आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं तभी मजबूत और प्रासंगिक बनी रह सकती हैं जब वे पारदर्शी, समावेशी, उत्तरदायी और जनता के प्रति जवाबदेह हों।
वह राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन (सीएसपीओसी) के शुक्रवार को संपन्न होने के अवसर पर बोल रहे थे।
सीएसपीओसी के 28वें सम्मेलन के विशेष पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए, बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों का सर्वोपरि कर्तव्य संवैधानिक मूल्यों में दृढ़ रहते हुए लोकतांत्रिक संस्थानों को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर रूप से ढालना है।
उन्होंने कहा कि संसदों का वास्तविक महत्व नागरिकों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरा करने की उनकी क्षमता में निहित है। उन्होंने यह सुनिश्चित करते पर जोर दिया कि बहस सार्वजनिक चिंताओं के सार्थक समाधान की ओर ले जाएं।
बिरला ने कहा कि आम सहमति और असहमति दोनों ही लोकतंत्र की ताकत हैं, लेकिन इन्हें संसदीय मर्यादा के दायरे में ही व्यक्त किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस संदर्भ में, सदन की गरिमा की रक्षा करने, निष्पक्षता सुनिश्चित करने और संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करने में पीठासीन अधिकारी की भूमिका को निर्णायक बताया गया है।