शब-ए-बारात: रहमत, मग़फिरत और आत्मशुद्धि की मुक़द्दस रात
Story by आवाज़ द वॉयस | Published by onikamaheshwari | Date 03-02-2026
Shab-e-Barat: The sacred night of mercy, forgiveness, and spiritual purification.
आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली
इस्लामी कैलेंडर के आठवें माह शाबान की पन्द्रहवीं रात को शब-ए-बारात के रूप में मनाया जाता है। यह रात इस्लाम धर्म की अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण रातों में शुमार की जाती है। ‘शब’ का अर्थ है रात और ‘बारात’ का अर्थ है बरी होना या मुक्ति प्राप्त करना। इस प्रकार शब-ए-बारात वह मुक़द्दस रात है जिसमें इंसान अपने छोटे-बड़े गुनाहों से तौबा कर अल्लाह तआला से बख़्शिश, रहमत और निजात की दुआ करता है। इस रात को रहमत की रात, बरकत की रात, निजात की रात और परवाना-ए-आम की रात भी कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इस रात अल्लाह तआला अपने बंदों पर विशेष कृपा बरसाते हैं और मग़फिरत के दरवाज़े खोल देते हैं।
शाबान का महीना इस्लाम में विशेष महत्व रखता है। अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि “शाबान मेरा महीना है।” इसी कारण यह माह आशिक़-ए-रसूल के लिए बेहद अहम माना जाता है। इसी महीने में क़िब्ला परिवर्तन की ऐतिहासिक घटना घटी थी। प्रारंभिक इस्लामी काल में मुसलमान बैतुल मुक़द्दस की ओर रुख़ करके नमाज़ अदा करते थे, लेकिन बाद में अल्लाह तआला के हुक्म से काबा शरीफ़ को क़िब्ला बनाया गया। क़ुरआन करीम में इस घटना का उल्लेख मिलता है, जो शाबान के महीने को और अधिक पवित्र बना देता है।
शब-ए-बारात की फ़ज़ीलत अनेक हदीसों में बयान की गई है। हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि शाबान की पन्द्रहवीं रात अल्लाह तआला रहमत के तीन सौ दरवाज़े खोल देते हैं और हर उस व्यक्ति को बख़्श देते हैं जो शिर्क में लिप्त न हो। हालांकि जादूगर, शराबी, सूदख़ोर और व्यभिचार करने वालों की मग़फिरत उस समय तक नहीं होती जब तक वे सच्चे दिल से अपने गुनाहों से तौबा न कर लें। हदीसों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इस रात जन्नत के दरवाज़े खुल जाते हैं और फ़रिश्ते अलग-अलग प्रकार की इबादत करने वालों के लिए खुशख़बरी का ऐलान करते हैं।
इस रात को तक़दीर की रात भी कहा जाता है। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूल-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि इस रात आने वाले वर्ष में पैदा होने वाले बच्चों, मृत्यु को प्राप्त होने वालों, बंदों के रिज़्क़ और उनके आमाल के फ़ैसले लिख दिए जाते हैं। यही कारण है कि लोग इस रात को पूरी विनम्रता और आस्था के साथ इबादत में बिताते हैं और अपने भविष्य के लिए अल्लाह से भलाई की दुआ करते हैं।
शब-ए-बारात की रात मुसलमान पूरी दुनिया में विशेष धार्मिक माहौल के साथ मनाते हैं। मस्जिदों में नमाज़, दुआ और क़ुरआन की तिलावत का सिलसिला चलता है। लोग नफ़्ल नमाज़, तहज्जुद और ज़िक्र-ए-इलाही में मशगूल रहते हैं। अपने सग़ीरा और कबीरा गुनाहों के लिए तौबा करना इस रात का सबसे महत्वपूर्ण अमल माना जाता है। सग़ीरा गुनाहों में झूठ बोलना, चुग़ली करना, बड़ों की अवहेलना करना और किसी के साथ बुरा व्यवहार करना शामिल है, जबकि कबीरा गुनाहों में शिर्क और वे तमाम अपराध शामिल हैं जिनके लिए क़ुरआन करीम में सज़ा का उल्लेख किया गया है।
इस रात कब्रिस्तानों में जाकर अपने मरहूम रिश्तेदारों और पूर्वजों के लिए दुआ करना भी एक प्रचलित परंपरा है। लोग फ़ातिहा पढ़ते हैं, अल्लाह से उनकी मग़फिरत की दुआ करते हैं और अपने दिलों में बसे ग़म और मोह को सुकून में बदलने की कोशिश करते हैं। कई स्थानों पर कब्रों पर फूल चढ़ाए जाते हैं और रोशनी की जाती है, जो जीवन और मृत्यु के बीच आध्यात्मिक संबंध का प्रतीक मानी जाती है।
शब-ए-बारात के अगले दिन रखा जाने वाला रोज़ा भी विशेष महत्व रखता है। इसे हज़ारी रोज़ा कहा जाता है, क्योंकि मान्यता है कि इसका सवाब एक हज़ार रोज़ों के बराबर होता है। इस दिन लोग अपना अधिकतर समय इबादत, तिलावत और नेक कार्यों में बिताने का प्रयास करते हैं। दान और खैरात को भी इस रात और अगले दिन अत्यधिक पुण्यकारी माना गया है। गरीबों, ज़रूरतमंदों और बेसहारा लोगों की मदद करना इस रात के संदेश का अहम हिस्सा है।
सुन्नी और शिया मुसलमान शब-ए-बारात को अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार मनाते हैं। जहां सुन्नी मुसलमान इसे क्षमा और निजात की रात के रूप में देखते हैं, वहीं शिया समुदाय इस रात को बारहवें इमाम हज़रत मुहम्मद अल-महदी के जन्मदिवस के रूप में भी मनाता है। हालांकि दोनों परंपराओं का मूल उद्देश्य अल्लाह की इबादत, आत्मशुद्धि और मानवता की भलाई ही है।
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शब-ए-बारात केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन और आत्मसुधार की रात भी है। यह रात इंसान को अपने बीते कर्मों पर विचार करने, अपनी गलतियों को स्वीकार करने और एक बेहतर इंसान बनने का संकल्प लेने की प्रेरणा देती है। रिश्तों में आई दूरी को मिटाने, दिलों से नफ़रत और कटुता को निकालने तथा एक-दूसरे से क्षमा मांगने का यह सर्वोत्तम अवसर माना जाता है।
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कुल मिलाकर शब-ए-बारात का संदेश स्पष्ट है कि अल्लाह की रहमत असीम है और यदि बंदा सच्चे दिल से तौबा कर ले, तो उसके लिए मग़फिरत और निजात के दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं। यह मुक़द्दस रात इंसान को क्षमा, करुणा, आत्मिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की राह दिखाती है और यही इसका वास्तविक उद्देश्य और महत्व है।