PIL in Delhi HC seeks nationwide regulation of tattoo industry, mandatory safety standards
नई दिल्ली
दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें भारत में टैटू इंडस्ट्री के लिए एक व्यापक रेगुलेटरी ढांचा बनाने की मांग की गई है। इस ढांचे में टैटू पार्लरों के लिए अनिवार्य लाइसेंसिंग, साफ-सफाई और स्टरलाइज़ेशन के मानक, टैटू की स्याही का रेगुलेशन, और माता-पिता की सहमति के बिना नाबालिगों को टैटू बनवाने पर रोक शामिल है। यह याचिका वकील अभिषेक कुमार चौधरी ने दायर की है। इसमें भारत सरकार, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, कानून और न्याय मंत्रालय, दिल्ली सरकार (NCT), दिल्ली पुलिस कमिश्नर और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) को निर्देश देने की मांग की गई है।
इस याचिका में मुख्य रूप से अधिकारियों से यह मांग की गई है कि वे पूरे देश में टैटू के कारोबार और कलाकारों को नियंत्रित करने वाले एक समान नियम बनाएं। इसमें सूचित सहमति (informed consent), शिकायत निवारण तंत्र, टैक्स नियमों का पालन, जन जागरूकता अभियान और नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने से जुड़े मानक बनाने की भी मांग की गई है। याचिका के अनुसार, भारत में टैटू इंडस्ट्री पिछले कुछ सालों में तेज़ी से बढ़ी है और इसका सालाना कारोबार कथित तौर पर लगभग 20,000 करोड़ रुपये का है, लेकिन यह अभी भी बिना किसी कानूनी ढांचे या केंद्रीय रेगुलेटरी निगरानी के चल रही है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि रेगुलेशन की कमी के कारण लोग गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों के संपर्क में आ जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि टैटू बनाने में साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता, इस्तेमाल होने वाले उपकरण दूषित होते हैं, और सुइयों का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है। इससे खून से फैलने वाली बीमारियां, जैसे कि हेपेटाइटिस B, हेपेटाइटिस C और HIV/AIDS फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
यह PIL टैटू बनाने के असुरक्षित तरीकों से जुड़े कथित स्वास्थ्य जोखिमों को उजागर करने के लिए विभिन्न मीडिया रिपोर्टों, मेडिकल जर्नल और रिसर्च पेपर पर आधारित है। इसमें टैटू की सुइयों के ज़रिए कथित तौर पर HIV फैलने से जुड़ी रिपोर्टों और मेडिकल अध्ययनों का हवाला दिया गया है, जिनमें टैटू की स्याही के कणों के शरीर के अंगों और लिम्फ नोड्स तक पहुंचने की संभावना पर चर्चा की गई है।
याचिका में टैटू की स्याही की बनावट को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें दावा किया गया है कि कुछ स्याही में सीसा (lead) और एल्यूमीनियम जैसी भारी धातुएं हो सकती हैं, जिनसे लंबे समय तक रहने वाली स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
याचिका में उठाया गया एक और बड़ा मुद्दा नाबालिगों को टैटू बनवाना है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि नाबालिग बच्चे माता-पिता की सहमति के बिना ही टैटू बनवा रहे हैं, जबकि भारतीय कानून के तहत उनके पास वैध सहमति देने की कानूनी क्षमता नहीं होती है।
याचिका में रक्षा मंत्रालय की टैटू नीति का भी ज़िक्र किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि कई लोगों को सशस्त्र बलों और अन्य वर्दीधारी सेवाओं में भर्ती के दौरान टैटू से जुड़े प्रतिबंधों के बारे में जानकारी नहीं होती है। इसके परिणामस्वरूप, उन्हें भर्ती के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाता है और टैटू हटवाने की प्रक्रिया में उन्हें आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। PIL में कहा गया है कि जहाँ यूनाइटेड किंगडम, यूनाइटेड स्टेट्स और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने टैटू बनवाने के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाए हैं, वहीं भारत में अभी इस सेक्टर को रेगुलेट करने वाला कोई एक जैसा कानून नहीं है।
याचिका में की गई मुख्य माँगों में से कुछ ये हैं: ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स को टैटू की स्याही और उपकरणों के लिए मानक तय करने के निर्देश देना, और अधिकारियों को टैटू पार्लरों के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग लागू करने के निर्देश देना।
याचिकाकर्ता ने दिल्ली सरकार और पुलिस अधिकारियों को भी निर्देश देने की माँग की है कि वे राष्ट्रीय राजधानी में चल रहे अस्वच्छ और बिना रेगुलेशन वाले टैटू सेंटरों का निरीक्षण करें और उनके खिलाफ कार्रवाई करें।
याचिका में कहा गया है कि रेगुलेशन की कमी भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 47 के तहत सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।