नई दिल्ली
Google LLC ने दिल्ली हाई कोर्ट से कहा है कि उसे YouTube की पहले से निगरानी करने या कोर्ट की कार्यवाही की कथित तौर पर अनधिकृत रिकॉर्डिंग को दोबारा होने से रोकने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। कंपनी का तर्क है कि एक मध्यस्थ (intermediary) के तौर पर वह न तो थर्ड-पार्टी कंटेंट बनाती है और न ही उसे कंट्रोल करती है, और न ही उस पर अपने प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए गए लाखों वीडियो की निगरानी करने की ज़िम्मेदारी डाली जा सकती है। अरविंद केजरीवाल की खुद को मामले से अलग करने की अर्जी (recusal plea) पर 13 अप्रैल को हुई सुनवाई के वीडियो के प्रसार से जुड़ी PIL के मामले में हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे में Google ने कहा कि Information Technology Act, 2000 के तहत YouTube सिर्फ़ एक मध्यस्थ है। अगर कोई ज़िम्मेदारी बनती है, तो वह कंटेंट के पब्लिशर या अपलोडर की होगी, न कि प्लेटफॉर्म की।
Google ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता ने जो राहत मांगी है—जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसी रिकॉर्डिंग को दोबारा होने से रोकने, री-अपलोड की निगरानी करने और नियमों का पालन न करने पर जुर्माना लगाने का निर्देश देना—वह कानूनी रूप से सही नहीं है, अस्पष्ट है और उसे लागू नहीं किया जा सकता। उसने तर्क दिया कि कोर्ट की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग YouTube प्लेटफॉर्म के बाहर थर्ड-पार्टी द्वारा की जाती है। YouTube के पास यह पता लगाने का कोई तरीका नहीं है कि कोई खास अपलोड किया गया वीडियो कोर्ट की कार्यवाही से संबंधित है या नहीं, रिकॉर्डिंग अनधिकृत है या नहीं, या यह किसी खास कानून का उल्लंघन करता है या नहीं—खासकर तब जब कोर्ट की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग से जुड़े नियम अलग-अलग कोर्ट में अलग-अलग होते हैं।
हलफनामे के अनुसार, YouTube को केवल तभी खास URL तक एक्सेस बंद करने की ज़रूरत होती है जब कोई सक्षम कोर्ट पहचाने गए कंटेंट को गैर-कानूनी घोषित कर दे। उसने कहा कि प्लेटफॉर्म संभावित अनधिकृत रिकॉर्डिंग की पहचान करने या भविष्य में अपलोड होने से रोकने के लिए लाखों वीडियो को पहले से स्कैन नहीं कर सकता। Google ने कोर्ट को यह भी बताया कि याचिका में पहचाने गए नौ YouTube URL में से कई को हाई कोर्ट के 23 अप्रैल, 2026 के अंतरिम आदेश से पहले ही भारत में ब्लॉक कर दिया गया था या उन्हें अनुपलब्ध कर दिया गया था।
कोर्ट के निर्देशों के बाद, उसने पूरी सावधानी बरतते हुए बाकी पहचाने गए URL को भी ब्लॉक कर दिया। उसने कहा कि तब से याचिकाकर्ता ने उसे कथित रिकॉर्डिंग वाले किसी अन्य URL के बारे में सूचित नहीं किया है। हलफनामे में कहा गया है कि YouTube न तो यूज़र द्वारा बनाए गए कंटेंट को पब्लिश करता है और न ही उसका समर्थन करता है, और उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह थर्ड-पार्टी द्वारा अपलोड किए गए वीडियो की वैधता पर फैसला करे। गूगल ने कहा कि 'श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला यह साफ़ करता है कि किसी इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) को कोर्ट के आदेश या संबंधित सरकार की ओर से जारी नोटिफ़िकेशन के बाद ही "असल जानकारी" (actual knowledge) मिलती है, और उसे यह तय करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता कि कोई कंटेंट गैर-कानूनी है या नहीं।
गूगल ने आगे तर्क दिया कि IT एक्ट की धारा 79 के तहत इंटरमीडियरी को 'सेफ़ हार्बर' सुरक्षा मिलती है और उन पर प्रोएक्टिव मॉनिटरिंग (पहले से निगरानी रखने) की ज़िम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। उसने कहा कि कंटेंट हटाने के किसी भी निर्देश में खास URL की पहचान होनी चाहिए, और भविष्य में अपलोड होने वाले कंटेंट की निगरानी या उन्हें रोकने के लिए दिए गए सामान्य निर्देश 'चिलिंग इफ़ेक्ट' (लोगों को बोलने से रोकने का डर) पैदा करेंगे और स्थापित कानून के खिलाफ़ होंगे।
उसने यह भी कहा कि कंटेंट हटाने के आदेश मुख्य रूप से कंटेंट बनाने वालों या पब्लिशर के खिलाफ़ होने चाहिए, न कि इंटरमीडियरी के खिलाफ़; और आदेश देने से पहले उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए। हलफ़नामे के आखिर में गूगल से जुड़ी याचिका को खारिज करने की मांग की गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले उन सभी सोशल मीडिया लिंक को हटाने का निर्देश दिया था जिनमें दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से दायर 'रिक्यूज़ल प्ली' (जज के मामले से हटने की अर्ज़ी) पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने 13 अप्रैल को हुई कार्यवाही का ज़िक्र था।
जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत अरोड़ा की डिवीज़न बेंच ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को भी प्रतिवादी (respondent) बनाया और अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, पत्रकार रवीश कुमार और अन्य सहित सभी प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया। वकील वैभव सिंह की ओर से दायर PIL में आरोप लगाया गया है कि 13 अप्रैल की अदालती कार्यवाही को बिना इजाज़त रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर फैलाया गया, जो दिल्ली हाई कोर्ट के 'इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस एंड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2025' का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा था कि हाई कोर्ट के नियमों के तहत बिना पूर्व अनुमति के अदालती कार्यवाही को रिकॉर्ड करना और अपलोड करना साफ़ तौर पर मना है। कोर्ट ने बचे हुए लिंक हटाने का निर्देश दिया और कहा कि अगर ऐसे वीडियो दोबारा सामने आते हैं, तो जानकारी मिलने पर प्लेटफ़ॉर्म को उन्हें हटाना होगा और रजिस्ट्रार जनरल को सूचित करना होगा। एक इंटरमीडियरी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अरविंद पी. दातार ने कहा था कि आधिकारिक सूचना मिलने के बाद आपत्तिजनक कंटेंट हटा दिया गया था और इंटरमीडियरी सेंसर के तौर पर काम नहीं कर सकते। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा था कि यह मामला न्यायपालिका संस्था से जुड़ा है और इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है।