पतंगों के शहर जयपुर में मकर संक्रांति

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 14-01-2026
Makar Sankranti in Jaipur, the city of kites.
Makar Sankranti in Jaipur, the city of kites.

 

फरहान इसराइली/ जयपुर

जयपुर,केवल किलों, महलों और हवेलियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने रंग-बिरंगे पतंगों के लिए भी प्रसिद्ध है। मकर संक्रांति के दिन, जब सूरज उत्तरायण की ओर बढ़ता है, तब गुलाबी नगरी के आकाश में सैकड़ों, हज़ारों पतंगें उड़ती हैं और शहर की रूह को एक अनोखा उत्साह और उल्लास से भर देती हैं। यह केवल खेल नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। रियासत काल से चली आ रही यह पतंगबाजी की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है और हर साल मकर संक्रांति के दिन इसे देखने और अनुभव करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

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मकर संक्रांति की सुबह पुराने शहर के जौहरी बाजार, चांदपोल, त्रिपोलिया, हवा महल और परकोटों की छतों से “वो काटा” की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। इतिहासकारों के अनुसार जयपुर में पतंगबाजी की शुरुआत 19वीं सदी में हुई।

महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय ने लखनऊ में पतंगबाजी देखी और वहां से पतंगसाजों को जयपुर बुलवाया। उसी समय जयपुर में ‘तुक्कल’ नामक पतंग उड़ाने की परंपरा शुरू हुई। महाराजा स्वयं सिटी पैलेस की छत से पतंग उड़ाया करते थे।

उस समय पतंग पकड़ने के लिए घुड़सवार तैनात होते थे, और जो व्यक्ति पतंग पकड़कर लाता, उसे इनाम दिया जाता था। धीरे-धीरे यह शौक आम लोगों तक पहुँच गया और जयपुर की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया। आज भी यह परंपरा शहर की छतों, गलियों और बाजारों में जीवित है।

जयपुर की पतंगबाजी केवल खेल और मनोरंजन तक सीमित नहीं है; यह गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक-सांस्कृतिक भाईचारे की मिसाल भी है। मकर संक्रांति भले ही हिंदू धर्म का पर्व हो, लेकिन पतंग और मांझे का पूरा कारोबार बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगरों से जुड़ा हुआ है।

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हांडीपुरा, रामगंज और आसपास के इलाके तीन पीढ़ियों से पतंग और डोर बनाने के लिए मशहूर हैं। यहाँ यह काम केवल रोज़गार नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत का हिस्सा है। हांडीपुरा मार्केट जयपुर का सबसे बड़ा पतंग बाजार माना जाता है, जहाँ एक ही कतार में 100से ज्यादा दुकानें लगी होती हैं। मकर संक्रांति के समय यह बाजार लाखों-करोड़ों के कारोबार का केंद्र बन जाता है। देशभर के थोक व्यापारी यहाँ पतंग और मांझा खरीदने आते हैं।

समय के साथ जयपुर की पतंगबाजी में बदलाव भी आया है। अब पारंपरिक कागज़ की पतंगों के साथ-साथ नई डिज़ाइन, थीम और विशेष चित्रों वाली पतंगें बाजार में दिखाई देती हैं। इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, क्रिकेटर रोहित शर्मा और विराट कोहली की तस्वीरों वाली पतंगों की खास मांग रही।

इसके अलावा ‘ऑपरेशन सिंदूर’ थीम और सफेद रंग की पतंगें भी लोगों की पसंद बनी हुई हैं। सफेद पतंग को शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन मौसम ने भी इस साल पतंगबाज़ी को प्रभावित किया है। बरसात अधिक होने के कारण पतंगों का उत्पादन कम हुआ, जिससे कीमतें पिछले साल की तुलना में करीब 30प्रतिशत तक बढ़ गईं। जो पतंग पहले 10रुपये में मिलती थी, वह इस बार 12 रुपये या उससे अधिक में बिक रही है। इसके बावजूद खरीदारों की संख्या कम नहीं हुई।

