उर्दू किसी मज़हब नहीं, पूरे हिंदुस्तान का नाम है, वैश्विक उर्दू सम्मेलन में गूंजा संदेश

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 09-02-2026
Urdu is not the name of a religion, but of the whole of India; this message resonated at the Global Urdu Conference.
Urdu is not the name of a religion, but of the whole of India; this message resonated at the Global Urdu Conference.

 

आवाज द वाॅयस/ नई दिल्ली

उर्दू हिंदुस्तान की जीवंत भाषा है और देश की तरक़्क़ी में अहम किरदार निभा रही है: डॉ. शम्स इक़बाल

उर्दू मुसलमान का नाम नहीं, हिंदुस्तान का नाम है: ख़्वाजा इफ्तिखार अहमद

उर्दू को कम आंकने की ज़रूरत नहीं, इसने विभिन्न इल्म व फ़न को अपने अंदर समेट लिया है: प्रोफेसर ऐनुल हसन

लफ़्ज़ महज़ लफ़्ज़ नहीं, बल्कि एक तस्वीर, आवाज़ और लंबी तारीख़ व तहज़ीब का प्रतिनिधि होता है: प्रोफेसर क़ुद्दूस जावेद

उर्दू के प्रख्यात विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों के इन विचारों और मतों के साथ राष्ट्रीय उर्दू परिषद के तत्वावधान में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय उर्दू सम्मेलन का समापन हुआ। “बहुभाषी हिंदुस्तान में उर्दू भाषा व तहज़ीब” विषय पर राष्ट्रीय परिषद बराए फ़रोग़ उर्दू ज़बान, नई दिल्ली द्वारा आयोजित इस अंतरराष्ट्रीय उर्दू सम्मेलन के तीसरे दिन तीन महत्वपूर्ण तकनीकी सत्रों और एक मुशायरे का आयोजन किया गया।

इन तीनों सत्रों में उर्दू भाषा के अन्य भाषाओं के साथ भाषाई, सांस्कृतिक, साहित्यिक और तहज़ीबी संबंधों पर विभिन्न विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए।

अध्यक्षों ने सम्मेलन के इस विषय को समय की आवश्यकता बताते हुए राष्ट्रीय उर्दू परिषद और उसके निदेशक को बधाई दी और इसे उर्दू के प्रचार-प्रसार की दिशा में एक मील का पत्थर बताया।

पहले सत्र में डॉ. ख़्वाजा इफ्तिखार अहमद अध्यक्ष के रूप में, प्रोफेसर शाफ़े क़दवाई और प्रोफेसर रवि टेकचंदानी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। जबकि प्रोफेसर शंभूनाथ तिवारी, प्रोफेसर इंतिख़ाब हमीद, जनाब ख़ावर नक़ीब, जनाब शब्बीर अहमद और श्रीमती अस्मा अमरोज़ ने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इस सत्र का संचालन श्रीमती निहां रबाब ने किया।

 

अध्यक्षीय भाषण प्रस्तुत करते हुए डॉ. ख़्वाजा इफ्तिखार अहमद ने कहा कि हिंदुस्तान जड़ का नाम है और इसकी बहुत-सी शाखाएँ हैं। हर शाखा को हरा-भरा रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। साथ ही उर्दू को आमफहम और दूरगामी बनाने के लिए आसान शब्दों का इस्तेमाल ज़रूरी है। उर्दू मुसलमान का नाम नहीं, हिंदुस्तान का नाम है। इस तरह की कॉन्फ़्रेंस देश में हर तरह की सामंजस्य और सौहार्द का कारण बनती हैं। अंतरधार्मिक सद्भाव में भाषा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस दृष्टि से भी यह कॉन्फ़्रेंस बेहद खास है।

पहले विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर रवि टेकचंदानी ने सिंधी और उर्दू के भाषाई संबंधों पर अपने विचार व्यक्त किए और भाषाओं के विकास के सिद्धांतों और नियमों पर भी प्रकाश डाला।दूसरे विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर शाफ़े क़दवाई ने कॉन्फ़्रेंस के विषय के विभिन्न पहलुओं की ओर संकेत किया और बहुभाषिकता (मल्टी लिंगुअलिज़्म) की उपयोगिता तथा उसके खतरों से भी अवगत कराया।

उन्होंने पाणिनि, आनंदवर्धन और अभिनवगुप्त का उल्लेख करते हुए उर्दू भाषा और साहित्य पर उनके विचारों और सिद्धांतों के प्रभाव की भी चर्चा की। श्रीमती अस्मा अमरोज़ ने तेलुगू और उर्दू भाषा के भाषाई संबंधों पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया और उदाहरणों के माध्यम से ऐसे कई शब्दों की पहचान कराई जो दोनों भाषाओं में मामूली बदलाव के साथ प्रचलित हैं।

दूसरे शोधपत्र प्रस्तुतकर्ता जनाब ख़ावर नक़ीब ने इंडियन नॉलेज सिस्टम के संदर्भ में अपना शोधपत्र पेश किया और विभिन्न सभ्यताओं को जोड़ने में उर्दू अनुवादों को महत्वपूर्ण बताया।जनाब शब्बीर अहमद ने “राष्ट्रीय विरासत व संस्कृति उर्दू अनुवाद के आईने में” शीर्षक से शोधपत्र प्रस्तुत किया और कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर ध्यान आकर्षित किया।

