नकली दवाओं के मामलों की समयबद्ध जांच की मांग

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 28-09-2026
PIL in Supreme Court seeks time-bound probe, trial in fake drug cases
PIL in Supreme Court seeks time-bound probe, trial in fake drug cases

 

नई दिल्ली 
 
सुप्रीम कोर्ट में एक PIL (जनहित याचिका) दायर की गई है। इसमें नकली और मिलावटी दवाओं के निर्माण और बिक्री से निपटने के लिए एक समान राष्ट्रीय ढांचा बनाने की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मौजूदा सिस्टम में कमियों के कारण ऐसे रैकेट बहुत कम जवाबदेही के साथ काम कर पाते हैं। वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर इस PIL में केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे नकली दवाओं के मामलों की जांच तीन महीने के भीतर और ट्रायल एक साल के भीतर पूरा करें। इसमें ज़ब्त की गई दवाओं की तय समय-सीमा में फोरेंसिक जांच, तलाशी और ज़ब्ती की कार्रवाई की अनिवार्य वीडियोग्राफी, और जांच व अभियोजन के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाने की भी मांग की गई है।
 
याचिका में प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, बेनामी प्रॉपर्टी एक्ट और ब्लैक मनी एक्ट के तहत नकली दवा बनाने वालों, बेचने वालों और फाइनेंस करने वालों की संपत्ति का आकलन और ज़ब्ती करने की भी मांग की गई है। इसमें नकली दवाओं से जुड़े अपराधों के लिए सज़ा की एक श्रेणीबद्ध नीति (graded sentencing policy) की भी मांग की गई है, जिसमें उचित मामलों में लगातार सज़ा (consecutive sentences) देने पर विचार करना और लॉ कमीशन को नकली दवाओं के प्रसार को रोकने के लिए बदलावों की सिफारिश करने वाली रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश देना शामिल है।
 
याचिकाकर्ता ने बेंगलुरु के 90 से ज़्यादा अस्पतालों में नकली कैंसर की दवाओं की आपूर्ति की हालिया रिपोर्टों, साथ ही पहले खांसी की दवा (कफ सिरप) से हुई मौतों और नकली दवाओं की ज़ब्ती का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि यह समस्या इक्का-दुक्का घटनाओं से कहीं ज़्यादा बड़ी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, तय समय-सीमा में जांच, फोरेंसिक जांच, वित्तीय जांच, गवाहों की सुरक्षा और संगठित सिंडिकेट के अभियोजन के लिए कोई व्यापक ढांचा प्रदान नहीं करता है।
 
इसमें अपराध के पंजीकरण से लेकर अंतिम निपटान तक मामलों को ट्रैक करने के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल निगरानी प्रणाली का प्रस्ताव दिया गया है, साथ ही राज्य पुलिस, CBI, प्रवर्तन निदेशालय (ED), कस्टम्स और फोरेंसिक प्रयोगशालाओं जैसी एजेंसियों द्वारा समन्वित कार्रवाई का भी प्रस्ताव है। याचिका में अनुच्छेद 21 के तहत स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार, अनुच्छेद 14 के तहत मनमानी के खिलाफ सुरक्षा और अनुच्छेद 47 के तहत राज्य के दायित्वों से संबंधित संवैधानिक सवाल भी उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले पर अभी सुनवाई होनी बाकी है।