आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत देते हुए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के उसके अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व में ‘‘जान फूंकती है।’’
इस बेहद चर्चित मुद्दे पर अपने फैसले में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया ‘‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की संवैधानिक अनिवार्यता को आगे बढ़ाती है।’’
पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (आरपीए) की धारा 21(3) के तहत विशेष पुनरीक्षण करने का अधिकार प्राप्त है।
बिहार में एसआईआर को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का निपटारा करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाना इस बात की कानूनी घोषणा नहीं है कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है।
उच्चतम न्यायालय के इस फैसले पर राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘...उच्चतम न्यायालय ने एसआईआर प्रक्रिया को वैध और संवैधानिक करार दिया है। यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने पूरे समय एसआईआर का विरोध इसलिए किया क्योंकि वे भारतीय मतदाताओं के नहीं, बल्कि अवैध घुसपैठियों के साथ खड़े थे।’’
तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा, ‘‘बिहार एसआईआर पर उच्चतम न्यायालय का आज का फैसला निर्वाचन आयोग की अतार्किक, जल्दबाजी में की गई और भेदभावपूर्ण प्रक्रियाओं पर मुहर लगाता है, जिसके कारण बंगाल एसआईआर के बाद 27 लाख वैध मतदाता मतदान नहीं कर सके और उनका भविष्य अब भी अधर में है। न्याय होना चाहिए और न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।’’
इस मामले में वादियों में से एक चुनाव विश्लेषक और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने कहा कि वह जानबूझकर अदालत से दूर रहे क्योंकि औपचारिक फैसले से काफी पहले ही परिणाम स्पष्ट हो चुका था।