजिक और राजनीतिक सवालों पर चर्चा होती थी। बाद में पत्रिका टीवी पर मेरा नियमित शो ‘आधी दुनिया, पूरी बात – तस्नीम खान के साथ’ काफी लोकप्रिय हुआ। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य महिलाओं को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि सोचने-समझने वाली इकाई के रूप में प्रस्तुत करना था।
प्रश्न: हाल ही में आपको लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला। यह सम्मान किस रिपोर्ट के लिए था?
उत्तर: यह सम्मान मुझे मेरे शो ‘घरेलू हिंसा पर कब लगेगा लॉकडाउन?’ के लिए मिला, जिसे पॉपुलेशन फर्स्ट और यूएनएफपीए ने प्रदान किया। जूरी का कहना था कि इस रिपोर्ट ने यह सच्चाई सामने रखी कि लॉकडाउन के दौरान घरों के भीतर महिलाओं ने एक और भयावह महामारी—घरेलू हिंसा—का सामना किया।
प्रश्न: आपकी लेखनी में शिकायत कम और समाधान की तलाश ज़्यादा दिखती है। यह सोच कैसे आई?
उत्तर: मैं महिलाओं की पीड़ा को सिर्फ बयान करना नहीं चाहती। मेरा मानना है कि लेखन का उद्देश्य समाधान की दिशा दिखाना होना चाहिए। अगर मेरी किसी रचना से किसी एक महिला को भी रास्ता मिल जाए, तो मैं अपने जीवन को सफल मानूँगी।
प्रश्न: आपने 2015 में उपन्यास लेखन की शुरुआत की। ‘मेरे रहनुमा’ आपके लिए कितना खास है?
उत्तर: ‘मेरे रहनुमा’ मेरे जीवन का बेहद महत्वपूर्ण उपन्यास है, जिसे ज्ञानपीठ ट्रस्ट ने प्रकाशित किया। यह युवा लेखकों की प्रतियोगिता में चयनित हुआ था और राजस्थान से मैं दूसरी महिला लेखिका थी, जिसका पहला उपन्यास ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में मैंने यह स्थापित करने की कोशिश की कि सिर्फ आर्थिक स्वतंत्रता से महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होता। समाज की मानसिकता बदले बिना यह सशक्तिकरण अधूरा है।
प्रश्न: इस उपन्यास पर शोध भी हुआ है। यह अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: मेरे लिए यह गर्व की बात है कि ‘मेरे रहनुमा’ पर पीएचडी और एमफिल जैसे शोध कार्य हुए। इससे मुझे यह विश्वास मिला कि मेरी लेखनी ने अकादमिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर संवाद स्थापित किया है।
प्रश्न: आपकी अन्य साहित्यिक कृतियों और पुरस्कारों के बारे में बताइए।
उत्तर: मेरी कहानी-संग्रह ‘दास्तान-ए-हज़रत महल’ 2019 में प्रकाशित हुई, जिसके लिए मुझे चंद्रबाई पुरस्कार मिला। 2021 में राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ ने मुझे शाकुंतलम पुरस्कार से सम्मानित किया। मेरी कहानियाँ अलग-अलग भाषाओं में अनूदित हुई हैं। ‘रुख़-ए-गुलज़ार’ का अनुवाद भारतीय अनुवाद परिषद ने किया, जबकि ‘ख़ामोशियों का रंग नीला’ उर्दू में पाकिस्तान की पत्रिका में प्रकाशित हुई और उसे मिरर अवॉर्ड मिला। मेरी कहानी ‘मेरे हिस्से की चाँदनी’ जल्द ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के संकलन में प्रकाशित होगी।
प्रश्न: आपकी लेखन प्रक्रिया कैसी रहती है?
उत्तर: मैं अपने आसपास के लोगों को बहुत ध्यान से देखती हूँ। उनके किरदार, उनकी पीड़ा और उनके संघर्ष मुझे भीतर तक झकझोर देते हैं। जब तक उस बेचैनी को शब्द नहीं मिल जाते, मुझे चैन नहीं मिलता। यही बेचैनी मेरी कहानियों को जन्म देती है।
प्रश्न: आपके जीवन में आपके माता-पिता की क्या भूमिका रही?
उत्तर: मेरे माता-पिता मेरा सबसे बड़ा संबल रहे हैं। मुश्किल मोड़ों पर उन्होंने हमेशा मुझे हौसला दिया। मैं मानती हूँ कि माता-पिता की शिक्षा बच्चों के भविष्य में निर्णायक भूमिका निभाती है। मैंने कई लड़कियों को देखा है, जो सिर्फ इसलिए आगे नहीं बढ़ पाईं क्योंकि उनके माता-पिता शिक्षा का महत्व नहीं समझते थे।
प्रश्न: ‘मेरे रहनुमा’ की नायिका मुक्ति की तलाश में है। आप इस मुक्ति को कैसे देखती हैं?
उत्तर: मेरे लिए मुक्ति केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक है। जब तक समाज शक्तिशाली महिलाओं को स्वीकार करना नहीं सीखेगा, तब तक उनकी मुक्ति अधूरी रहेगी। अगर मेरी लेखनी किसी महिला को इस दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखा सके, तो वही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
प्रश्न: हाल ही में फेसबुक पर आयोजित ‘चतुरंग #लॉकडाउनलाइव’ सत्र में आपने पाठकों से संवाद किया। वह अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: यह सत्र राजस्थान फोरम द्वारा आयोजित किया गया था। वहाँ मैंने अपनी शिक्षा, करियर और साहित्यिक यात्रा पर खुलकर बात की। मैंने यह भी कहा कि लेखक बनने के लिए वर्षों की तैयारी, गहन अध्ययन और समाज के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की ज़रूरत होती है। अंत में मैंने अपने उपन्यास ‘ऐ मेरे रहनुमा’ से अंश भी पढ़े। यह संवादसाक्षात्कार | शब्दों के जरिए पितृसत्ता से संवाद: लेखिका–पत्रकार तस्नीम खान

उत्तर: यह सत्र राजस्थान फोरम द्वारा आयोजित किया गया था। वहाँ मैंने अपनी शिक्षा, करियर और साहित्यिक यात्रा पर खुलकर बात की। मैंने यह भी कहा कि लेखक बनने के लिए वर्षों की तैयारी, गहन अध्ययन और समाज के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की ज़रूरत होती है। अंत में मैंने अपने उपन्यास ‘ऐ मेरे रहनुमा’ से अंश भी पढ़े। यह संवाद मेरे लिए बेहद आत्मीय और प्रेरक रहा। मेरे लिए बेहद आत्मीय और प्रेरक रहा।