ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली
कश्मीर की बेटियाँ आज हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। खेल, कला, शिक्षा और व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में उन्होंने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर एक अलग पहचान बनाई है। इन्हीं प्रेरणादायक कहानियों में एक नाम तेजी से उभरकर सामने आया है, श्रीनगर की किशोरी रुतबा शौकत का। रुतबा ने हाल ही में एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे कश्मीर को गर्व से भर दिया है। उन्होंने कागज़ मोड़ने की कला ओरिगामी में एक अनोखा कीर्तिमान स्थापित करते हुए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है। रुतबा ने एक घंटे में 250 ओरिगामी कागज़ की नावें बनाकर विश्व रिकॉर्ड बनाया और इस उपलब्धि के साथ उनका नाम आधिकारिक रूप से गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हो गया।
रुतबा शौकत श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर की रहने वाली हैं और वह पहले से ही एक राष्ट्रीय स्तर की मार्शल आर्ट खिलाड़ी के रूप में जानी जाती रही हैं। खेलों में उनकी उपलब्धियाँ कम प्रभावशाली नहीं हैं। पिछले लगभग एक दशक से वह मार्शल आर्ट में सक्रिय हैं और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं।
अब तक वह एक स्वर्ण पदक सहित लगभग 60 पदक जीत चुकी हैं। उनके कमरे की दीवारें और शेल्फ आज भी उन ट्रॉफियों और मेडल्स से भरे हुए हैं, जो उनकी खेल यात्रा की मेहनत और सफलता की गवाही देते हैं। लेकिन रुतबा की प्रतिभा केवल खेलों तक सीमित नहीं है। वह सुलेख यानी कैलिग्राफी और चित्रकला में भी उतनी ही निपुण हैं, और यही रचनात्मकता आगे चलकर उन्हें विश्व रिकॉर्ड तक ले गई।

दरअसल, रुतबा की कला की यात्रा कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुई। उस समय पूरे देश की तरह कश्मीर में भी खेल अकादमियाँ बंद हो गई थीं और खिलाड़ियों के लिए अभ्यास के अवसर सीमित हो गए थे। ऐसे समय में रुतबा ने अपने खाली समय को व्यर्थ जाने देने के बजाय उसे एक नई दिशा देने का फैसला किया। उन्होंने कला की ओर रुख किया और लैंडस्केप आर्ट बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कला को निखारना शुरू किया और इसी दौरान उनकी मेहनत रंग लाई जब उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। रुतबा बताती हैं कि उसी समय उनके मन में कुछ बड़ा करने का विचार आया।
उन्होंने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के बारे में पढ़ना शुरू किया और यह समझने की कोशिश की कि किस तरह लोग विश्व रिकॉर्ड बनाते हैं। इस विषय पर उन्होंने विस्तार से शोध किया। इसी शोध के दौरान उनकी नज़र ओरिगामी पेपर आर्ट पर पड़ी। ओरिगामी कागज़ को अलग-अलग तरीकों से मोड़कर विभिन्न आकृतियाँ बनाने की एक जापानी कला है। रुतबा को यह कला पहले से थोड़ी-बहुत आती थी और उन्हें इसमें रुचि भी थी। जब उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति ने एक घंटे में 150 कागज़ की नावें बनाकर रिकॉर्ड बनाया था, तो उन्होंने सोचा कि क्यों न वह इस चुनौती को स्वीकार करें।
यहीं से उनकी विश्व रिकॉर्ड की यात्रा शुरू हुई। उन्होंने नियमित अभ्यास करना शुरू किया और अपने हाथों की गति तथा तकनीक को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया। लेकिन यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। रुतबा ने गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए आवेदन किया और प्रयास भी किया, लेकिन शुरुआती दो कोशिशों में वह रिकॉर्ड तोड़ने में सफल नहीं हो सकीं। असफलता किसी भी व्यक्ति को निराश कर सकती है, लेकिन रुतबा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी कमियों को समझा, और भी ज्यादा मेहनत की और तीसरी बार फिर से प्रयास करने का फैसला किया।
रुतबा बताती हैं कि इस पूरे प्रयास के बारे में उन्होंने किसी को ज्यादा नहीं बताया था। वह चाहती थीं कि जब वह सफल हों, तब अपने परिवार को एक बड़ा सरप्राइज दें। तीन साल तक लगातार मेहनत और अभ्यास करने के बाद आखिरकार वह दिन आया जब उनका सपना सच हो गया। अपने तीसरे प्रयास में रुतबा ने एक घंटे में 250 कागज़ की नावें बनाकर नया विश्व रिकॉर्ड बना दिया। इसका मतलब यह था कि वह लगभग हर 15 सेकंड में एक नाव बना रही थीं और औसतन प्रति मिनट चार नावें तैयार कर रही थीं। इतनी तेज़ गति और सटीकता के साथ एक घंटे तक लगातार काम करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन रुतबा ने यह कर दिखाया।

