जलवायु परिवर्तन, निर्माण और वर्षा के चलते देश में बढ़े भूस्खलन के मामले: जीएसआई वैज्ञानिक

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 31-08-2025
Landslides have increased in the country due to climate change, construction and rainfall: GSI scientist
Landslides have increased in the country due to climate change, construction and rainfall: GSI scientist

 

कोलकाता

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने कहा है कि देशभर में बार-बार और बड़े स्तर पर हो रहे भूस्खलन केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से हो रहे निर्माण, वर्षा की बदलती प्रवृत्ति और वनों की कटाई जैसे कई मानवीय कारकों के संयुक्त प्रभाव से हो रहे हैं।

जीएसआई के महानिदेशक असित साहा ने रविवार को कोलकाता स्थित मुख्यालय में ‘पीटीआई-भाषा’ से बात करते हुए कहा कि वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, जो भारत सहित पूरी दुनिया में वर्षा के पैटर्न को बदल रहा है। इसका सीधा असर हिमालय और पश्चिमी घाट जैसे क्षेत्रों में पड़ रहा है, जो भूस्खलन की दृष्टि से पहले ही संवेदनशील हैं।

"प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से संवेदनशीलता बढ़ी"

साहा के अनुसार,“भूगर्भीय बनावट, जलवायु स्थितियां और बढ़ते मानवजनित दबाव मिलकर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों को बेहद संवेदनशील बना रहे हैं। पहले भी भारत में खासकर हिमालय और पश्चिमी घाट में भूस्खलन की घटनाएं होती थीं, लेकिन अब इसकी आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि देखी जा रही है।”

उन्होंने यह भी बताया कि हिमालय के ऊपरी इलाकों में नदी घाटियों में भूस्खलन से बनी झीलें और फिर उनमें दरारें आने से नीचे बाढ़ और ढलानों की अस्थिरता जैसे गंभीर खतरे पैदा हो रहे हैं।

भूस्खलन बढ़ने के मुख्य कारण

साहा ने भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि के पीछे कई कारण गिनाए:

  1. प्राकृतिक ढलानें – भारत के पहाड़ी इलाकों में कई स्वाभाविक रूप से खड़ी ढलानें होती हैं, जो चट्टान, मलबे या मिट्टी को खिसकाने में सहायक बनती हैं। हल्का सा हस्तक्षेप भी इन्हें अस्थिर कर सकता है।

  2. भूगर्भीय सक्रियता – हिमालय जैसे टेक्टोनिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों की युवा, खंडित और कमजोर चट्टानें बारिश या भूकंप के दौरान जल्दी टूटती हैं।

  3. मानसूनी वर्षा – लंबे समय तक या अत्यधिक वर्षा से मिट्टी और चट्टानों में नमी बढ़ती है, जिससे वे कमजोर होकर ढलान से खिसकने लगती हैं।

  4. मानवजनित हस्तक्षेपसड़क निर्माण, वनों की कटाई, और अनियोजित शहरीकरण जैसी गतिविधियां प्राकृतिक जल निकासी को बाधित करती हैं, जिससे ढलानों की स्थिरता और भी कम हो जाती है।

“ढलानों पर बिना इंजीनियरिंग प्लानिंग के निर्माण से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, जो भूस्खलन के खतरे को बढ़ाता है,” – साहा ने जोड़ा।

किन क्षेत्रों में खतरा सबसे ज्यादा?

जीएसआई के अनुसार, राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्रण (एनएलएसएम) कार्यक्रम के तहत निम्नलिखित क्षेत्रों को सबसे अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है:

  • हिमालयी क्षेत्र:
    जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश।

  • पश्चिमी घाट:
    केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के नीलगिरी पहाड़ियां और कोंकण तट।