रहमानी-30: पिता के लगाए पोधे को बेटे के पेड़ बनाने की दास्तान

Story by  सेराज अनवर | Published by  onikamaheshwari • 2 Months ago
Rahmani-30: The story of the son making a garden from his father's plantation
Rahmani-30: The story of the son making a garden from his father's plantation

 

सेराज अनवर/ पटना 

इमारत ए शरिया के दिवंगत अमीर ए शरीयत मौलाना वली रहमानी बहुत दूर की सोचते थे. दीनी तालीम और आधुनिक शिक्षा का तारतम्य उन्होंने जिस तरह बैठा रखा था उसकी मिसाल देश में कम मिलती है.इसी सोच के तहत उन्होंने 1996 में रहमानी मिशन की स्‍थापना की.फिर 2008 में रहमानी-30 की शुरुआत की.

मरहूम का स्पष्ट दृष्टिकोण था‘ इस समय में धर्म की सबसे बड़ी सेवा हमारे युवाओं और आने वाली पीढ़ियों को उनके विश्वास को मजबूती से स्थापित करते हुए और उनके आत्मविश्वास को ऊंचा रखते हुए समसामयिक विषयों से शिक्षित करना है; ताकि, वे धर्म में उत्कृष्टता प्राप्त करें, शिक्षा से सुशोभित हों, कड़ी मेहनत करें और अपने जीवन में आगे बढ़ने और आत्मविश्वासपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम हों’ बिहार में इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आनंद कुमार की सुपर-30 की तरह ही रहमानी-30 के छात्रों ने आईआईटी में झंडे गाड़ दिए हैं और इसके हीरो हैं फ़हद रहमानी.
 
 
आनंद और फ़हद में फर्क़ यह है कि जहां आनंद लाइमलाइट में रहते हैं वहीं फ़हद रहमानी ख़ामोशी से मुस्लिम समाज में शिक्षा के अग्रदूत बने हुए हैं.आज से डेढ़ दशक पूर्व मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने मुस्लिम बच्चों को इंजीनियर बनाने का जो सपना देखा था वह साकार होता दिख रहा है.सीईओ फहद रहमानी की निगरानी में रहमानी 30 के लड़के निरंतर सफलता प्राप्त कर रहे हैं.
 
कैसे शुरू हुआ रहमानी-30?
 
मुंगेर स्थित खानकाह रहमानी के गद्दीनशीं हजरत मौलाना मोहम्मद वली रहमानी ने 1996 में रहमानी मिशन की स्‍थापना की थी. इसी रहमानी मिशन के तहत साल 2008 में मुस्लिम समाज के पिछड़े और आगे पढ़ने में असमर्थ बच्चों को आगे बढ़ाने के प्रयास शुरू हुए.उसी साल बिहार की राजधानी पटना में 10वीं और 12वीं के छात्रों की इंजीनियरिंग कोचिंग के लिए रहमानी-30 नाम से कोचिंग संस्‍थान शुरू किया गया.
 
अगले साल 2009 में चार्टेड अकाउंटेंट की तैयारी के लिए कोचिंग संस्‍थान शुरू हुआ.संस्‍थान में मुस्लिम समाज के ज्यादातर उन्हीं बच्चों को प्रवेश दिया जाता था जो पढ़ने लिखने में तो होनहार थे लेकिन आर्थिक तंगी के कारण अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख पाते थे.एंट्रेस टेस्ट के जरिए उन्हें कोचिंग के लिए चुना जाता था. रहमानी-30 ने अब तक मुस्लिम समाज के हजारों वंचित बच्चों को तालीम देकर समाज की मुख्यधारा में ला खड़ा किया है.
 
 
खास बात ये है कि रहमानी-30 को साथ मिला है बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद का.आनंद की सुपर-30 की सफलता में भी अभयानंद का बड़ा योगदान रहा है.रहमानी-30 की ओर से एंट्रेंस टेस्ट पास करने वाले छात्रों के खाने पीने से लेकर रहने तक की सारी व्यवस्‍था की जाती है. शुरूआती सालों में संस्‍थान के छात्रों का सफलता प्रतिशत इक्का दुक्का रहा लेकिन जल्द ही यह रफ्तार पकड़ने लगा.
 
