अर्सला खान/नई दिल्ली
मुस्लिम समाज में दो बड़े त्योहार माने जाते हैं, ईद और बकरीद, लेकिन इसके अलावा कई अन्य अवसर हैं, जिन्हें लोग त्योहार की तरह मनाते हैं, जैसे शब-ए-बारात, मुहर्रम और आखिरी चाहशबा। असल में ये त्योहार नहीं, बल्कि इस्लामिक घटनाएँ हैं, लेकिन भारत में इन्हें स्थानीय रंग और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर बिहार में आखिरी चाहशबा को ‘विश्व कर्मा पूजा’ की तरह मनाया जाता है। मशीनें साफ की जाती हैं, कार्यशालाएँ सजाई जाती हैं और मिलाद-फातिहा का आयोजन होता है।
मुहर्रम भी इसी तरह की घटना है। यह पैगंबर मुहम्मद ﷺ के नवासे और उनके कबीले के लोगों के शहीद होने की याद दिलाती है। भारत में इसे अक्सर दशहरे के रंग और अंदाज से जोड़ा जाता है। शब-ए-बारात भी ऐसा ही अवसर है। इस रात की अहमियत को दीवाली के रौनक और सजावट के समान देखा जाता है। लोग घरों की सफाई करते हैं, हलवा और मिठाइयाँ बनाते हैं, घरों को रौशनी से सजाते हैं और पूरी रात इबादत करते हैं।
शब-ए-बारात शाबान महीने की पंद्रहवीं रात को होती है। ‘शब’ का मतलब रात और ‘बारात’ का अर्थ है निजात, बख़्शिश या गुनाहों से छुटकारा। इस रात को अल्लाह की रहमत और मग़फिरत की रात माना जाता है। लोगों का मानना है कि इस रात अल्लाह अपने बंदों की दुआएं स्वीकार करता है और सच्चे दिल से मांगी गई माफी अता करता है। यही कारण है कि इसे इस्लाम की सबसे मुक़द्दस रातों में गिना जाता है।
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने भी इस रात की खास अहमियत बताई। रिवायतों के अनुसार, पैगंबर ﷺ इस रात को इबादत और दुआ में बिताया करते थे। उन्होंने यह सिखाया कि अल्लाह की रहमत और मग़फिरत से कभी मायूस नहीं होना चाहिए। शब-ए-बारात उसी उम्मीद और भरोसे की प्रतीक रात है, जब इंसान अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह के करीब होने की कोशिश करता है। इस रात का सबसे बड़ा मकसद इंसान को आत्मनिरीक्षण और सुधार की ओर ले जाना है। लोग अपने गुनाहों का इक़रार करते हैं, तौबा और इस्तेग़फार करते हैं, और आने वाले साल में ज़िंदगी, मौत और रोज़ी से जुड़े फैसलों के लिए दुआ करते हैं।

शब-ए-बारात की एक खास पहचान है घरों और गलियों की रौशनी। लोग दीपक, मोमबत्ती और बल्ब जलाकर सजावट करते हैं। यह केवल दिखावे के लिए नहीं होता, बल्कि उम्मीद और यक़ीन का प्रतीक होता है। जैसे अंधेरे के बाद उजाला आता है, वैसे ही गुनाहों के बाद अल्लाह की रहमत और मग़फिरत की रौशनी मिलने का भरोसा जताया जाता है। यही कारण है कि इसे अक्सर दीवाली से जोड़कर देखा जाता है। शब-ए-बारात के अगले दिन रोज़ा रखने की परंपरा भी प्रचलित है। इसका उद्देश्य सिर्फ भूखा रहना नहीं, बल्कि सब्र, सादगी और इबादत के जरिए खुद को पाक करना होता है। माना जाता है कि इस रोज़े से इंसान अल्लाह के और करीब होता है और उसकी दुआएं जल्दी कबूल होती हैं।
शब-ए-बारात न पूरी तरह ग़मी की रात है और न ही केवल खुशी की। यह सोचने, संभलने और सुधरने की रात है। लोग अपने बुज़ुर्ग और मरहूम रिश्तेदारों के लिए दुआ करते हैं, कब्रिस्तान जाकर फातिहा पढ़ते हैं, लेकिन अल्लाह की रहमत और बख़्शिश की उम्मीद में दिलों में सुकून और इत्मीनान भी भरते हैं। शब-ए-बारात और दीवाली में कई समानताएँ हैं, जैसे घर की सफाई, रोशनी, मिठाइयों का बनना और बांटना, रातभर जागना। फर्क बस इतना है कि दीवाली खुशियों और उत्सव का त्योहार है, जबकि शब-ए-बारात इबादत, तौबा और अल्लाह की रहमत की रात है। फिर भी, दोनों का मकसद दिलों को रौशन करना और इंसानियत को मज़बूत करना है।

भारत में शब-ए-बारात का स्वरूप खास है। बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में इसे अलग-अलग अंदाज़ में मनाया जाता है। हलवा और मिठाइयाँ बनाई जाती हैं, घरों में दीपक और बल्ब लगाए जाते हैं। यह गंगा-जमुनी तहज़ीब का उदाहरण है, जहां विभिन्न धर्मों और परंपराओं के बीच एक साझा संस्कृति पनपती है। शब-ए-बारात सिर्फ धार्मिक महत्व नहीं रखती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का संदेश भी देती है। यह रात इंसानियत, भाईचारे और मोहब्बत का पैग़ाम देती है।
शब-ए-बारात की रौशनी, मिठाई और इबादत का यह संगम समाज में भाईचारे और स्नेह को मजबूत करता है। इसका संदेश साफ है इबादत, तौबा, भाईचारा और इंसानियत। यह रात हमें सिखाती है कि गुनाहों से तौबा करके हम अपनी आत्मा को पवित्र कर सकते हैं और एक बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। यही हज़रत मुहम्मद ﷺ की तालीम और भारत की सांस्कृतिक विरासत की असली पहचान है।