धर्म से परे ‘मनुष्य’: मीरातुन नाहार की कलम का मानवीय सत्य

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 11-01-2026
Beyond religion: The human truth in the writings of Miratun Nahar.
Beyond religion: The human truth in the writings of Miratun Nahar.

 

शम्पी चक्रवर्ती पुरकायस्थ

बांग्ला साहित्य और सामाजिक चिंतन की दुनिया में मीरातुन नाहार एक ऐसी सशक्त और स्वतंत्र आवाज़ हैं, जिन्हें किसी एक पहचान, वर्ग या धर्म की सीमा में बाँधना संभव नहीं है। वे एक लेखिका, शोधकर्ता और दर्शनशास्त्र की अध्यापिका रही हैं, लेकिन इन सभी परिचयों से ऊपर उनकी सबसे बड़ी पहचान एक संवेदनशील और प्रतिबद्ध मानवतावादी की है। उनका मानना है कि मनुष्य की पहचान किसी धर्म, जाति या समुदाय से नहीं, बल्कि उसके विचारों और कर्मों से बनती है। इसलिए वे स्वयं को किसी धार्मिक पहचान में नहीं बाँधतीं और साफ़ शब्दों में कहती हैं कि धर्म व्यक्ति का निजी विषय है, उसे सार्वजनिक पहचान का आधार नहीं बनाना चाहिए। वे खुद को केवल एक शब्द से परिचित कराती हैं-मनुष्य।

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उत्तर 24 परगना जिले के बौलागाछी गाँव में ननिहाल में जन्मी मीरातुन नाहार बचपन से ही पढ़ाई और विचारों में गंभीर रही हैं। उन्होंने कोलकाता के प्रतिष्ठित लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

इसके बाद जादवपुर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियाँ केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक को समाज से जोड़ने की उनकी सोच ने उन्हें एक अलग पहचान दी। वर्ष 1975 से 2009 तक, पूरे 34 वर्षों तक, उन्होंने कोलकाता के विक्टोरिया कॉलेज में दर्शनशास्त्र पढ़ाया और कई पीढ़ियों के विद्यार्थियों को तर्कशील सोच, प्रश्न करने की आदत और मानवीय मूल्यों से परिचित कराया।

dमीरातुन नाहार का लेखन तर्क, संवेदना और सामाजिक ज़िम्मेदारी का संतुलित मेल है। एक निबंधकार के रूप में उनकी पहचान विशेष रूप से उन रचनाओं से बनी है, जिनमें उन्होंने साहित्य और समाज को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई इकाइयों के रूप में देखा है। हेनरी लुई विवियन डिरोज़ियो, सैयद मुजतबा अली, माइकल मधुसूदन दत्त, रेज़ाउल करीम, गोपाल हलदार, समरेश बसु और अख़्तरुज़्ज़ामान इलियास जैसे साहित्यकारों और विचारकों पर लिखे उनके निबंध केवल साहित्यिक आलोचना नहीं हैं, बल्कि अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक सवालों पर गंभीर विमर्श भी हैं। उनके लिए साहित्य महज़ सौंदर्य की वस्तु नहीं, बल्कि समाज को समझने और बेहतर बनाने का माध्यम है।

एक महिला लेखिका के रूप में मीरातुन नाहार की कलम न तो भावुकता में बहती है और न ही शुष्क सैद्धांतिक बहस में उलझती है। उनके लेखन का केंद्र समाज में बढ़ती असहिष्णुता, लोगों के बीच टूटते संबंध और मानवीय संवेदना का क्षरण है। वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘विकृत मानसिकता’ की अवधारणा को आधार बनाकर यह दिखाती हैं कि आधुनिकता और विकास के नाम पर हम किस तरह करुणा, सहानुभूति और नैतिक मूल्यों को खोते जा रहे हैं। उनके अनुसार यह समस्या किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर चेतावनी है।

महिलाओं के अधिकार और स्वतंत्रता के सवाल पर मीरातुन नाहार का रुख़ बिल्कुल स्पष्ट और साहसी है। वे महिलाओं की आवाज़ बनकर लिखती हैं, लेकिन किसी संकीर्ण पहचान की राजनीति से दूर रहकर। उनके लेखन में नारीवाद मानवतावाद से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। रोकेया सख़ावत हुसैन, बेगम सूफ़िया कमाल और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसी हस्तियों पर लिखी उनकी किताबें यह साबित करती हैं कि मुस्लिम समाज के भीतर से ही शिक्षा, महिला स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सद्भाव की सशक्त परंपरा विकसित हुई थी। वे इस परंपरा को सामने लाकर समाज में फैली रूढ़ धारणाओं को तोड़ती हैं।

राज्य और राजनीति के प्रश्न पर उनकी लेखनी और भी अधिक निर्भीक हो जाती है। राज्य द्वारा की जाने वाली हिंसा, चुनावों के दौरान होने वाला रक्तपात और लोकतंत्र के कमजोर होते ढांचे जैसे मुद्दों पर उन्होंने बिना किसी डर के लिखा है। उनके लिए राजनीति सत्ता की पूजा नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का सवाल है। इन लेखों में वे किसी समुदाय की प्रतिनिधि नहीं, बल्कि एक जागरूक और ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में सामने आती हैं, जो सत्ता से सवाल करने का साहस रखती हैं।

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अपनी पुस्तक ‘संख्यालघु मानवी मैं’ में मीरातुन नाहार ने अपने जीवन के अनुभवों को भी शब्द दिए हैं। हालांकि ये अनुभव किसी तरह की शिकायत या पीड़ा की कहानी नहीं बनते, बल्कि समझ, संवाद और सौहार्द की राह खोलते हैं। अल्पसंख्यक होने का उनका अनुभव समाज में विभाजन की दीवारें खड़ी नहीं करता, बल्कि इंसानियत के साझा धरातल को मजबूत करता है। उनके लिए सौहार्द कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि साहित्य, संस्कृति और रोज़मर्रा के व्यवहार में जी जाने वाला मूल्य है।

उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ‘अमृते विषे’, ‘देश कन्या की कलम से’, ‘मुस्लिम महिला मनीषा’, ‘आज़ान’ और ‘राजनीति राजनीति’ जैसी महत्वपूर्ण कृतियाँ शामिल हैं। संपादक के रूप में ‘अमूल्य बंग रत्न की खोज में’ और ‘अंतःस्वर’ उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा दर्शन से जुड़ी ‘दर्शन चर्चा और दर्शन चर्या’ तथा ‘फ़्रॉयड: जीवन-वृत्तांत’ जैसी कई पुस्तकें प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं, जो उनके विचार संसार को और विस्तार देंगी।

आज के समय में, जब समाज नफ़रत, डर और विभाजन की राजनीति से लगातार घायल हो रहा है, मीरातुन नाहार का जीवन और साहित्य हमें एक ज़रूरी सीख देता है। वे याद दिलाती हैं कि किसी भी तरह की पहचान से ऊपर उठकर मनुष्य बनना ही सबसे बड़ा प्रतिरोध है। उनकी कलम का संदेश बिल्कुल साफ़ है,सौहार्द ही सभ्यता की असली पहचान है, और मानवता ही अंतिम सत्य।