इस उपलब्धि के बाद उन्हें गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड का आधिकारिक प्रमाणपत्र भी मिला। प्रमाणपत्र में लिखा है कि रुतबा शौकत ने एक GUINNESS WORLD RECORD™ प्रयास में हिस्सा लिया और एक घंटे में सबसे ज्यादा ओरिगामी नावें बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम किया। यह रिकॉर्ड उन्होंने श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर में हासिल किया।
अपनी सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए रुतबा कहती हैं कि वह पिछले तीन सालों से इस रिकॉर्ड के लिए आवेदन कर रही थीं और दो बार असफल होने के बाद भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। उनका कहना है कि कड़ी मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। वह इस उपलब्धि का श्रेय अपने माता-पिता को भी देती हैं, जिन्होंने हमेशा उनका साथ दिया और उन्हें खेल तथा कला दोनों क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुसार यह अंतरराष्ट्रीय पहचान न केवल उनके लिए बल्कि पूरे परिवार के लिए गर्व का क्षण है।

हालाँकि इस यात्रा में उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने कहा कि वह अपना समय बर्बाद कर रही हैं और ऐसी चीजों में मेहनत करने का कोई फायदा नहीं है। लेकिन रुतबा ने इन बातों को अपने लक्ष्य के रास्ते में आने नहीं दिया। वह लगातार मेहनत करती रहीं और अंततः अपनी लगन और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा लिया।
रुतबा का मानना है कि लड़कियों को अपने सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। अक्सर समाज या परिवार के डर से लड़कियाँ अपने कदम पीछे खींच लेती हैं, लेकिन उनके अनुसार आत्मनिर्भर बनना बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन अगर इरादा मजबूत हो तो धीरे-धीरे बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की जा सकती हैं। एक खिलाड़ी और कलाकार दोनों होने के कारण रुतबा जीवन में संतुलन बनाए रखने पर भी जोर देती हैं। उनके अनुसार खेल शरीर को मजबूत बनाते हैं, जबकि कला मन को सुकून और ताजगी देती है। यही संतुलन उन्हें निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
आज रुतबा शौकत की कहानी कश्मीर की उन तमाम लड़कियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जो अपने सपनों को साकार करना चाहती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि कठिन परिस्थितियाँ भी किसी व्यक्ति को रोक नहीं सकतीं, अगर उसके पास दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत करने का जज्बा हो। कोविड जैसे कठिन समय को उन्होंने अवसर में बदल दिया और उस दौरान सीखी गई कला ने उन्हें विश्व रिकॉर्ड तक पहुँचा दिया। रुतबा की यह उपलब्धि केवल एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह कश्मीर की युवा पीढ़ी, खासकर लड़कियों के लिए एक मजबूत संदेश है कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अधिकार सभी को है। उनकी कहानी सचमुच इस कहावत को चरितार्थ करती है जहाँ चाह, वहाँ राह।