एक कला ऐसी भी: रिटायर होने के बाद शुरू की स्ट्रिंग आर्ट पेंटिंग नाम दिया द रिटायर्ड आर्ट

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari • 2 Months ago
एक कला ऐसी भी: रिटायर होने के बाद शुरू की स्ट्रिंग आर्ट पेंटिंग नाम दिया द रिटायर्ड आर्ट
ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली 

यूं तो दुनिया में विभिन्न प्रकार की पेंटिंग है लेकिन आज मैं आपको एक अलग तरीके की पेंटिंग्स के बारे में जानकारी दे रही हूँ जोकि एमडीएफ बोर्ड पर तैयार की जाती हैं धागों और कीलों के साथ. बृजेश कुमार ने बताया कि रिटायर्ड आर्ट मेरे लिए एक इमोशन के अलावा और कुछ नहीं है. सेवानिवृत्ति के बाद यह मेरी छोटी सी खुशियों की दुनिया है. 

द रिटायर्ड आर्ट के नाम की इस स्टाल पर शिल्पकार बृजेश कुमार के साथ उनकी पत्नी और उनके बेटे और उनके दोस्त भी थे. इस स्टाल पर काफी भीड़ थी. यहां सभी पेंटिंग्स धागे से बनाई गई थी जिसमें एक नन्हा बच्चा, लैंडस्केप, स्वस्तिक, ओम इत्यादि चित्र शामिल थे.
 
 
 
इसे स्ट्रिंग आर्ट के नाम से जाना जाता है, जिसे प्राइवेट नौकरी से रिटायर होने के बाद ब्रजेश कुमार ने द रिटायर्ड आर्ट का नाम दिया यानी की अंत: अस्ति प्रारंभ और अपनी जिंदगी आगे इस आर्ट के सहारे गुजारने की ठानी.
 
ये कलाकृतियां बृजेश कुमार ने सिर्फ़ धागे और कील के पैटर्न से बनाईं हैं. बृजेश कुमार से बात करने पर उन्होंने कहा कि फैक्ट्री से हथौड़ा कील का हुनर आया है और उनके पिताजी से कला का. बृजेश कुमार के पिताजी भी स्केचिंग, पत्थर और लकड़ी के रचनात्मक कलाकृतियों के काम में रुचि रखते थे.
 
 
खटीमा (उत्तराखंड) के बृजेश कुमार ने मैकेनिकल फिटर के रूप में आईटीआई करने के बाद अपना पूरा जीवन मशीनों के बीच बिताया. सेवानिवृत्त के बाद एक कला को चुना जिसमें परिवार और दोस्तों से दूसरी पारी को सहयोग मिला. आगे बढ़ाने के लिए निश्चय किया. उन्हें पहले भी पेंटिंग, पत्थर और लकड़ी के काम में रुचि थी. उन्होंने बताया कि उनके पिता भी आर्टिस्ट थें. 
 
बृजेश कुमार ने दि रिटायर्ड आर्ट की शुरुआत की है. बृजेश कुमार ने फैक्ट्री से रिटायर होने के बाद पेंटिंग बनाना शुरू किया और बाद में रिटायर्ड आर्ट की स्थापना की. द रिटायर्ड आर्ट की तारीफ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने भी खटीमा द्वार पर की थी.
 
 
कला प्रेमियों की पसंद बन रहा है द रिटायर्ड आर्ट. द रिटायर्ड आर्ट के प्रदर्शनी ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी. अज़हर इक़बाल से लेकर कॉलेज के छात्रों ने पेंटिंग को भरपूर प्यार दिया साथ ही अलग-अलग संस्थाओं ने उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित किया जिनमें से प्रमुख ऑल इंडिया रेडियो/ आकाशवाणी आदि थे.
 
उनकी इस कहानी को सोशल मीडिया पर अब तक 60,000 लोगों से भी ज्यादा लोग देख चुके हैं. 
बृजेश कुमार ने बताया कि प्लाईबोर्ड पर कील और धागों से ये अपनी पेंटिंग्स तैयार करते हैं. लोगों की पसंद के अनुसार भी ये पेंटिंग बनाते हैं. लोग इनकी पेंटिंग्स को शोक से खरीदते हैं ताकि ये उनके घरों की सजावट और दफ्तरों की शान बन सके. इनकी पेंटिंग्स 1000 रुपए से लेकर 12000 रुपए तक की हैं. 
 
 
कई वर्षों तक कारखानों में काम करने से हथेलियाँ सख्त हो गई और उँगलियाँ लकड़ी की तरह बन गई हैं, मुझे मेरी पत्नी के साथ एक सुंदर परिवार मिला है जो हमारे जीवन का प्रबंधन करती है, मेरी बेटी वर्तमान में पीएचडी कर रही है और दिल्ली में काम कर रही है.
 
 
बृजेश कुमार ने बताया कि रिटायर्ड आर्ट मेरे लिए एक इमोशन के अलावा और कुछ नहीं है. सेवानिवृत्ति के बाद यह मेरी छोटी सी खुशियों की दुनिया है. बृजेश कुमार ने बताया कि यह कला उनके लिए अपनी ज़िंदगी का बाकी वक़्त गुज़ारने का अच्छा माध्यम है.