ओनिका माहेश्वरी
मुंबई के नागपाड़ा में नौ साल का एक बच्चा पहली बार बास्केटबॉल से रूबरू हुआ। शायद तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बच्चा आगे चलकर भारतीय बास्केटबॉल का इतिहास बदल देगा। गुलाम अब्बास मूंतासिर ने महज 16 साल की उम्र में भारतीय टीम में जगह बनाई और करीब 28 साल तक बास्केटबॉल से जुड़े रहे। 1970 में वे एशियन ऑल-स्टार टीम में चुने गए और उसी साल अर्जुन अवॉर्ड पाने वाले भारत के पहले बास्केटबॉल खिलाड़ी बने।
खिलाड़ी का परिचय
गुलाम अब्बास मूंतासिर का जन्म 7 जनवरी 1942 को मुंबई में हुआ था। नागपाड़ा के कोर्ट पर नौ साल की उम्र में बास्केटबॉल से उनका परिचय हुआ। स्कूल और कॉलेज के स्तर पर खेलते हुए वे बॉम्बे यूनिवर्सिटी और महाराष्ट्र की टीम तक पहुंचे। बाद में उन्होंने रेलवे की ओर से भी खेला और भारतीय बास्केटबॉल के प्रमुख खिलाड़ियों में अपनी जगह बनाई। उनकी पहचान केवल एक बेहतरीन खिलाड़ी के रूप में नहीं थी। वे अपने आक्रामक खेल, शानदार बॉल हैंडलिंग और कोर्ट पर आत्मविश्वास के लिए जाने जाते थे। लेकिन उनके व्यक्तित्व की सबसे खास बात थी खेल को बेहतर बनाने की बेचैनी।

शुरुआती जीवन और संघर्ष
अब्बास का खेल सफर किसी आधुनिक स्पोर्ट्स अकादमी से नहीं, बल्कि मुंबई के नागपाड़ा के स्थानीय कोर्ट से शुरू हुआ। नौ साल की उम्र में उन्होंने बास्केटबॉल खेलना शुरू किया और धीरे-धीरे यह खेल उनके जीवन का सबसे बड़ा जुनून बन गया। 1957 में, 16 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले ही, नागपाड़ा की 'B' टीम ने राज्य चैंपियनशिप के फाइनल में 'A' टीम को हराकर खिताब जीता। इसके बाद अब्बास को बॉम्बे की राज्य टीम में जगह मिली और अगले साल उन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिता में टीम की कप्तानी की। महज 16-17 साल की उम्र में वे देश के पुरुष खिलाड़ियों में तीसरी रैंक तक पहुंच चुके थे। यही शुरुआती सफलता उनके लिए भारतीय बास्केटबॉल के बड़े मंच का दरवाजा बनी।
खेल करियर: 16 साल की उम्र में भारत की टीम तक
1960 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मुंबई में खेले गए प्रदर्शनी मैच से अब्बास मूंतासिर का अंतरराष्ट्रीय करियर शुरू हुआ। इसके बाद उन्होंने भारतीय टीम के साथ कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। उन्होंने 1964 के कोलंबो टूर्नामेंट में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 1969 तथा 1975 की एशियन बास्केटबॉल चैंपियनशिप में भारतीय टीम की कप्तानी की। 1970 में वे बैंकॉक एशियन गेम्स में भारतीय टीम का हिस्सा रहे। उसी साल उनका चयन Asian All-Star Team में हुआ। यह उनके करियर का वह दौर था जब उनका नाम भारत से निकलकर पूरे एशिया के बास्केटबॉल सर्किट में पहचान बना रहा था।
देश के लिए उपलब्धियां
अब्बास मूंतासिर का करियर करीब तीन दशक तक चला। उनकी प्रमुख उपलब्धियों में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व, कप्तानी और एशियन स्तर पर पहचान शामिल रही। 1969 और 1975 में उन्होंने एशियन बास्केटबॉल चैंपियनशिप में भारत की कप्तानी की। 1970 के बैंकॉक एशियन गेम्स में वे भारतीय टीम का हिस्सा रहे। इसी वर्ष उन्हें एशिया के चुनिंदा खिलाड़ियों के बीच Asian All-Star Team में जगह मिली। लेकिन 1970 उनके करियर का सबसे यादगार साल इसलिए बना क्योंकि इसी वर्ष उन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिला।

