गुजरात बजट में बायो सीएनजी प्लांट को बढ़ावा, 60 करोड़ प्रावधान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 26-03-2026
Gujarat Budget Boosts Bio-CNG Plants: Provision of 60 Crore
Gujarat Budget Boosts Bio-CNG Plants: Provision of 60 Crore

 

गुजरात सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए अपने बजट में बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने बायो सीएनजी प्लांट्स को प्रोत्साहित करने के लिए 60 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान किया है। यह पहल ‘वेस्ट टू वेल्थ’ और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप मानी जा रही है।

मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, बनास डेयरी द्वारा विकसित बायो सीएनजी प्लांट मॉडल अब देश के लगभग 15 राज्यों में अपनाया जा रहा है। इस परियोजना के तहत गोबर जैसे जैविक कचरे को स्वच्छ ईंधन और जैविक खाद में बदला जा रहा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल रही है।

राज्य सरकार ने इस क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए इसे बजट में प्राथमिकता दी है। योजना के तहत सहकारी दुग्ध उत्पादन समितियों के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से लगभग 10 नए बायो सीएनजी प्लांट स्थापित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य डेयरी क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बनाना और गांवों को आर्थिक रूप से मजबूत करना है।

बनासकांठा जिले में स्थित बायो सीएनजी प्लांट इस मॉडल का सफल उदाहरण है। यह प्लांट पिछले छह वर्षों से कार्यरत है और प्रतिदिन बड़ी मात्रा में गोबर का प्रसंस्करण करता है। इसकी सफलता से प्रेरित होकर जिले में पांच नए बड़े प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं, जिनमें से दो शुरू हो चुके हैं और एक अंतिम चरण में है।

हर प्लांट प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन गोबर को प्रोसेस करता है। इनकी लागत लगभग 50 से 55 करोड़ रुपये है। इन प्लांट्स से न केवल स्वच्छ ईंधन बनता है, बल्कि जैविक खाद भी तैयार होती है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की आय में भी वृद्धि हो रही है।

करीब 20 से 25 गांवों के पशुपालक किसान नियमित रूप से गोबर की आपूर्ति करते हैं। उन्हें प्रति किलो गोबर के हिसाब से भुगतान किया जाता है, जिससे सैकड़ों परिवारों को अतिरिक्त आय मिल रही है। इसके अलावा, गोबर के संग्रह और परिवहन से स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हो रहा है।

इस परियोजना से प्रतिदिन लगभग 1800 किलोग्राम बायो सीएनजी का उत्पादन होता है, जिसे बाजार में बेचा जाता है। साथ ही ठोस और तरल जैविक खाद भी तैयार की जाती है, जिससे प्लांट की आय के कई स्रोत बनते हैं। कुल मिलाकर यह मॉडल आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से सफल साबित हो रहा है।

यह पहल न केवल ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। अनुमान है कि इस मॉडल से हर साल बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आएगी। यह योजना ‘ग्रीन गुजरात’ के लक्ष्य को साकार करने में अहम भूमिका निभा रही है।