आनंद के सुपर-30 में बच्चों को साइंस पढ़ाने वाले अभयानंद का साथ मिलने के बाद तो जैसे संस्‍थान की सफलता को पंख लग गया. अभयानंद रहमानी-30 के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में काफी मददगार रहे हैं. अपने भौतिकी शिक्षण कौशल के लिए जाने जाने वाले अभयानंद को बिहार के गरीब छात्रों को आईआईटी-जेईई क्रैक करने के लिए श्रेय दिया जाता है.मुंगेर के बाद मुंबई और हैदराबाद में भी रहमानी-30 की शाखाएं खोली गई.
 
 
आज यह एक मजबूत शिक्षण संस्थान है जिसने राज्य के समर्थन के बिना अपने समुदाय में शिक्षा की लौ जलाई है.वे किसी भी प्रकार की रियायत के बिना सभी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अन्य छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं.हालांकि, रहमानी 30 की शुरुआत वंचित छात्रों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सफल होने में मदद करने के लिए की गई थी, लेकिन इसने मेडिकल, वाणिज्य और कानून जैसी अन्य शीर्ष परीक्षाओं में भी कदम रखा है.
 
लगभग 500 बच्चों को बनाया आईआईटीएन 
 
भारत की सबसे मुश्किल इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा आईआईटी के लिए मानी जाती है जिसका दुनिया भर में नाम है. आईआईटी में दाखिले के लिए अल्पसंख्यक मुस्लिम बच्चों को मुफ्त आवासीय तैयारी कराने में जुटे रहमानी 30 की कामयाबी की शुरुआत 2009 में 10 बच्चों के आईआईटी में दाखिले से हुई थी. पंद्रह साल के सफर में रहमानी 30 से आईआईटी में दाखिले की योग्यता पाने वाले उम्मीदवारों की संख्या करीब पांच सौ हो गयी है.
 
पटना के अनीसाबाद से शुरू रहमानी-30 वैसे आज पटना के साथ-साथ मुंबई, हैदारबाद और बंगलोर में भी इंजीनियरिंग के अलावा मेडिकल, सीए और वकालत की पढ़ाई की तैयारी भी करा रही है. रहमानी-30 का लक्ष्य था हर साल कम से कम 30 बच्चों को इस तरह तैयार कर देना की आईआईटी में दाखिले का इम्तिहान पास कर लें.इन 30 बच्चों के लिए रहने-खाने और पढ़ने का सारा इंतजाम मुफ्त में होता है.
 
 
इसके लिए हर साल प्रवेश परीक्षा होती है जिसकी खबर अखबार और अन्य माध्यमों से दी जाती है.इस प्रवेश परीक्षा में सफलता के आधार पर 30 से अधिक बच्चों का दाखिला तो होता है लेकिन निशुल्क व्यवस्था उनके लिए होती है जो इंटरनल टेस्ट में पहले 30 स्थानों पर होते हैं.बाकी के लिए पढ़ाई का खर्च नहीं लगता हालांकि उन्हें रहने-खाने का शुल्क देना होता है.
 
2009 के बाद दो सालों में इसकी सफलता घटकर 6-6 हो गयी लेकिन 2012 और 2013 में रहमानी 30 से आईआईटी में दाखिले की योग्यता पाने वाले उम्मीदवारों की संख्या 10-10 रही.2014 में यह कामयाबी बढ़कर 14 हो गयी और 2015 में 32 उम्मीदवार कामयाब हुए. अगले साल यानी 2016 में रहमानी 30 ने आईआईटी में कामयाबी की हाफ सेंचुरी बनायी और अगले साल यानी 2017 में यह आंकड़ा बढ़कर 75 तक पहुंच गया जो अब तक किसी एक साल के लिए सबसे बड़ी कामयाबी थी.
 
2018 और 2019 में कामयाबी 50 से नीचे क्रमशः 46 और 43 थी. 2020 में एक बार फिर यह आंकड़ा 50 पार कर 52 तक पहुंचा.रहमानी-30 से तैयारी करने वाले बच्चों का कहना है कि यहां का अनुशासित माहौल पढ़ने में लक्ष्य से भटकने नहीं देता.यहां के शिक्षकों का हमेशा साथ मिलता है जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है.इसके अलावा ग्रुप स्टडी यहां की खास बात है जिससे डाउट क्लीयरिंग में बहुत आसानी होती है.यहां के उम्मीदवारों ने बताया कि यहां का दीनी माहौल भी पढ़ने में मदद करता है.
 