अर्जुन अवॉर्ड तक का सफर
1970 में गुलाम अब्बास मूंतासिर को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उपलब्ध पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका नाम 1970 के बास्केटबॉल अर्जुन अवॉर्डी के रूप में दर्ज है। इस सम्मान के साथ उन्होंने इतिहास भी बनाया। वे भारत के पहले बास्केटबॉल खिलाड़ी बने जिन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिला। दिलचस्प बात यह है कि उसी साल उन्हें Asian All-Star Team में भी चुना गया। यानी 1970 में एक तरफ भारत ने उन्हें अपने सर्वोच्च खेल सम्मानों में से एक से सम्मानित किया, तो दूसरी तरफ एशिया ने भी उनके खेल को पहचान दी।
प्रेरक कहानी: सिर्फ खेलना नहीं, खेल को बदलना भी
अब्बास मूंतासिर की कहानी का सबसे प्रेरक हिस्सा सिर्फ उनकी उपलब्धियां नहीं, बल्कि उनका बेहद बेबाक व्यक्तित्व था। अंतरराष्ट्रीय दौरों के दौरान उन्होंने दूसरे देशों के खिलाड़ियों को देखा और महसूस किया कि भारतीय बास्केटबॉल को आगे बढ़ने के लिए अपने पुराने तौर-तरीकों में बदलाव करना होगा। उन्होंने खेल की पुरानी शैली, रेफरिंग और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाए।
उनकी यह बेबाकी अधिकारियों को हमेशा पसंद नहीं आई और उनके विरोध के चलते उन्हें तीन साल के लिए निलंबित भी किया गया। लेकिन उन्होंने अपनी बात रखने से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि अगर भारत को अंतरराष्ट्रीय बास्केटबॉल में आगे बढ़ना है तो खिलाड़ियों को आधुनिक तकनीक और फिटनेस पर ध्यान देना होगा। यही सोच उन्हें अपने दौर के कई खिलाड़ियों से अलग बनाती थी।
44 साल की उम्र तक कोर्ट पर
अब्बास मूंतासिर का बास्केटबॉल के प्रति जुनून उम्र के साथ कम नहीं हुआ। उन्होंने करीब 28 वर्षों तक प्रतिस्पर्धी बास्केटबॉल खेला और 1986 में 44 वर्ष की उम्र में Federation Cup में रेलवे की ओर से अपना आखिरी राष्ट्रीय स्तर का मुकाबला खेला। यानी जिस खेल से उनका रिश्ता नौ साल की उम्र में शुरू हुआ था, उससे प्रतिस्पर्धी स्तर पर उनका सफर चार दशक से भी ज्यादा उम्र तक चलता रहा। खेल के बाद भी बास्केटबॉल उनके साथ रहा
संन्यास के बाद भी अब्बास ने बास्केटबॉल से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने अपने अनुभवों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश की और ‘Principles of Basketball’ नाम की किताब भी लिखी। उन्होंने फिल्मों में भी काम किया और खेल के बाहर भी अपनी अलग पहचान बनाई। लेकिन बास्केटबॉल हमेशा उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा।

आज वे क्या कर रहे हैं?
गुलाम अब्बास मूंतासिर अब हमारे बीच नहीं हैं। 15 नवंबर 2022 को मुंबई में 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। बीमारी के बाद उनका निधन हुआ और भारतीय बास्केटबॉल ने अपने शुरुआती महान खिलाड़ियों में से एक को खो दिया। लेकिन उनकी विरासत आज भी कायम है। एक नौ साल के बच्चे से शुरू हुआ सफर भारतीय बास्केटबॉल के पहले अर्जुन अवॉर्ड तक पहुंचा। उन्होंने भारत की कप्तानी की, एशियन स्तर पर खेला, Asian All-Star Team में जगह बनाई और 44 साल की उम्र तक कोर्ट पर डटे रहे।
Basketball Veteran, Arjuna Awardee
Shri Gulam Abbas Moontasir's message for Young Indian Ballers🏀
Its time to show what you got, work hard and achieve greatness! ✌️#IndianBasketBall #India @Iam_KGovindaraj @ChanderMukhiS @RijijuOffice pic.twitter.com/na3n0hTvhr
— #IndiaBasketball (@BFI_basketball) February 13, 2021
गुलाम अब्बास मूंतासिर की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब भारतीय खेलों में सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन सपने बड़े थे। नागपाड़ा के एक छोटे से कोर्ट से शुरू हुई उनकी यात्रा ने यह साबित किया कि किसी खेल को महान बनाने के लिए सिर्फ बड़े मैदान नहीं, बड़े सपने और उन्हें पूरा करने का जुनून भी चाहिए।
और शायद यही वजह है कि भारतीय बास्केटबॉल के इतिहास में गुलाम अब्बास मूंतासिर का नाम आज भी एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में याद किया जाना चाहिए, जिसने सिर्फ बास्केटबॉल खेला नहीं, बल्कि भारत में इस खेल के लिए एक रास्ता बनाया।