आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
परमाणु हथियारों से लैस क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी इजराइल और दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकत (अमेरिका) के साथ लगभग चार महीने के युद्ध के बाद भी ईरान पराजित नहीं हुआ है।
ईरान की सरकार अब भी अपनी आबादी और अपने क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए हुए है। हालांकि उसकी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा है लेकिन उसका औद्योगिक ढांचा अब भी मिसाइलों, ड्रोन और रॉकेटों का उत्पादन कर रहा है।
तेहरान ने अपने कई शीर्ष नेताओं को खो दिया, लेकिन जीवित बचे नेता बातचीत को अपने हित में मोड़ने के लिए अब भी दृढ़ दिखाई देते हैं।
निस्संदेह, कई मायनों में ऑस्ट्रेलिया और ईरान एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया के सामने फिलहाल युद्ध का कोई आसन्न खतरा भी नहीं है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वह ईरान के अनुभवों से कुछ नहीं सीख सकता।
बदलते युद्ध स्वरूप और ऑस्ट्रेलिया जैसे मध्यम ताकत वाले देशों की रक्षा तैयारियों के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सबक इस प्रकार हैं:
अपरंपरागत प्रतिरोधक क्षमता
युद्ध से पहले ईरान के ‘प्रतिरोध की धुरी’ का नेटवर्क (यमन में हूती, लेबनान में हिजबुल्ला, गाजा में हमास और इराक में शिया मिलिशिया) उसे रणनीतिक तौर पर मजबूत करता आ रहा था।
अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर पिछले वर्ष 12 दिन तक और इस वर्ष हमला किया लेकिन उन्होंने यह जानते हुए ऐसा किया कि ईरान के सहयोगी समूह जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं, उनके सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते हैं, बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकते हैं या उनके साझेदारों को कमजोर कर सकते हैं। संघर्ष के दौरान ये सब हुआ।