नई दिल्ली
Jamaat-e-Islami Hind के अध्यक्ष Syed Sadatullah Husaini ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस हालिया फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसमें कमाल मौला मस्जिद को मंदिर घोषित किया गया है। उन्होंने कहा कि इस फैसले के दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं और इससे देश की न्यायिक व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता तथा सांप्रदायिक सौहार्द पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
मीडिया को जारी बयान में सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दिए गए धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला है। उन्होंने कहा कि भोजशाला परिसर लंबे समय से ऐसी व्यवस्था के तहत संचालित हो रहा था, जहां दोनों समुदाय अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन कर रहे थे। ऐसे में किसी एक समुदाय को प्राथमिकता देकर दूसरे समुदाय के स्थापित इबादत के अधिकारों को समाप्त करना संतुलन और समानता के सिद्धांत के खिलाफ माना जाएगा।
उन्होंने कहा कि भारत जैसे बहुलवादी और विविधतापूर्ण समाज में ऐसे मामलों को अत्यंत संवेदनशीलता और सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, किसी एक पक्ष को वरीयता देने से सामाजिक विश्वास कमजोर हो सकता है और इससे धार्मिक समुदायों के बीच दूरी बढ़ने की आशंका पैदा होती है।
जमाअत अध्यक्ष ने मुस्लिम समुदाय को वैकल्पिक जमीन देने के सुझाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इबादतगाह केवल एक भौतिक स्थान नहीं होती, बल्कि वह ऐतिहासिक पहचान, धार्मिक निरंतरता और सामूहिक स्मृति से जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि किसी समुदाय को उसके लंबे समय से स्थापित धार्मिक स्थल से हटाना अलगाव और अन्याय की भावना पैदा कर सकता है।
सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में विवादित ऐतिहासिक और पुरातात्विक व्याख्याओं के आधार पर फैसले देना चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि इस तरह की व्याख्याओं की निष्पक्ष और सावधानीपूर्वक जांच होनी चाहिए ताकि किसी एक समुदाय के दावों को अनुचित रूप से बढ़ावा न मिले।
उन्होंने इस फैसले को एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा बताया, जिसमें धार्मिक स्थलों से जुड़े पुराने विवादों को दोबारा उठाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि Places of Worship Act 1991 का उद्देश्य स्वतंत्रता के समय मौजूद धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना था। ऐसे में इस कानून की मूल भावना और प्रावधानों का पूरी गंभीरता से पालन किया जाना चाहिए।
जमाअत अध्यक्ष ने कहा कि अगर इस सिद्धांत को कमजोर किया गया तो इसके सामाजिक और सांप्रदायिक प्रभाव काफी गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने न्यायपालिका से अपील की कि ऐसे मामलों में संवैधानिक नैतिकता, निष्पक्षता और सभी समुदायों के लिए समान न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता के बीच उसकी निष्पक्षता स्पष्ट रूप से दिखाई भी देनी चाहिए। उनके अनुसार हाल की कुछ घटनाओं से एक ऐसी धारणा बन रही है, जो न्यायपालिका की विश्वसनीयता और जनविश्वास को प्रभावित कर सकती है।
सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय इस मामले में सभी संवैधानिक और कानूनी विकल्पों का उपयोग करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अपील सहित सभी कानूनी रास्तों पर विचार किया जाएगा ताकि समुदाय की चिंताओं को उचित तरीके से सुना और संबोधित किया जा सके।
उन्होंने अंत में कहा कि देश की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भावना को मजबूत बनाए रखने के लिए सभी नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना बेहद जरूरी है।