नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 20 बागी तृणमूल कांग्रेस (TMC) लोकसभा सांसदों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने में हुई तीन महीने की देरी को "रेड फ़्लैग" (चेतावनी का संकेत) माना, लेकिन स्पीकर ओम बिरला के लिए कोई तय समय-सीमा नहीं रखी। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की बेंच - जिसमें जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे - TMC सांसद अभिषेक बनर्जी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें लोकसभा स्पीकर के पास दायर 20 अयोग्यता याचिकाओं का जल्द निपटारा करने की मांग की गई थी।
जस्टिस बागची ने कहा कि यह देरी महत्वपूर्ण है क्योंकि कार्यवाही के नतीजों का असर अयोग्यता के मुद्दे से कहीं आगे तक हो सकता है, जिसमें अन्य कार्यवाहियां और लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, "मामले अलग-अलग तरह के होते हैं। कुछ महीनों की देरी 'रेड फ़्लैग' हो सकती है और इस बात को समझा जा सकता है। मिस्टर चंद्रा की याचिका में तीन महीने बीत जाने को 'रेड फ़्लैग' बताया गया है। आपने इसे पूरा क्यों नहीं किया, जबकि यह कुछ ही पल का काम है और इसके कई अन्य कार्यवाहियों और देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी असर पड़ते हैं?"
अभिषेक बनर्जी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने बेंच को बताया कि स्पीकर ने 5 अगस्त को सांसदों को नोटिस जारी किए थे और उन्हें जवाब देने के लिए 14 दिन का समय दिया था। बाद में, सांसदों के अतिरिक्त समय मांगने पर समय-सीमा 22 सितंबर तक बढ़ा दी गई थी। अब और समय बढ़ाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट के 'केशम मेघचंद्र सिंह बनाम स्पीकर, मणिपुर विधानसभा' (2020) के फैसले का हवाला देते हुए, बनर्जी ने कहा कि शीर्ष अदालत ने असाधारण परिस्थितियों के न होने पर अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला लेने के लिए तीन महीने की अधिकतम समय-सीमा का संकेत दिया था।
स्पीकर की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायिक समय-सीमा तय करने का विरोध करते हुए कहा कि सांसदों को जवाब देने का पर्याप्त मौका दिया जाना चाहिए।
मेहता ने कहा, "अदालत को कोई समय-सीमा तय करने पर विचार नहीं करना चाहिए। स्पीकर को पता होता है कि क्या करना है। सभी को मौका दिया जाना चाहिए।"
उन्होंने आगे कहा कि स्पीकर, एक संवैधानिक पद पर होने के नाते, हर मामले की प्रकृति के आधार पर सबूतों और तर्कों की जांच कर सकते हैं।
जस्टिस बागची ने कहा कि शीर्ष अदालत कोई सख्त समय-सीमा थोपना नहीं चाहती, लेकिन इस बात पर जोर दिया कि स्पीकर को अपने पद से जुड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। जस्टिस बागची ने कहा, "स्पीकर को अपनी संवैधानिक भूमिका निभानी चाहिए।" उन्होंने यह भी कहा कि अयोग्यता से जुड़े कुछ मामले सीधे हो सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में ज़्यादा समय लग सकता है।
आखिरकार, बेंच ने कोई समय-सीमा तय करने के बजाय याचिका को लंबित रखा और कार्यवाही की प्रगति के बारे में जानकारी मांगने का फैसला किया। मामले की सुनवाई छह हफ़्ते बाद होगी। बनर्जी ने बागी सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही में कथित देरी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और स्पीकर ओम बिरला को कार्यवाही जल्द पूरी करने का निर्देश देने की मांग की है। TMC ने 20 सांसदों पर पार्टी छोड़ने और उसके बाद नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (NCPI) में शामिल होने का आरोप लगाया है। बनर्जी का तर्क है कि उनके इस व्यवहार से संविधान के दलबदल-रोधी प्रावधानों के तहत अयोग्यता बनती है।
याचिका में लोकसभा स्पीकर और सदन के महासचिव को मुख्य प्रतिवादी बनाया गया है, साथ ही उन 20 सांसदों को भी पक्षकार बनाया गया है जिनकी अयोग्यता की मांग की जा रही है। प्रतिवादियों में काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंद्योपाध्याय, शताब्दी रॉय, प्रसून बनर्जी, रचना बनर्जी, जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया, पार्थ भौमिक, अरूप चक्रवर्ती, अधिकारी दीपक देव, सयानी घोष, बापी हलदर, मो. अबू ताहिर खान, कालीपदा सरेन खेरवाल, असित कुमार मल, जून मालिया, मिताली बाग, खलीकुर रहमान, माला रॉय, शर्मिला सरकार और पठान यूसुफ शामिल हैं। TMC में यह बगावत पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद हुई है।