अब फ़हद रहमानी की निगरानी में चल रही संस्थान मौलाना मोहम्मद वली रहमानी के इंतकाल के बाद रहमानी-30 अब पूरी तरह से उनके छोटे बेटे फहद रहमानी की देखरेख में संचालित हो रहा है.फ़हद इस संस्थान के सीईओ हैं.वे कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय को अपने बच्चों की तालीम के लिए निवेश करना चाहिए. रहमानी-30 ऐसे ही दाताओं के सहारे चलता है. यहां एक बच्चे पर करीब दो लाख रुपये खर्च होते हैं.
 
उनकी योजना है कि रहमानी-30 में देश भर के कम से कम 15 हजार बच्चों की तैयारी करायी जाए.फिलहाल यह संख्या करीब 1000 है.उनका कहना है कि इसके लिए मुस्लिम समुदाय और अन्य दानदाता आगे आकर सहयोग करें तो समुदाय और देश दोनों का भला होगा.मौलाना फहद रहमानी ने कहा कि यह उनके पिता मौलाना मोहम्मद वली रहमानी की इच्छा थी कि लड़कियां भी इंजीनियरिंग में उत्कृष्ट प्रदर्शन करें.अल्हम्दुलिल्लाह, यह शुरू हो गया है और आने वाले वर्षों में यह और बेहतर होगा.
 
हमारे संरक्षक मौलाना मोहम्मद वली रहमानी साहब ने हमें यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि लड़कियों के लिए मंसूबा पर पहले अमल किए जाने चाहिए और लड़कों के लिए बाद में होने चाहिए. यही कारण है कि मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए "नीट" में प्रवेश का कार्यक्रम पहले लड़कियों के लिए और फिर लड़कों के लिए शुरू किया गया.
 
इसी तरह, कॉमर्स में, सीए और एससी योजना शुरू में लड़कियों के लिए थे और फिर लड़कों के लिए कार्यक्रम शुरू किया गया था.वह कहते हैं कि हम जिस तरह का काम कर रहे हैं उसके लिए हमारे पास उपयुक्त बुनियादी ढांचा नहीं है.हम किराए के फ्लैटों से काम करते हैं. यानी शिक्षा में परिणामों के लिए रणनीतिक डिजाइन द्वारा प्रदान किए गए किसी भी लाभ का उपयोग करने के मामले में हम वंचित हैं, इसलिए, हम एक फ्लैट में कॉमन हॉल को कक्षा के रूप में उपयोग करते हैं. 
 
 
क्या कहते हैं फ़ैसल रहमानी?
 
इमारत-ए-शरिया के अमीर-ए-शरीयत मौलाना वली अहमद फैसल रहमानी कहते हैं कि इमारत-ए-शरिया सिर्फ धर्म का ज्ञान ही नहीं बांटता बल्कि मजहब के साथ आधुनिक शिक्षा के क्षेत्र में भी कदम आगे बढ़ा रहा है.क्योंकि शिक्षा के बिना एक स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं हो सकता है। कामयाबी एक आदत है, जिसको लगानी पड़ती है। इसके लिए हम सभी को आगे आना होना होगा.फ़ैसल रहमानी,फ़हद रहमानी के बड़े भाई हैं और मौलाना वली रहमानी के बड़े साहबज़ादे.
 
इसी वर्ष जेईई मेन्स में रहमानी-30 के 182 में से 147 छात्रों की शानदार सफलता ने पूरे देश को चौंका दिया है.फ़ैसल रहमानी का यह भी कहा कि अगर हम सभी का आपसी सहयोग नहीं होगा तो साल दर साल लगातार ऐसी ऐतिहासिक सफलता हासिल करना संभव नहीं है. निस्संदेह आज रहमानी प्रोग्राम ऑफ एक्सीलेंस (रहमानी 30) इन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता की गारंटी बन गया है.
 
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा मशहूर है.कोटा में बड़े-बड़े कोचिंग संस्थान हैं.देश भर के लाखों बच्चे वहां प्रवेश पाना फ़ख़्र समझते हैं.मगर मुल्क के विभिन्न हिस्से में संचालित मुस्लिम संस्थान कोटा को चुनौती पेश कर रहे हैं.जिसमें एक रहमानी-30 भी है.