न्यायालय ने जियोस्टार की याचिका खारिज की, सीसीआई को जांच की अनुमति दी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 27-01-2026
The court rejected Geostar's petition and allowed the CCI to conduct the investigation.
The court rejected Geostar's petition and allowed the CCI to conduct the investigation.

 

नई दिल्ली

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज के स्वामित्व वाले स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म जियोस्टार की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें कंपनी ने केरल के केबल टीवी बाजार में अपने दबदबे के गलत इस्तेमाल के आरोपों की भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की जांच रोकने का अनुरोध किया था।

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि मामला अभी शुरुआती चरण में है और बाजार नियामक को अपनी जांच जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है। न्यायालय ने कहा, “माफ कीजिए, विनियामक को जांच करने दें। यह अभी शुरुआती चरण में है। याचिका खारिज की जाती है।”

जियोस्टार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि कंपनी भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) अधिनियम, 1997 के तहत बंधी हुई है, जो यह निर्धारित करता है कि वह कितनी फीस ले सकती है या कितनी छूट दे सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि सवाल यह है कि क्या ‘सेक्टोरल’ नियामक के अधीन आने वाले मामले में सीसीआई जांच कर सकता है।

शिकायत करने वाली कंपनी एशियानेट डिजिटल नेटवर्क लिमिटेड (एडीएनपीएल) ने आरोप लगाया है कि जियोस्टार ने केरल कम्युनिकेटर्स केबल लिमिटेड (केसीसीएल) को विशेष और भेदभावपूर्ण छूट दी, जिससे टेलीविजन प्रसारण क्षेत्र में अपने दबदबे का गलत इस्तेमाल किया। इससे एडीएनपीएल के ग्राहक आधार में तेजी से गिरावट आई।

जियोस्टार ने केरल उच्च न्यायालय के 3 दिसंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें सीसीआई की जांच रोकने से इनकार किया गया था। न्यायालय ने उस आदेश की पुष्टि की थी। इसके बाद सीसीआई ने महानिदेशक को निर्देश दिया कि वह एडीएनपीएल की शिकायत के आधार पर जियोस्टार और उसकी सहायक कंपनियों के खिलाफ जांच शुरू करें।

शिकायत में बताया गया है कि ट्राई के नियमों के तहत प्रसारणकर्ता अधिकतम 35 प्रतिशत तक छूट दे सकते हैं और सभी ग्राहकों के लिए समान मूल्य प्रणाली अपनाना अनिवार्य है। एडीएनपीएल ने आरोप लगाया कि जियोस्टार ने केसीसीएल को 50 प्रतिशत से अधिक छूट देकर अन्य प्रतिस्पर्धियों के साथ असमान व्यवहार किया, जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 का उल्लंघन है।

इस मामले में न्यायालय के फैसले के बाद अब सीसीआई को स्वतंत्र और नियमित जांच जारी रखने का मार्ग साफ हो गया है, जिससे भारत में डिजिटल टेलीविजन बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने की प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी।