75 का भारतः उत्सव और उम्मीदों का वक्त

Story by  मंजीत ठाकुर | Published by  [email protected] • 1 Years ago
75 का भारतः उत्सव और उम्मीदों का वक्त
75 का भारतः उत्सव और उम्मीदों का वक्त

 

डॉ. सुरजीत एस.भल्ला

भारत अब 75 साल की देहरी पर है और ऐसे में यह वक्त है कि हम इस बात की समीक्षा करें कि हम कहां से चलकर कहां तक आ गए और हम किधर जानेवाले हैं. यह समय कि हम विमर्श और बहसों के मापदंड बदल दें. बेशक, यह वक्त उत्सवों, सचाई, मेल-मिलाप और आशा का भी समय है.

हमारी आजादी के वक्त, भारत इस उप-महाद्वीप में आजादी की अहिंसक लड़ाई लड़ रहा था और उसकी इस बात की तारीफ भी हो रही थी. बेशक, हमारे कुछ योजनाकारों की राह हमसे अलग थी और वे एक मुस्लिम देश बनाने पर विचार कर रहे थे दूसरी तरफ एक ऐसा देश था (भारत) जिसका कोई एक आधिकारिक धर्म नहीं था. 

उन योजनाकारों ने कभी यह अनुमान भी नहीं लगाया था कि बंटवारे की लड़ाई एक ऐसा पैदाइशी दाग है जिसकी कोई इतिहासकार और विश्लेषक या फिर राजनेता उचित तरीके से व्याख्या नहीं कर पाया. यह ऐसा विषय था जिस पर कोई बात नहीं होती थी, लेकिन व्याख्या हो या न हो, इसके दाग बरकरार है.

हमलोग एक निरक्षर आबादी थे (औसतन लोग एक साल ही स्कूल जाते थे.), प्रजनन क्षमता असाधारण रूप से काफी थी (लेकिन देश में प्रतिव्यक्ति आय 150डॉलर सालाना से भी कम थी) और हमारे राजनैतिक नेता साम्यवाद, औद्योगीकरण और राज्य के नियंत्रण के रूसी संस्करण से चमत्कृत थे. अतीत पर टिप्पणी करने में एक बढ़त यह होती है कि आपको इतिहास की गतियों का पता चल जाता है. और उस अतीत में, दुर्लभ अपवादों को छोड़कर हम सभी सहभागी थे. और इतने अधिक थे कि हमने अपने संविधान की प्रस्तावना में बदलाव कर दिया ताकि वह हमें धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी राज्य के रूप में पारिभाषित कर सके.

यह  1976का भारत था और इस वक्त तक भारत तीस साल का थी. उसवक्त प्रतिव्यक्ति या करीबन इतनी ही थी जितनी 1947में. अमेरिकी डॉलर के परिप्रेक्ष्य में, भारत में प्रतिव्यक्ति आय 1976में 126डॉलर थी. दुनिया में गरीबी के मामले में हमारा स्थान आठवां था और पीपीपी डॉलर के लिहाज से हम सोलहवें सबसे गरीब देश थे. 1950में, हम दुनिया के दूसरे सबसे अधिक गरीब देश थे.

75का होने पर हम भारत की समीक्षा लोकतंत्र और राष्ट्रीयता के संदर्भों में करेंगे. हमें कौन सी चीज एकसाथ जोड़ती है—यह सवाल बहुत मुश्किल है. एक और प्रश्न है—हमने वृद्धि हासिल करने और गरीबी उन्मूलन के दोहरे लक्ष्य को हासिल करने में कितनी कामयाबी पाई है? और इससे जुड़ा अनिवार्य प्रश्न चीन की कामयाबी के मॉडल के साथ हमारी तुलना का है.

अधिकतर (भले ही सभी न हो) समाजों का लक्ष्य एक समतामूलक समाज के लिए प्रावधान जुटाने का है. अधिकतर लोग सहमत होंगे कि समतामूलक समाज के लिए लोकतंत्र अपरिहार्य है.

महामारी की अराजकता के बावजूद, साथ ही रूसी-यूक्रेनी यूद्ध के बीच, 2025-26में डॉलर जीडीपी प्रधानमंत्री मोदी के 2019की 5ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की उम्मीदों के काफी करीब होगी और हो सकता है कि उसको पार भी कर जाए.

भारत और भारतीयों के लिए गर्व करने लायक बहुत कुछ है. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती एकता और विविधता दोनों को बनाए रखने की है.

