देव किशोर चक्रवर्ती
भारतीय साहित्य और विशेषकर बंगाली साहित्य में महिलाओं की आवाज़ को बुलंद करने वाली लेखिका और कवयित्री Firoza Begum ने ग्रामीण भारत की कठोर वास्तविकताओं, लैंगिक असमानता और पारिवारिक कठिनाइयों को अपने लेखन में प्रभावशाली ढंग से उभारा है। उनकी रचनाओं में जो भाषा प्रकट होती है, वह केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि विरोध और सामाजिक चेतना का प्रतीक है। यह भाषा किसी सहज लेखन की नहीं, बल्कि संघर्ष, पीड़ा और अनुभवों की परिपक्वता से उभरती है।
फ़िरोसा बेगम का जन्म पश्चिम बंगाल के बिर्भुम जिले के रामपुरहाट प्रभाग के जुबुनी गांव में हुआ। उनके माता-पिता, अब्दुल हकीम मालिक और अरेस्तुन बीबी, गरीबी, बीमारी और सामाजिक असुरक्षा से जूझ रहे थे। इस कठिन परिप्रेक्ष्य में उनका बचपन बीता।
उस समय ग्रामीण भारत में बालिकाओं की शिक्षा को अक्सर नजरअंदाज किया जाता था, लेकिन फ़िरोसा ने अपने प्रयासों से विद्यालय में शिक्षा पूरी की और कई सामाजिक बाधाओं को तोड़ दिया। स्कूल में उन्हें भेदभाव और उपेक्षा का सामना करना पड़ा, जिसने उनके भीतर विद्रोह और साहस की भावना पैदा की। यही अनुभव उनकी लेखनी में तीखी, संवेदनशील और विरोधात्मक भाषा का आधार बने।
उनके बचपन में फैली छोटी-मोटी महामारी और विशेष रूप से मोरब्बी दंश और बीमारी के समय उनके परिवार के संघर्षों ने उनके भीतर मानवीय संवेदना और सामाजिक दायित्व की भावना को विकसित किया। यही कारण है कि उनके लेखन में न केवल व्यक्तिगत पीड़ा, बल्कि समाज की संरचनात्मक समस्याओं के प्रति गहरी समझ दिखाई देती है।
1974 में फ़िरोसा बेगम का विवाह नुरुल हक मालिक, जो एक विज्ञान-सम्मत शिक्षक थे, से हुआ। अपने पति के उदार दृष्टिकोण और प्रेरणा के कारण, उन्होंने परिवार और साहित्यिक जीवन के बीच संतुलन बनाए रखा। उन्होंने सुनिश्चित किया कि उनकी चारों पुत्रियाँ शिक्षित, आत्मनिर्भर और आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनें। उनके पति का 2016में निधन उनके जीवन में गहरा शून्य छोड़ गया, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने साहित्यिक pursuits को जारी रखा।
1992 से फ़िरोसा बेगम नियमित रूप से कविताएँ, गीत और निबंध लिख रही हैं। उनके लेखन को मुरशिदाबाद, रामपुरहाट और कोलकाता की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया है। इनमें प्रमुख पत्रिकाएँ हैं: प्रगति, त्रिनयनी, कलम, भाभना, समाचार दर्पण, रॉद्दुर, अर्पण आदि। इसके अतिरिक्त वह रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रमों में भी नियमित रूप से भाग लेती रही हैं और उनके योगदान को सिर्फ उनके शहर या समुदाय तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उनकी लेखनी ने व्यापक स्तर पर मान्यता और प्रशंसा पाई है।
उनकी कविताएँ और लेख विशेष रूप से महिलाओं के संघर्ष, जीवन की कठिनाइयों और मानव आत्मा की शक्ति को दर्शाते हैं। उनकी काव्य-संग्रह “नयनतारा” (2010) और “अपराजिता” (2014) इस बात के प्रमाण हैं कि उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से जीवन के कड़वे सच और महिला अनुभव को प्रकट किया। ये संग्रह जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी साहस और संघर्ष की सीख देते हैं।
फ़िरोसा बेगम ने बीमारियों और शारीरिक सीमाओं के बावजूद अपनी किताबों का संपादन और प्रकाशन स्वयं किया। यह उनके धैर्य, लगन और आत्मनिर्भरता का परिचायक है। उनके इन प्रयासों ने उन्हें न केवल साहित्यिक क्षेत्र में, बल्कि समाज में भी सम्मान दिलाया।
उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। रामपुरहाट के भाभना ओ अनुभवबर डाना समाचार पत्र ने उन्हें साहित्यिक कार्यों के लिए सराहा। कोलकाता और बहारामपुर के विभिन्न रेडियो स्टेशनों ने उन्हें प्रशंसा पत्र प्रदान किए। इसके अलावा, उन्हें रॉद्दुर समाचार पत्र से रोकेया पुरस्कार, न्यू बैरकपुर से अंबेडकर शिल्पी रत्न पुरस्कार, और हाल ही में आशा फाउंडेशन से “बेस्ट बंगाली” पुरस्कार से नवाजा गया। ये सम्मान उनकी साहित्यिक प्रतिभा और मानवीय दृष्टिकोण के लिए महत्वपूर्ण मान्यता हैं।
फ़िरोसा बेगम का जीवन केवल एक लेखक की जीवनी नहीं है, बल्कि एक संघर्षशील महिला की साहसिक यात्रा का दस्तावेज़ है। उनकी लेखनी आज भी यह प्रमाणित करती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा, मानवता और साहित्य का प्रकाश अंधकार में भी मार्ग दिखा सकता है। उनका जीवन और साहित्य यह दिखाता है कि सामाजिक और पारिवारिक कठिनाइयों के बावजूद, दृढ़ संकल्प और सहनशीलता से समाज में परिवर्तन लाया जा सकता है।
उनकी लेखनी में ग्रामीण भारत की सच्चाईयों का यथार्थ चित्रण मिलता है। उनके लेखन में नारी जीवन की कठिनाइयाँ, सामाजिक असमानता और पारिवारिक संघर्ष स्पष्ट रूप से झलकते हैं। यह लेखन न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक जागरूकता पैदा करने में भी सहायक है।
फ़िरोसा बेगम का जीवन यह दर्शाता है कि कैसे संघर्ष, शिक्षा और आत्म-निर्भरता किसी महिला को सामाजिक और साहित्यिक मान्यता दिला सकती है। उन्होंने अपने जीवन में जो कठिनाइयाँ देखीं, वही उनके लेखन की प्रेरणा बनी। उनके शब्द अब भी समाज के भीतर बदलाव और चेतना का संदेश देते हैं।
अंततः, फ़िरोसा बेगम की कहानी यह स्पष्ट करती है कि कठिनाई और संघर्ष जीवन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन साहस, शिक्षा और लेखन के माध्यम से मानवता और समाज को रोशन किया जा सकता है। उनके प्रयास और उपलब्धियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।