नई दिल्ली। लाल मांस, सॉसेज और अन्य प्रसंस्कृत मांस का नियमित रूप से सेवन करने से स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं। शोध के अनुसार, विशेष रूप से अधिक मात्रा में प्रसंस्कृत मांस खाने से कोलोरेक्टल कैंसर यानी बड़ी आंत और मलाशय के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि कभी-कभार मांस खाने से कैंसर हो जाएगा। स्वास्थ्य संबंधी चिंता मुख्य रूप से लंबे समय तक नियमित रूप से अधिक मात्रा में लाल मांस और प्रसंस्कृत मांस
का सेवन करने को लेकर है।
लाल मांस और प्रसंस्कृत मांस में क्या अंतर है?
लाल मांस में स्तनधारी पशुओं का मांस शामिल होता है। इसमें गोमांस, भैंस, भेड़ और बकरी का मांस प्रमुख हैं। इसे ताजा, कीमा बनाकर या जमाकर रखा जा सकता है।
वहीं, प्रसंस्कृत मांस वह होता है जिसे स्वाद बढ़ाने या लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए नमक, धुएं, किण्वन या अन्य प्रक्रियाओं से गुजारा जाता है। सॉसेज, कॉर्न्ड बीफ और कुछ डिब्बाबंद मांस उत्पाद इसके उदाहरण हैं। मुर्गे के मांस से बने कुछ उत्पाद भी प्रसंस्कृत मांस की श्रेणी में आ सकते हैं।
मांस खाने और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच क्या संबंध है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने लाल मांस और प्रसंस्कृत मांस के सेवन से जुड़े वैज्ञानिक साक्ष्यों का मूल्यांकन किया है।
एजेंसी ने प्रसंस्कृत मांस को मनुष्यों के लिए कैंसरकारी श्रेणी में रखा है, क्योंकि इसके सेवन और कोलोरेक्टल कैंसर के बीच संबंध के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। वहीं, लाल मांस को संभावित कैंसरकारी श्रेणी में रखा गया है, क्योंकि इसके संबंध में उपलब्ध प्रमाण अपेक्षाकृत सीमित हैं।
WHO के अनुसार, प्रतिदिन 50 ग्राम प्रसंस्कृत मांस खाने से कोलोरेक्टल कैंसर का सापेक्ष जोखिम लगभग 18 प्रतिशत बढ़ने से जुड़ा पाया गया है। इसी तरह, प्रतिदिन 100 ग्राम लाल मांस के सेवन से इस जोखिम में लगभग 17 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, यदि यह संबंध कारणात्मक हो।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है: जोखिम में 18 या 17 प्रतिशत की वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि मांस खाने वाले हर व्यक्ति को कैंसर होने की इतनी संभावना है। ये आंकड़े सापेक्ष जोखिम में बदलाव दर्शाते हैं, न कि किसी व्यक्ति के कैंसर होने की वास्तविक संभावना।
शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे संभावित कारणों की पहचान की है, जिनकी वजह से मांस का सेवन कैंसर के खतरे से जुड़ सकता है।
प्रसंस्करण की प्रक्रिया: मांस को नमक लगाकर सुरक्षित रखने, धुआं देने या अन्य तरीकों से तैयार करने पर कुछ संभावित कैंसरकारी रासायनिक यौगिक बन सकते हैं।
तेज तापमान पर पकाना: मांस को ग्रिल, बारबेक्यू या पैन में बहुत अधिक तापमान पर पकाने से हेटेरोसाइक्लिक एरोमैटिक एमीन और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसे यौगिक बन सकते हैं।
लंबे समय तक सेवन: नियमित रूप से अधिक मात्रा में प्रसंस्कृत मांस खाने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।
हालांकि, मांस को पकाने के अलग-अलग तरीकों और कैंसर के खतरे के बीच संबंधों को पूरी तरह समझने के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।
क्या मांस खाना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए?
जरूरी नहीं। लाल मांस प्रोटीन, आयरन, जिंक और विटामिन बी12 जैसे आवश्यक पोषक तत्वों का स्रोत है। इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाया जा सकता है। मुख्य चिंता प्रसंस्कृत मांस के नियमित सेवन और लाल मांस की अधिक मात्रा को लेकर है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, खानपान में कुछ व्यावहारिक बदलाव किए जा सकते हैं:
सॉसेज और अन्य प्रसंस्कृत मांस उत्पादों का सेवन सीमित रखें।
लाल मांस को रोजाना अधिक मात्रा में खाने से बचें।
दाल, चना, राजमा और अन्य फलियों को आहार में शामिल करें।
हरी सब्जियों, साबुत अनाज और फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ाएं।
मांस पकाते समय उसे बहुत अधिक तापमान पर जलाने से बचें।