सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश पर अब नहीं लगेगा पूंजीगत लाभ कर, अध्यादेश जारी

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 05-06-2026
 foreign investment in government securities, ordinance issued
foreign investment in government securities, ordinance issued

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के सरकारी प्रतिभूतियों (जी-सेक) में किए गए निवेश पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) को समाप्त करने का फैसला किया है। इस संबंध में शुक्रवार को एक अध्यादेश जारी किया गया। इसका मकसद देश में डॉलर के प्रवाह को बढ़ाना है।

इस अध्यादेश के जरिये आयकर अधिनियम में संशोधन कर यह छूट प्रदान की गई है।
 
सरकार ने दीर्घकालिक एवं स्थिर पूंजी आकर्षित करने के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर पूंजीगत लाभ कर हटाने का फैसला किया है, क्योंकि इन माध्यमों की अवधि लंबी होती है।
 
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब विदेशी निवेशकों ने इस वर्ष अब तक स्थानीय शेयर बाजार से भारी 2.6 लाख करोड़ रुपये की निकासी की है, जो 2025 में निकाले गए 1.66 लाख करोड़ रुपये से कहीं अधिक है। इसकी वजह वैश्विक अनिश्चितता रही है।
 
केवल जून के पहले तीन दिन में ही विदेशी निवेशकों ने शेयरों से करीब 34,000 करोड़ रुपये निकाले, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
 
विदेशी निवेशकों ने हालांकि पूर्ण पहुंच मार्ग (एफएआर) के तहत ऋण बाजार में 17,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है। वहीं इस वर्ष अब तक उन्होंने सामान्य ऋण सीमा के तहत करीब 4,000 करोड़ रुपये और स्वैच्छिक प्रतिधारण मार्ग (वीआरआर) के जरिये 340 करोड़ रुपये की निकासी की है।
 
एफआईआई को इक्विटी और ऋण निवेश से होने वाले लाभ पर वर्तमान में 12.5 प्रतिशत की दर से दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर देना पड़ता है।
 
जुलाई, 2024 में पेश किए गए केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अधिकतर परिसंपत्तियों पर एलटीसीजी कर दर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दी थी। वहीं भारत में सूचीबद्ध शेयर पर अल्पकालिक पूंजीगत लाभ कर (एसटीसीजी) आयकर अधिनियम की धारा-111 ए के तहत 15 प्रतिशत है।
 
रुपये के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिरने के बाद अधिकारियों ने इसे संभालने के प्रयास तेज कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम एशिया संकट के कारण कच्चे तेल की आयात लागत बढ़ने के बीच लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की पिछले महीने अपील की थी।
 
घरेलू मुद्रा कई कारणों से कमजोर हो रही है, जिनमें अमेरिकी व्यापार शुल्क, विदेशी पूंजी की रिकॉर्ड निकासी और बढ़ता आयात बिल शामिल हैं, जो देश की वित्तीय स्थिति पर दबाव डाल रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक आमतौर पर डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करता है।