क्या हम अमेरिका से अधिक लोकतांत्रिक हैं        

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और अमेरिका सबसे पुराना. इससे पहले कि हम दोनों की तुलना करे, भारत के सामने एक सवाल है—भारत ने एक लोकतंत्र के तौर पर कैसा प्रदर्शन किया है.

किसी ने भी भारत को एक लोकतंत्र के तौर पर कामयाब होने की मौका नहीं दिया है. सरकार के लोकतांत्रिक रूप को अपनाने वाले समाजों का एक मजबूत सुसंगत सहसंबंध और उसका कारण मध्य वर्ग या पूंजीपति वर्ग की एक महत्वपूर्ण उपस्थिति है.

अपने क्लासिक अध्ययन में, बैरिंगटन मूर (सोशल ऑरिजिंस ऑफ डेमोक्रेसी एंड डिक्टेटरशिप, 1964) का सुझाव है कि यह समीकरण 'नो बुर्जुआ, नो डेमोक्रेसी' है. 1947में अधिकतर परिभाषाओं के मुताबिक भी, कोई मध्य वर्ग मौजूद नहीं था. इसलिए 1947में भारत द्वारा लोकतंत्र अपनाया जाना एक पहेली और अजूबा ही है.

भारत द्वारा लोकतंत्र अपनाने को लेकर कई अलग तरह की व्याख्याएं हैं और यह भी यह लोकतांत्रिक क्यों बना रहा. बेरिंग्टन मूर की पहेली का जवाब देने वाली इस व्याख्या का उत्तर यही है कि कोई पहेली है ही नहीं.

भारत ने एक लोकतंत्रात्मक शासन इसलिए अपनाया क्योंकि यह उसकी विरासत रही है. इस विरासत के दो पहलू हैः भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश तो था ही, यह नस्लीय और सांस्कृतिक रूप से वैविध्य भरा भी था. ब्रिटिश शान की मौजूदगी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की उपस्थिति की गारंटी दी और विविधता ने विकल्पहीनता की ओर इशारा किया.

लोकतंत्र शासन का एकमात्र तरीका है, जो विभिन्न नस्लीय और सांस्कृतिक समूहों की अहम भूमिका की गारंटी दे सकता है. यही वह विविधता है जो पारस्परिक हितों को जोड़कर रखती है. अपने पड़ोसियों को देखिए. उनमें काफी समानता है, बहुत कम विविधता है लेकिन वहां लोकतंत्र पर लगातार खतरा बना रहता है.

लोकतांत्रिक विरासत परिकल्पना के लिए काफी अनुभवजन्य समर्थन है.स्वतंत्रता के समय दक्षिण एशिया में लोकतंत्र के प्रति प्रबल रुझान था.यह इस तथ्य से भी समर्थित है कि चार प्रमुख दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाएं: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका, सभी ने अपनी सरकार के पहले रूप के रूप में लोकतंत्र को अपनाया.

हालांकि, वे उस पर टिके नहीं रह सके, खासकर पाकिस्तान में. ऐसे में, भारत में लोकतंत्र को बनाए रखने में अन्य कारक महत्वपूर्ण हो सकते हैं. ऐसा ही एक कारक भारतीय राजनीति में विविधता की चरम प्रकृति की मौजूदगी हो सकती है.

शोध में आंकड़े एक बात की ओर इशारा करते हैं कि ब्रिटिश उपनिवेशों में एक महत्वपूर्ण रुझान लोकतांत्रिक शासन पद्धति को अपनाने की ओर रहा है.

संभवतया, यह कोई संयोग नहीं है कि दुनिया का सबसे समृद्ध लोकतंत्र और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दोनों पर ही ब्रिटिश शासन था. इसके उलट, बेहद कम फ्रांसीसी (या जर्मन, या पुर्तगाली या स्पेनी) उपनिवेशों ने लोकतंत्र के मोर्चे पर कोई अच्छा प्रदर्शन किया है या कम से कम आजादी के कुछ दशकों तक ऐसा करने की ओर रुझान दिखाया है. लेकिन, नस्लीय विविधता भी महत्वपूर्ण है, संभवतया यही वो गोंद है जो विभिन्न लोगों को जोड़कर रखता है.

नस्लीय विविधता जितनी अधिक होगी, लोकतंत्र को अपनाने की संभाव्यता भी उतनी अधिक होगी.

यह मॉडल बताता है कि 1960 भारत के लोकतंत्र होने की संभावना 73 फीसद थी. वास्तव में, भारत में लोकतंत्र इसलिए भी कामयाब रहा क्यों कि यह एकमात्र राजनैतिक व्यवस्था थी जो इसकी विषमांगी आबादी के लिए माकूल थी.

