जब एपीजे अब्दुल कलाम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से बोले, मेरी हैसियत नहीं आपके साथ बैठने की !

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 21-07-2026
When President Kalam said to Ustad Bismillah Khan, Who am I to sit with you?
When President Kalam said to Ustad Bismillah Khan, Who am I to sit with you?

 

मलिक असगर हाशमी

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक भावुक प्रसंग तेजी से साझा किया जा रहा है। यह प्रसंग भारत के दो महान व्यक्तित्वों से जुड़ा है। एक ओर देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम हैं। दूसरी ओर भारत रत्न और विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान। यह घटना केवल दो महान लोगों की मुलाकात नहीं है। यह विनम्रता, सम्मान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की ऐसी मिसाल है, जिसे लोग आज भी याद करते हैं।

कहा जाता है कि राष्ट्रपति रहते हुए डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम एक दौरे पर वाराणसी पहुंचे थे। इसी दौरान उन्हें जानकारी मिली कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अस्वस्थ हैं। व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद उन्होंने औपचारिकता निभाने के बजाय खुद उनके घर जाने का फैसला किया। यह निर्णय उनके व्यक्तित्व की सादगी और संवेदनशीलता को दर्शाता है।

बताया जाता है कि जब डॉ. कलाम उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के घर पहुंचे तो वहां किसी तरह की विशेष तैयारी नहीं थी। परिवार को राष्ट्रपति के आने की कोई पूर्व सूचना नहीं मिली थी। उस्ताद अपने घर के आंगन में एक साधारण लकड़ी की पलंग पर बैठे थे। उस पलंग पर न गद्दा था और न ही कोई विशेष व्यवस्था। अचानक सामने राष्ट्रपति को देखकर वे कुछ क्षण के लिए हैरान रह गए।

औपचारिक अभिवादन के बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने पूरे अपनत्व के साथ डॉ. कलाम से कहा कि वे उनके पास उसी पलंग पर बैठ जाएं। इसके जवाब में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने जो शब्द कहे, वही इस घटना को खास बना देते हैं। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "इतनी मेरी हैसियत कहां कि मैं आपके साथ इस पलंग पर बैठ सकूं।"

यह वाक्य केवल विनम्रता नहीं था। यह एक कलाकार के प्रति सम्मान का सर्वोच्च उदाहरण था। उस समय डॉ. कलाम देश के राष्ट्रपति थे। वे भारतीय गणराज्य के प्रथम नागरिक थे। इसके बावजूद उन्होंने एक महान कलाकार के सामने स्वयं को छोटा बताया। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान थी।

हालांकि इस घटना का कोई आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन वर्षों से यह प्रसंग लोगों के बीच प्रेरक कथा के रूप में सुनाया और साझा किया जाता रहा है। सोशल मीडिया पर इसके फिर से वायरल होने के बाद लोग डॉ. कलाम और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की सादगी को याद कर रहे हैं।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान भारतीय शास्त्रीय संगीत की ऐसी महान विभूति थे जिन्होंने शहनाई को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनका जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव संगीत की ओर था। बाद में वाराणसी उनकी कर्मभूमि बनी। उन्होंने शहनाई को केवल विवाह समारोहों तक सीमित रहने वाला वाद्य यंत्र नहीं रहने दिया बल्कि उसे शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया।

भारत की आजादी के ऐतिहासिक दिन 15 अगस्त 1947 को लाल किले से उनकी शहनाई की गूंज पूरे देश ने सुनी। यह क्षण भारतीय इतिहास का स्थायी हिस्सा बन चुका है। संगीत के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और वर्ष 2001 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का अपने देश और अपनी संस्कृति से गहरा लगाव था। एक समय अमेरिका से उन्हें स्थायी रूप से बसने का प्रस्ताव मिला। वहां बेहतर सुविधाओं और सम्मान का भरोसा भी दिया गया। लेकिन उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। उनका कहना था कि वे गंगा, काशी और बाबा विश्वनाथ से दूर नहीं रह सकते। उनके लिए अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति किसी भी सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण थी। यही कारण है कि वे आज भी भारतीय सांस्कृतिक विरासत के सबसे बड़े प्रतीकों में गिने जाते हैं।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन भी उतना ही प्रेरणादायक रहा। तमिलनाडु के रामेश्वरम के एक साधारण परिवार में जन्मे कलाम ने कठिन परिस्थितियों के बीच शिक्षा प्राप्त की। वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में दशकों तक काम किया। भारत के मिसाइल कार्यक्रम को नई दिशा देने में उनकी अहम भूमिका रही। इसी कारण उन्हें मिसाइल मैन कहा गया।

साल 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों और राष्ट्र निर्माण में योगदान के लिए उन्हें 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वर्ष 2002 में वे भारत के राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उन्होंने अपनी सादगी, विनम्रता और विद्यार्थियों के प्रति समर्पण से करोड़ों लोगों का दिल जीता। उन्हें आज भी जनता का राष्ट्रपति कहा जाता है।

डॉ. कलाम और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की यह मुलाकात भारतीय समाज के उस मूल्य की याद दिलाती है जिसमें पद और शक्ति से अधिक महत्व ज्ञान, कला और मानवीय सम्मान को दिया जाता है। दोनों अलग क्षेत्रों के शिखर पुरुष थे। एक ने विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम ऊंचा किया। दूसरे ने संगीत के माध्यम से भारतीय संस्कृति को पूरी दुनिया में पहचान दिलाई। लेकिन दोनों की सबसे बड़ी समानता उनकी सादगी थी।

आज जब सार्वजनिक जीवन में प्रोटोकॉल, सुरक्षा और औपचारिकताओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है, तब यह प्रसंग लोगों को इसलिए भी आकर्षित करता है क्योंकि इसमें दिखावा नहीं है। इसमें केवल सम्मान, अपनापन और इंसानियत दिखाई देती है। यही वजह है कि यह कहानी हर पीढ़ी को प्रेरित करती है।
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सोशल मीडिया पर इस घटना के वायरल होने के बाद हजारों लोग इसे भारतीय संस्कारों का उदाहरण बता रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि यह प्रसंग बताता है कि सच्चा नेतृत्व पद से नहीं बल्कि व्यवहार से पहचाना जाता है। महान व्यक्ति वही होता है जो अपनी उपलब्धियों के बावजूद विनम्र बना रहे।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान दोनों आज हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन उनके जीवन के ऐसे प्रसंग आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं। यह कहानी बताती है कि सम्मान पाने से बड़ा गुण सम्मान देना होता है। जब देश का राष्ट्रपति एक कलाकार के सामने स्वयं को छोटा मान ले, तब वह केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की संस्कृति और सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है।

भारतीय इतिहास में ऐसे प्रसंग केवल स्मृतियां नहीं होते। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए मूल्य और आदर्श बन जाते हैं। शायद यही कारण है कि वर्षों बाद भी डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की यह मुलाकात लोगों के दिलों में उसी गर्मजोशी के साथ जीवित है।