अनंतनाग (जम्मू और कश्मीर)
कश्मीर की प्रसिद्ध कवयित्री और गीतों की रानी हब्बा खातून की अमूल्य साहित्यिक विरासत को सम्मान देने के लिए अनंतनाग में एक विशेष महफ़िल-ए-मुशायरा का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम एहसास फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया गया, जिसमें कश्मीरी साहित्य प्रेमी, कवि, विद्वान, पत्रकार और कला-संस्कृति के अनुयायी शामिल हुए।
महफ़िल की अध्यक्षता प्रसिद्ध कवि सुहैल अहमद, जिन्हें साहित्यिक मंच पर राज साएब के नाम से जाना जाता है, ने मुख्य अतिथि के रूप में की। कार्यक्रम में सागर नजीर और रियाज़ अंजू जैसे विशिष्ट कवियों ने विशेष अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह कार्यक्रम हब्बा खातून के जीवन, उनकी रचनाओं और कश्मीरी भाषा व संस्कृति पर उनके अमिट प्रभाव को उजागर करने का एक यादगार अवसर साबित हुआ।
हब्बा खातून, जिनका जन्म जून रदर के नाम से हुआ था, 16वीं शताब्दी की कश्मीरी कवयित्री और राजा यूसुफ शाह चक की संगिनी थीं। उन्हें कश्मीर का “काव्य कौकिला” या “Nightingale of Kashmir” कहा जाता है। उनकी कविता और संगीत ने कश्मीरी साहित्यिक परंपराओं में गहरी छाप छोड़ी। उनके भावपूर्ण गीत और रचनाएँ आज भी लोक साहित्य और संगीत समारोहों में गूँजती हैं, जो उनकी साहित्यिक प्रावीण्यता और संवेदनशीलता का परिचायक हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत हज़ीक हयदरी द्वारा तिलावत-ए-क़ुरआन के साथ हुई, जिसने महफ़िल के लिए आध्यात्मिक और चिंतनशील माहौल तैयार किया। इसके बाद कई कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया और हब्बा खातून की कविता, उनके जीवन और उनके साहित्यिक योगदान को श्रद्धांजलि दी। कवियों ने उनके गीतों और रचनाओं की भावनात्मक गहराई, सांस्कृतिक महत्त्व और कश्मीर की लोकधरोहर में उनके स्थान को उजागर किया।
महफ़िल में प्रस्तुत कवियों में अतीका सिद्दीकी, मशरू नसिबबादी, याह्या तौसीफ़, परवेज गुलशन, म्यसर नशाद, रिदा मुदासिर, इरशाद अहमद इरशाद, तन्हा इक़बाल, सागर सलाम, अजम फ़ारूक, जावेद सागर, शाह मिम, आज़हर मुआमी और ज़ीशान अफ़ाक़ शामिल थे। उन्होंने हब्बा खातून के जीवन और काव्य को अपने अनोखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया, जिससे उपस्थित दर्शकों का साहित्यिक अनुभव और भी समृद्ध हुआ।
मुख्य अतिथि राज साएब ने अपने संबोधन में हब्बा खातून की कविता की कालातीत प्रासंगिकता और कश्मीरी साहित्यिक परंपराओं में उनके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हब्बा खातून का काव्य आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में उतना ही प्रभावशाली है जितना कि उनके समय में था। उनकी कविताएँ न केवल प्रेम और प्रकृति की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, बल्कि कश्मीरी भाषा की समृद्धि और संवेदनशीलता को भी दर्शाती हैं।
विशेष अतिथि रियाज़ अंजू ने हब्बा खातून की कविताओं में छिपी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक महत्ता पर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि उनकी कविताएँ और गीत आज भी कश्मीरी लोगों की भावनाओं को व्यक्त करने और समाज में सामूहिक संवेदनाओं को जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
कवि सागर नजीर ने महफ़िल में युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि हब्बा खातून जैसे क्लासिकल कवियों से जुड़ाव स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि उनकी कला और कविता आने वाली पीढ़ियों तक पहुँच सके। उन्होंने युवा पीढ़ी को प्रेरित किया कि वे न केवल उनकी रचनाओं का अध्ययन करें, बल्कि उन्हें मंच पर प्रस्तुत कर कश्मीरी साहित्यिक संस्कृति को जीवित रखें।
एहसास फाउंडेशन के अध्यक्ष जाहूर अहमद मलिक ने कार्यक्रम में उपस्थित कवियों, अतिथियों और मीडिया के प्रतिनिधियों को उनके सहयोग और योगदान के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने पत्रकारिता और मीडिया के समर्थन की भी सराहना की, जिन्होंने कार्यक्रम के व्यापक कवरेज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विशेष रूप से रेडियो रबिता के खालिद मुन्तज़िर का धन्यवाद किया, जिन्होंने कार्यक्रम की विस्तृत और प्रभावशाली कवरेज सुनिश्चित की।
महफ़िल में उपस्थित लोगों ने हब्बा खातून की कविताओं और गीतों से भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस किया। कवियों ने उनकी काव्य-संपदा के माध्यम से कश्मीर की संस्कृति, भाषा और लोकधरोहर के महत्व को रेखांकित किया। यह महफ़िल न केवल साहित्यिक कार्यक्रम थी, बल्कि यह कश्मीर में सांस्कृतिक चेतना और युवा पीढ़ी के बीच साहित्यिक जागरूकता बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच भी साबित हुई।
हब्बा खातून की कविता की सरलता और गहराई ने इस महफ़िल को और भी जीवंत बना दिया। उनके गीत और कविताएँ आज भी कश्मीर की पहाड़ियों और घाटियों में गूँजती हैं, और उनके शब्दों में छिपा मानव अनुभव आज भी पाठकों और श्रोताओं के दिलों को छूता है। इस प्रकार महफ़िल ने न केवल हब्बा खातून की स्मृति का सम्मान किया, बल्कि उनके साहित्यिक योगदान को वर्तमान पीढ़ी के लिए भी सजीव रखा।
इस साहित्यिक शाम ने यह स्पष्ट कर दिया कि हब्बा खातून का काव्य केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह कश्मीरी समाज की सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनकी कविताएँ प्रेम, विरह, प्रकृति और जीवन के अनुभवों का प्रतीक हैं, जो आज भी कश्मीर की साहित्यिक विरासत को समृद्ध करती हैं।