Religious leaders delivered a message of gender equality at the Lucknow conference.
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित 11वें अंतर्राष्ट्रीय अंतरधार्मिक सम्मेलन में देश-विदेश के धर्मगुरुओं, न्यायविदों और शांति दूतों ने मानवता, लैंगिक समानता और वैश्विक भाईचारे का साझा संदेश दिया। सिटी मॉन्टेसरी स्कूल (सीएमएस) के कानपुर रोड परिसर (डब्ल्यूयूसीसी) में 24 से 26 जुलाई 2026 तक आयोजित इस सम्मेलन का विषय था—"आओ, मिलकर गढ़ें एक नई दुनिया, मानवता के हृदय में हो लैंगिक समानता।"
सम्मेलन का आयोजन सीएमएस की मूल भावना "विश्व एकता के लिए धर्म—धार्मिक सह-अस्तित्व से आगे, एक समावेशी एवं रूपांतरित समाज की ओर" के अंतर्गत किया गया। इसमें इस्लाम, हिंदू, सिख, बौद्ध, यहूदी, ईसाई और ब्रह्माकुमारी परंपराओं के प्रतिनिधियों के साथ मिस्र, अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड से आए अंतरराष्ट्रीय धर्मगुरुओं और विद्वानों ने भी भाग लिया।
'नारी का सम्मान, मानवता का सम्मान'
सम्मेलन में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि किसी भी समाज की प्रगति और शांति का आधार महिलाओं का सम्मान और समान अधिकार हैं। उनका कहना था कि सभी धर्मों की मूल शिक्षाएं न्याय, करुणा, समानता और मानवीय गरिमा की रक्षा का संदेश देती हैं।
सूफी परंपरा का संदेश
दरगाह अजमेर शरीफ के गद्दीनशीन और चिश्ती फाउंडेशन के अध्यक्ष हाजी सैयद सलमान चिश्ती ने कहा कि चिश्ती सूफी परंपरा में महिला को एक पवित्र धरोहर और ज्ञान की संरक्षिका माना गया है।
उन्होंने कहा, "हजरत राबिया बसरी जैसी महान महिला संतों का स्थान सूफी परंपरा में अत्यंत सम्मानित रहा है। इसलिए लैंगिक समानता कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक विरासत का हिस्सा है। किसी महिला का अपमान ईश्वर की रचना का अपमान है। युवाओं के लिए हमारा संदेश है—सबसे प्रेम करो, किसी से द्वेष मत रखो।"
'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना पर जोर
महर्षि भृगु पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर श्री गुरुजी गोस्वामी सुशील गिरि जी महाराज ने कहा कि सनातन परंपरा में नारी को शक्ति स्वरूप माना गया है।
उन्होंने कहा कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहीं ईश्वर का वास होता है। उनके अनुसार, दुनिया को विभाजन नहीं बल्कि 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना के साथ एक परिवार के रूप में आगे बढ़ना चाहिए।
'चेतना का कोई लिंग नहीं'
मोहनजी फाउंडेशन, स्विट्ज़रलैंड के संस्थापक ब्रह्मर्षि डॉ. मोहनजी ने कहा कि चेतना न किसी धर्म की होती है और न ही किसी लिंग की।
उन्होंने कहा कि समानता कोई ऐसी चीज नहीं जिसे किसी को दिया जाए, बल्कि यह वह सत्य है जिसे पहचानने की आवश्यकता है। मानवता का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग एक-दूसरे के प्रति कितनी संवेदनशीलता और सम्मान रखते हैं।
न्याय और आस्था का साझा संदेश
मिस्र के सर्वोच्च संवैधानिक न्यायालय के प्रथम उप-मुख्य न्यायाधीश डॉ. आदिल उमर शरीफ ने कहा कि न्याय और आस्था एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने कहा कि जिस समाज में आधी आबादी को समान सम्मान और अवसर नहीं मिलते, उसे न्यायपूर्ण समाज नहीं कहा जा सकता।
वहीं, अमेरिका के डॉ. डेविड ई. रिज़ले ने कहा कि सभी धार्मिक परंपराओं का मूल संदेश मानवता को जोड़ना है और अंतरधार्मिक संवाद इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
देश-विदेश के धर्मगुरुओं की रही भागीदारी
सम्मेलन में मौलाना कल्बे जवाद, मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली, राजयोगिनी बी.के. राधा बहन, डॉ. रब्बी एज़ेकिएल इसाक मालेकर, रेव. आचार्य येशी फुंत्सोक, परमजीत सिंह चंधोक, सरदार हरपाल सिंह जग्गी, स्वामी वीर सिंह हितकारी, आचार्य विवेक मुनि, मौलाना डॉ. कल्बे सिब्तैन (नूरी), मौलाना एजाज़ुर रहमान शाहीन कासमी और कमलेश भाई शास्त्री सहित अनेक धर्मगुरु और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
साझा संकल्प के साथ सम्मेलन का समापन
सम्मेलन का समापन सामूहिक अंतरधार्मिक प्रार्थना और साझा संकल्प के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने लैंगिक समानता, परस्पर सम्मान, शांति और वैश्विक भाईचारे के संदेश को समाज के हर वर्ग, विद्यालय और समुदाय तक पहुंचाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर सीएमएस संस्थान समूह की प्रमुख डॉ. गीता गांधी किंगडन के नेतृत्व में ऐसी नई पीढ़ी तैयार करने का संकल्प दोहराया गया, जो शांति, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों की सशक्त राजदूत बनकर समाज और विश्व में सकारात्मक बदलाव की दिशा में कार्य करेगी।