प्रधान न्यायाधीश को लिखे पत्र में विपक्ष ने कहा: न्यायपालिका आखिरी उम्मीद

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 03-07-2026
In a letter to the Chief Justice, the opposition said: Judiciary is the last hope
In a letter to the Chief Justice, the opposition said: Judiciary is the last hope

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
विपक्षी 'इंडिया' गठबंधन के घटक दलों के नेताओं ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को पत्र लिखकर देश का लोकतंत्र ‘‘खतरे में’’ होने का दावा किया और चुनावी प्रक्रिया तथा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि जब सभी संस्थागत तंत्र विफल हो जाते हैं तो नागरिकों की अंतिम उम्मीद न्यायपालिका ही होती है।
 
बीते 28 जून को विपक्ष के 23 दलों के नेताओं ने यह पत्र लिखा था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और कई अन्य नेताओं ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं।
 
पत्र में इन नेताओं ने कहा कि वे सामान्य परिस्थितियों में न्यायपालिका को इस प्रकार का पत्र नहीं लिखते, लेकिन उन्हें लगता है कि ‘‘देश का लोकतंत्र खतरे में है’’ और इसलिए उन्होंने यह असाधारण कदम उठाया है।
 
उन्होंने कहा कि संसद, न्यायपालिका, मीडिया और कार्यपालिका लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ हैं तथा इन संस्थाओं के बीच सहयोगात्मक व्यवस्था से ही लोकतंत्र मजबूत रह सकता है। उन्होंने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद बताते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी जनता की असली इच्छा को प्रभावित कर सकती है।
 
पत्र में निर्वाचन आयोग और विशेष रूप से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा कराई जा रही मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं।
 
विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि बिहार में शुरू की गई इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूचियों की शुचिता सुनिश्चित करना बताया गया, लेकिन इसके क्रियान्वयन के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका पैदा हुई।
 
पत्र में दावा किया गया है कि दस्तावेज आधारित सत्यापन प्रक्रिया गरीबों, अशिक्षितों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और प्रवासी श्रमिकों के लिए ‘‘बहिष्कार वाली ’’ साबित हुई।
 
इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान प्रशासनिक भ्रम, पारदर्शिता की कमी और नियमों में बार-बार बदलाव जैसी समस्याएं सामने आईं।