आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
अमेरिका और चीन के बीच चंद्रमा तक पहुंचने की नई होड़ शुरू हो चुकी है, लेकिन इस बार उद्देश्य केवल वहां उतरकर लौट आना नहीं, बल्कि स्थायी मानव उपस्थिति के लिए आधार तैयार करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चंद्रमा को अब ऐसी तकनीकों के परीक्षण स्थल के रूप में देखा जा रहा है, जो भविष्य में मंगल ग्रह सहित दूरस्थ अंतरिक्ष अभियानों को संभव बना सकें।
इन प्रमुख तकनीकों में से एक ‘इन-सिटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन’ (आईएसआरयू) है, जिसमें किसी स्थान पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग वहीं मानव गतिविधियों के लिए आवश्यक वस्तुएं तैयार करने में किया जाता है। इनमें ऑक्सीजन, पानी, रॉकेट ईंधन या निर्माण सामग्री शामिल हैं।
इन आवश्यक संसाधनों का उत्पादन सीधे चंद्रमा पर करने से पृथ्वी से भेजे जाने वाले माल का भार काफी कम किया जा सकेगा, जिससे अंतरिक्ष अन्वेषण की लॉजिस्टिक और वित्तीय लागत में कमी आएगी।
आईएसआरयू के जरिए ऑक्सीजन, पानी, रॉकेट ईंधन और निर्माण सामग्री जैसी आवश्यक चीजें सीधे चंद्रमा पर तैयार की जा सकती हैं। इससे पृथ्वी से भेजे जाने वाले सामान का भार और अंतरिक्ष अभियानों की लागत काफी कम हो सकती है। पृथ्वी से ये संसाधन भेजने के बजाय लक्ष्य यह सीखना है कि चंद्रमा पर कैसे रहा जाए।
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक, चंद्रमा की सतह पर मौजूद ‘रेगोलिथ’ यानी धूल और पत्थर के महीन कणों से ऑक्सीजन निकालना है। रेगोलिथ में ऑक्सीजन धात्विक ऑक्साइड के रूप में मौजूद होती है और इसकी कुल मात्रा लगभग 40 से 45 प्रतिशत तक होती है। हालांकि यह गैसीय रूप में नहीं होती, इसलिए इसे मुक्त करने के लिए ‘रासायनिक बॉन्ड’ को तोड़ना पड़ता है।
इसके लिए वैज्ञानिक ‘पायरोलिसिस’ तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसमें अत्यधिक तापमान पर पदार्थों को गर्म कर उनके रासायनिक अवयवों को अलग किया जाता है। चंद्रमा पर यह तापीय ऊर्जा सौर किरणों को दर्पणों या लेंसों की मदद से एक बिंदु पर केंद्रित कर प्राप्त की जा सकती है, जहां तापमान हजारों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चंद्रमा का वातावरण इस प्रक्रिया के लिए अनुकूल है, क्योंकि वहां लगभग निर्वात जैसी स्थिति है और वातावरण नहीं होने से सूर्य की किरणें बिना अवरोध सीधे सतह तक पहुंचती हैं। दक्षिणी ध्रुव के कुछ क्षेत्रों में लगभग 90 प्रतिशत समय तक सूर्य का प्रकाश उपलब्ध रहता है।
फ्रांस के ‘प्रोसेसेज, मैटेरियल्स एंड सोलर एनर्जी लैबोरेटरी’ (प्रोमेस-सीएनआरएस) के वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का प्रारंभिक सफल परीक्षण किया है। फ्रांसीसी पिरेनीज पर्वत क्षेत्र के ओडियोलो में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी सौर भट्टी में वैज्ञानिकों ने चंद्र मिट्टी के कृत्रिम नमूनों पर प्रयोग किए।