The exit of Ratan Tata's former associates signals a shift in the balance of power within the Tata Group.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
रतन टाटा के निधन के बाद टाटा समूह में शीर्ष स्तर पर प्रभाव और नियंत्रण को लेकर जारी खींचतान के बीच उनके करीबी रहे कई वरिष्ठ लोगों के समूह से अलग होने से देश के इस प्रमुख कारोबारी समूह के सत्ता संतुलन में बदलाव की स्थिति बनती नजर आ रही है।
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने बुधवार को कहा कि वह अपने मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बाद 20 फरवरी, 2027 को चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति नहीं चाहेंगे। उनका यह फैसला रतन टाटा के करीबी रहे विजय सिंह और मेहली मिस्त्री के टाटा समूह से धीरे-धीरे अलग होने के बाद आया है।
इस विवाद के केंद्र में टाटा ट्रस्ट्स हैं, जिनके पास समूह की मूल कंपनी टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। टाटा संस टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है जबकि नमक से लेकर सेमीकंडक्टर तक के कारोबार से जुड़े समूह पर टाटा ट्रस्ट्स का निर्णायक प्रभाव है।
टाटा ट्रस्ट्स में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट की 27.98 प्रतिशत है जबकि सर रतन टाटा ट्रस्ट की 23.56 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इस तरह इन दोनों ट्रस्ट की सम्मिलित हिस्सेदारी 51.54 प्रतिशत है जो कि निर्णायक हो जाती है।