The Supreme Court will examine whether the ED cannot prosecute a person who is acquitted in a criminal case.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने देश भर में सैकड़ों मामलों में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की गई अभियोजन कार्रवाई को प्रभावित करने वाले व्यापक कानूनी प्रश्न की पड़ताल करने पर मंगलवार को सहमति व्यक्त की।
इसके तहत क्या किसी आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति के बरी होने का मतलब यह होगा कि आरोपी पर धनशोधन के अपराध के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने शिकायत की कि जब मूल अपराध में “बड़े और प्रभावशाली लोग” शामिल होते हैं, तो अलग-अलग राज्यों की पुलिस ढिलाई बरतती है। ऐसे मामलों में आरोपियों के बरी हो जाने से धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई नहीं हो पा रही है। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है मानो ईडी को पूरी तरह से बाहर ही कर दिया गया हो।
पीएमएलए के तहत मूल अपराध (या अनुसूचित अपराध) वह अपराध है जिससे ‘‘अपराध की आय’’ उत्पन्न होती है, जो ईडी द्वारा मामले की जांच शुरू करने के लिए एक पूर्व शर्त है।
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विजय मदनलाल चौधरी मामले के 2022 के फैसले पर संदेह व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘कई उलझनों को सुलझाना बाकी है।’’ इस फैसले में ईडी की गिरफ्तारी, तलाशी और ज़ब्ती की शक्तियों को बरकरार रखा गया था।
पीठ ने कहा कि इस निष्कर्ष से सहमत होना मुश्किल है कि अगर मूल अपराध रद्द कर दिया जाए, तो धनशोधन का मामला अपने आप खत्म हो जाएगा।
इसने कहा, “ईडी का मामला मूल अपराध पर क्यों निर्भर करता है? हर मामले के अपने तथ्य होते हैं और वे एक-दूसरे पर निर्भर नहीं हो सकते। ईडी मूल अपराध का बचाव करने के लिए अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं है। यह हमारी समझ से परे है। ये गंभीर आर्थिक अपराध हैं।”
ईडी की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने कहा कि 2022 के फैसले की कई लोगों ने अलग-अलग तरह से व्याख्या की है और उन्होंने धनशोधन के मामलों में अभियोजन के दौरान उन्हें हो रही कठिनाइयों की ओर इशारा किया।