टी20 के छक्के लगाने के युग में बल्ले की निर्माण प्रक्रिया में भी हुआ बदलाव

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 18-05-2026
The six-hitting era of T20 has also seen a change in the
The six-hitting era of T20 has also seen a change in the

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
क्रिकेट में पावर-हिटिंग के बढ़ते चलन के कारण बल्लों का निर्माण करने वाली कंपनियों में भी एक खामोश क्रांति को जन्म दिया है, जो सुर्खियों से दूर है। यहां अब बल्ला बनाने के पारंपरिक शिल्प कौशल में वैज्ञानिक सटीकता को जोड़ा जा रहा है क्योंकि निर्माता वर्तमान समय के बल्लेबाजों की मांगों को पूरा करने के लिए होड़ में लगे हैं।
 
फ्रेंचाइजी क्रिकेट की दुनिया में जहां थोड़ा फायदा मिलने से भी किस्मत का फैसला हो सकता है, वहीं निर्माता अब प्रत्येक खिलाड़ी की ताकत, स्ट्रोकप्ले और मैच की स्थिति के अनुरूप बल्ले को नमी नियंत्रण, फाइबर विश्लेषण और व्यक्तिगत डिजाइन के जरिए बेहतर बना रहे हैं।
 
ऐसे युग में जहां फ्रेंचाइजी का मूल्यांकन सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है, जहां हर बाउंड्री मैच के परिणाम को बदल सकती है और टीम तैयार करने में किए गए भारी निवेश को उचित ठहराती है, वहां प्रदर्शन करने के दबाव ने अत्यधिक अनुकूलित बल्लों की अभूतपूर्व मांग पैदा कर दी है।
 
बल्लों के निर्माता अभी प्रदर्शन को बेहतर करने वाले बल्ले डिजाइन करने के लिए वैज्ञानिक डेटा, विश्लेषकों की प्रतिक्रिया और किसी विशेष खिलाड़ी के खेलने के तरीके पर काफी हद तक निर्भर हैं। उनका कहना है कि वह दिन दूर नहीं जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) इंजीनियरों को बल्ले बनाने में मदद करेगी।
 
पावरप्ले के माहिर बल्लेबाजों से लेकर डेथ ओवरों में मैच खत्म करने वाले बल्लेबाजों तक, कई शीर्ष बल्लेबाज अब आठ से दस बल्ले लेकर यात्रा करते हैं, जिनमें से प्रत्येक को एक विशेष उद्देश्य के लिए तैयार किया जाता है।
 
भारत की अग्रणी बल्ला निर्माता कंपनी सैंसपेरिल्स ग्रीनलैंड्स (एसजी) के सीईओ पारस आनंद ने पीटीआई से कहा, ‘‘क्रिकेटर खेल के विभिन्न चरणों में, स्थिति के अनुसार, अलग-अलग प्रकार के बल्ले इस्तेमाल करते हैं। औसतन वे आठ से दस बल्ले रखते हैं। वे अपने प्रत्येक बल्ले की अच्छी समझ रखते हैं और उन पर नंबर लिख देते हैं।’’