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तकनीकी नवाचार ने जयपुर की पतंगबाजी को नया रूप दिया है। इस बार सबसे चर्चा में इलेक्ट्रिक चरखी रही, जो चार्जेबल होती है और बटन दबाते ही कुछ सेकंड में पूरी डोर समेट लेती है। हैदराबाद, गुजरात और दिल्ली से बनी ये चरखियां 1000 से 2500 रुपये में उपलब्ध हैं।

2500रुपये वाली चरखी सबसे शक्तिशाली मानी जा रही है, जिसकी बैटरी करीब 100मिनट तक चलती है। इसके अलावा पीतल से बनी लगभग एक किलो वजनी ‘सोने की चरखी’ भी विशेष आकर्षण बनी। मुरादाबाद में डिजाइन होकर जयपुर पहुंची यह चरखी अपनी मजबूती और अनोखे डिज़ाइन के कारण पसंद की जा रही है। वहीं, 2इन 1चरखी का नया कॉन्सेप्ट भी बाजार में आया है, जिसमें एक ही फ्रेम में दो चरखियां दी गई हैं,एक में मांझा और दूसरी में सादा डोर भरी जा सकती है।

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इस बार जयपुर के आसमान में सिर्फ रंग-बिरंगी पतंगें ही नहीं, बल्कि राजनीति और वैश्विक नेतृत्व की झलक भी देखने को मिली। हांडीपुरा निवासी अनुभवी कारीगर अब्दुल गफ्फार अंसारी द्वारा बनाई गई आदमकद पतंगों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अमित शाह, व्लादिमीर पुतिन, डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के चेहरे उकेरे गए हैं। चार से पांच फीट लंबी ये पतंगें खास गल्फ पेपर और कपड़े से बनाई गई हैं और एक पतंग बनाने में करीब 500 रुपये का खर्च आता है।

जयपुर की पतंगबाजी आज भी यह साबित करती है कि जब परंपरा, मेहनत और भाईचारा एक साथ उड़ान भरते हैं, तो आसमान भी छोटा पड़ जाता है। हिंदू-मुस्लिम परिवारों की यह साझा मेहनत, धार्मिक त्योहार की खुशी और सांस्कृतिक सौहार्द शहर की असली तस्वीर पेश करती है। आज भी, सैकड़ों साल पुरानी यह परंपरा आधुनिक तकनीक और नवाचार के साथ जीवित है और यह शहर की पहचान का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।

पतंगबाजी केवल खेल नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, व्यवसाय और भाईचारे का संगम है। जयपुर की छतों से उड़ती हर पतंग इस बात की गवाही देती है कि यहाँ का आकाश, चाहे त्योहार हो या कोई सामान्य दिन, हमेशा रंगीन, जीवंत और उम्मीदों से भरा रहता है। मकर संक्रांति के दिन जयपुर के लोग न केवल त्योहार का आनंद लेते हैं, बल्कि यह परंपरा उन्हें आपस में जोड़ती, मेहनत और साझेदारी का महत्व सिखाती, और शहर की सांस्कृतिक विरासत को भी संजोकर रखती है।

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सदीयों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पहले थी। आधुनिकता और तकनीक ने इस पारंपरिक खेल को और आकर्षक बनाया है, लेकिन असली मज़ा और आत्मा वही है,गंगा-जमुनी तहजीब और भाईचारा, जो जयपुर की छतों से आसमान तक उड़ता है। यह त्योहार और यह परंपरा शहर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक हैं, जो यह दिखाती हैं कि रंग-बिरंगे आसमान में हर पतंग के साथ परंपरा, मेहनत और भाईचारा भी उड़ता है।

जयपुर की पतंगबाजी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि शहर के लोगों की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ऊर्जा का प्रतीक है। यह न केवल बच्चों और युवाओं के लिए उत्साह का स्रोत है, बल्कि परिवारों और कारीगरों के लिए आजीविका, पहचान और गर्व का माध्यम भी है। इस प्रकार, मकर संक्रांति के दिन जयपुर का आकाश केवल पतंगों से नहीं, बल्कि रंगों, परंपरा, भाईचारे और मेहनत से भी भरा होता है।