SC closes plea after UP withdraws notice against student over proposed Cockroach Janta Party protest
नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी के एक छात्र के खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी। उत्तर प्रदेश प्रशासन ने ग्रेटर नोएडा में प्रस्तावित 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध प्रदर्शन के लिए छात्रों को इकट्ठा करने में कथित भूमिका के कारण उसे जारी किया गया प्रिवेंटिव नोटिस (एहतियाती नोटिस) वापस ले लिया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की बेंच (जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे) ने कहा कि लॉ के छात्र अक्षत त्रिपाठी के खिलाफ अधिकारियों द्वारा जारी 5 लाख रुपये के बॉन्ड नोटिस के आधार पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट, त्रिपाठी द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 के तहत जारी नोटिस को चुनौती दी गई थी। नोटिस में त्रिपाठी से 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो ज़मानत (sureties) देने को कहा गया था। यह नोटिस उन आरोपों के संबंध में जारी किया गया था कि उसने साथी छात्रों को प्रस्तावित CJP धरने में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया था।
सुनवाई के दौरान, अधिकारियों की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बेंच को बताया कि नोटिस पहले ही वापस ले लिया गया है। बेंच ने भाटी का यह बयान दर्ज किया कि नोटिस वापस ले लिया गया है और निर्देश दिया कि इसके तहत अतीत में की गई कोई भी कार्रवाई रद्द मानी जाएगी। बेंच ने आदेश दिया, "सुश्री भाटी पेश हुई हैं। उन्होंने बताया कि नोटिस पहले ही वापस ले लिया गया है। ऐसे में, यह निर्देश दिया जाता है कि नोटिस के तहत अतीत में की गई कोई भी कार्रवाई रद्द मानी जाएगी और नतीजतन, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।" याचिका में त्रिपाठी के खिलाफ प्रस्तावित छात्र आंदोलन के संबंध में शुरू की गई प्रिवेंटिव कार्यवाही को चुनौती दी गई थी।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा छात्र को नोटिस जारी करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी, जबकि अदालत ने पहले ही आंदोलन के संबंध में छात्रों के खिलाफ कठोर कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था। CJI ने सवाल किया था कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही छात्र विरोध प्रदर्शनों से संबंधित FIR रद्द कर चुका था और छात्रों के खिलाफ कठोर कार्रवाई पर रोक लगा चुका था, तो मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस कैसे जारी कर सकते थे।