अधिकतर विश्लेषण 1950 के दशक में भारत की गरीबी और निरक्षरता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और उनको भारत के लोकतांत्रिक होने की कोई उम्मीद नहीं थी, और ये विद्वान इस बात की तारीफ नहीं करते कि लोकतंत्र एकमात्र व्यवस्था है जो हरेक व्यक्ति को कम नाखुश रख सकता है.

लोकतांत्रिक व्यवस्था, कम से कम सैद्धांतिक रूप से ही, हरके समूह और हरेक व्यक्ति को एक मौका देता है कि वह निर्णय प्रक्रिया में हिस्सा ले सके. बेशक इसे एक छोटा मौका कहा जा सकता है लेकिन अगर व्यवस्था अलोकतांत्रिक हो तो, चाहे राजतंत्र हो या कम्युनिस्ट तानाशाही, तो इस मौके की बात भी नहीं हो सकती. ऐसे में इन छोटे मौकों को मौजूद होने की संभावना की भी तारीफ की जानी चाहिए.

ऐसे में, भारतीय लोकतंत्र के पीछे की तार्किकता के बारे में कहा जा सकता हैः ब्रिटिश संस्थाओं की विरासत में एक मजबूत, सकारात्मक रूप से लोकतांत्रिक झुकाव मौजूद था.

विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक समूहों के वोट सशक्तिकरण का मतलब था कि प्रत्येक समूह, विशेष रूप से छोटे समूहों का लोकतंत्र में एक मजबूत हिस्सा था.

इस सशक्तिकरण का एक सह-सम्बन्ध एक अखंड भारत के लिए सभी समूहों की इच्छा थी; केवल एक अखंड भारत में ही प्रत्येक गैर-बहुसंख्यक समूह की हिस्सेदारी होगी. इसलिए समाज के अधिकांश वर्गों के बीच लोकतंत्र सबसे पसंदीदा विकल्प था. 

सबसे बड़ा और सबसे पुराना लोकतंत्र

 

अगल विमर्श लोकतंत्र के बारे में है जो अमेरिका के साथ भारत की तुलना अपरिहार्य हो जाती है. पारंपरिक बौद्धिक अमेरिका की तरफ झुकाव रखते हैं और उसको अधिक परिपक्व और बेहतर ढंग से कामकाज करने वाला लोकतंत्र मानते है. लेकिन सचाई इस धारणा से अलग है.

भारत ने शुरुआत से ही सार्वभौमिक मताधिकार अपनाया - एक व्यक्ति, एक वोट, जाति, धर्म, जातीयता या संपत्ति के स्वामित्व की परवाह किए बिना. लेकिन अमेरिका के मामले में ऐसा नहीं था—सार्वभौमिक मताधिकार वहां भारत के बाद आया और संपत्ति का अधिकार अमेरिका में निजता या मानवाधिकारों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं.

दोनों देशों में लोकतंत्र को लेकर और अधिक भिन्नताएं हैं. अमेरिका में निर्वाचक मंडल की व्यवस्था है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति का चयन मतदान के रुख को बताए जह जरूरी नहीं है.

एक मोटा अनुमान बताता है कि 30 फीसद निर्वाचक 70 फीसद से अधिक सीनेट सीटों पर नियंत्रण रखते हैं. बंदूक संस्कृति और गिंसा (या महिला अधिकारों) की बात करें तो स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका में लोकतंत्र वास्तविकता से कहीं अधिक हवा-हवाई है.

भारत में भी बेशक, चुनावी हिंसा होती है और लोकतंत्र के साथ छेड़खानी की गई (मिसाल के तौर पर 1975 से 1977 तक लागू आपातकाल), लेकिन चुनावी हिंसा पर महत्वपूर्ण तरीके से कमी लाई गई है और सरकार में कई तरह के परिवर्तन भी आए हैं और ऐसा लोकतांत्रिक नियमितता के साथ किया गया है और इन परिवर्तनों के पीछे किसी तरह की हिंसा नहीं हुई.

भारतीय लोकतंत्र के साथ एक असली समस्या है कि यहां बहुत सारे चुनाव आयोजित होते हैं और भारत हमेशा चुनावी मोड में रहता है. लेकिन 75 साल के मोड़ पर भारत के पास प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से आया एक साथ चुनाव करवाने का प्रस्ताव भी है, जिसमें विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ करवाए जाने हैं.