आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्च न्यायालयों में आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र की उस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिसमें इस कानून को चुनौती देने संबंधी विभिन्न उच्च न्यायालयों में लंबित सभी याचिकाओं को शीर्ष अदालत में हस्तांतरित करने का अनुरोध किया गया है।
केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि यह मामला एक केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता से जुड़ा हुआ है।
पीठ ने कहा, ‘‘नोटिस जारी किया जाए।’’ शीर्ष अदालत ने यह भी कहा, ‘‘उच्च न्यायालयों में आगे की कार्यवाही पर रोक लगी रहेगी।’’
मेहता ने 27 मई को उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह मामला उठाया था और याचिकाओं को जल्द सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया था।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि चूंकि कई उच्च न्यायालयों में यह मामला लंबित है, इसलिए संघीय कानून की वैधता पर ‘‘अलग-अलग राय’’ और विरोधाभासी न्यायिक फैसले आने का जोखिम है।
उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026, के प्रावधानों को लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों ने चिंता जताई है।
विवाद की मुख्य वजह समुदाय के अपनी पहचान खुद तय करने से जुड़े प्रावधान को हटाना है। यह एक ऐसा अधिकार है जिसे उच्चतम न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक ‘नालसा’ (राष्ट्रीय विधिक सेवाएं प्राधिकरण) मामले के फैसले में बरकरार रखा था।
खबरों के अनुसार, 2026 के संशोधन में ट्रांसजेंडर की पहचान के लिए चिकित्सकीय या प्रशासनिक दखल को जरूरी बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह गरिमा, निजता और शरीर पर व्यक्ति के खुद के अधिकार का उल्लंघन करता है।