प्रोफेसर इंतिख़ाब हमीद ने भाषा की व्यवहारिक तर्क प्रणाली और उसके परिणामों के विषय पर अपना शोधपत्र पेश किया और सम्मेलन के विषयों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बिल्कुल अनुरूप बताया।प्रोफेसर शंभूनाथ तिवारी ने उर्दू में भारतीय सभ्यता और संस्कृति पर अपने विचार व्यक्त करते हुए शोधपत्र प्रस्तुत किया और विभिन्न संस्कृतियों के मेल-जोल को हिंदुस्तान की सबसे बड़ी खूबसूरती बताया।

تतीसरे सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर क़ुद्दूस जावेद ने की और विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रोफेसर एजाज़ अली अरशद तथा प्रोफेसर मुर्तज़ा करीम शामिल हुए। प्रोफेसर हाइंज़ वर्नर और जनाब मोहम्मद सैफ़ी उमरी ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इस सत्र का संचालन डॉ. एहसन अय्यूबी ने किया।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रोफेसर क़ुद्दूस जावेद ने कहा कि हिंदुस्तान केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं, बल्कि बहुआयामी सभ्यताओं का नाम है। हमारी साझा तहज़ीब की जड़ें वैदिक काल में पैवस्त हैं। उन्होंने कहा कि उर्दू की पहचान उसके प्रतीकों, रूपकों और किनायों से बनती है। शब्द महज़ शब्द नहीं, बल्कि एक तस्वीर, आवाज़ और लंबी इतिहास व तहज़ीब का प्रतिनिधि होता है।

विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर मुर्तज़ा करीम ने कहा कि अन्य भाषाओं के जानकारों को भी उर्दू भाषा और तहज़ीब के प्रतिनिधित्व पर विचार करना चाहिए, इससे भाषा के विकास की दोतरफ़ा प्रक्रिया सामने आएगी। दूसरे विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर एजाज़ अली अरशद ने कहा कि दूसरी भाषाओं के शब्दों और प्रभावों को स्वीकार करना किसी भी भाषा की तरक़्क़ी के लिए स्वागतयोग्य है। उन्होंने उर्दू को भाषाई लोकतंत्र का बेहतरीन नमूना बताया।

शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों में जनाब मोहम्मद सैफ़ी उमरी ने “उर्दू और तमिल भाषा का साहित्यिक संबंध और साझेदारी” विषय पर अपना शोधपत्र पेश किया और दोनों के बीच रूपात्मक और संरचनात्मक समानताओं पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर हाइंज़ वर्नर (स्वीडन) ने बहुभाषी हिंदुस्तान में उर्दू भाषा और तहज़ीब के संदर्भ में बोलते हुए विभिन्न भाषाओं के आपसी मेल-जोल और प्रभावों की चर्चा की।

इस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय उर्दू सम्मेलन का समापन राष्ट्रीय उर्दू परिषद के निदेशक डॉ. मोहम्मद शम्स इक़बाल के संबोधन पर हुआ। उन्होंने सम्मेलन के संबंध में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का संदेश पढ़कर सुनाया और कहा कि इसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिनिधित्वपूर्ण भागीदारी रही। बहुभाषी हिंदुस्तान में उर्दू भाषा और तहज़ीब पर उन्होंने कहा कि हमें किसी एक दायरे में सीमित रहने की ज़रूरत नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों से इसकी मौजूदगी बताती है कि उर्दू में अनेक सभ्यताओं की भागीदारी है। भाषाओं के साहित्य का आदान-प्रदान जारी रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि उर्दू हर प्रदेश, हर ज़िले और हर स्थान पर मौजूद है। उर्दू को दूरगामी बनाने के लिए उच्चारण और अदायगी की कठोर पकड़ से बाहर निकलना होगा। यह हिंदुस्तान की जीवंत भाषा है और देश की प्रगति में अपना योगदान दे रही है। उन्होंने आगे कहा कि जैसे हम उर्दू के शब्द दूसरी भाषाओं में देखकर प्रसन्न होते हैं, वैसे ही उर्दू में अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग पर भी उदारता दिखानी चाहिए।

 राष्ट्रीय उर्दू परिषद ने अपनी हालिया गतिविधियों में लगभग सात सौ लोगों को शामिल किया है और नई पीढ़ी को प्रोत्साहित किया है। इस अवसर पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय उर्दू सम्मेलन के लिए चयनित तीन युवा शोधार्थियों — मोहम्मद फ़िरोज़ अहमद (लद्दाख), अस्मा अमरोज़ (तेलंगाना) और मोहम्मद सैफ़ी उमरी (तमिलनाडु)  को बधाई दी तथा देश-विदेश से आए सभी अतिथियों, शोधपत्रकारों, सदस्यों और प्रतिभागियों का धन्यवाद किया।

सम्मेलन के समापन पर एक सुंदर मुशायरे का भी आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ शायर चंद्रभान ख़याल ने की। इस मुशायरे में प्रोफेसर शहपर रसूल, डॉ. पॉपुलर मेरठी, जनाब शकील जमाली, प्रोफेसर सिराज अजमली, जनाब नौमान शौक, जनाब अफ़ज़ल मंगलोरी, डॉ. माजिद देवबंदी, जनाब मुज़फ़्फर अब्दाली, जनाब मनीष शुक्ला और डॉ. क़मर सरवर ने शायर के रूप में भाग लिया और अपना कलाम पेश किया। मुशायरे का संचालन जनाब मुईन शादाब ने किया और परिचय व स्वागत जनाब मोहम्मद इकराम ने प्रस्तुत किया।