क्या हंसी ने इंसानों को बोलना सिखाया? शोध में मिले भाषा के विकास से जुड़े अहम संकेत

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 27-07-2026
Did laughter teach humans how to speak? Research reveals important clues to the evolution of language.
Did laughter teach humans how to speak? Research reveals important clues to the evolution of language.

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
 मनुष्य ही अकेला ऐसा जीव नहीं है जो आपस में संवाद करता हो। पक्षी साथी को आकर्षित करने के लिए गीत गाते हैं, डॉल्फिन एक-दूसरे की पहचान के लिए विशिष्ट सीटी जैसी आवाजें निकालती हैं और कई वानर प्रजातियां जटिल ध्वनियों के माध्यम से अपने सामाजिक संबंधों का समन्वय करते हैं।
 
इन संचार प्रणालियों का अध्ययन करके वैज्ञानिक उन विकासवादी चरणों को समझने की कोशिश करते हैं, जिनके परिणामस्वरूप मनुष्य की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक ‘भाषा’ का उद्गम हुआ।
 
भाषा केवल आवाज निकालने का नाम नहीं है। इसके लिए ध्वनियों पर असाधारण नियंत्रण की आवश्यकता होती है। मनुष्य के बोलने की प्रक्रिया में सांस, स्वरयंत्र में स्थित स्वर-रज्जुओं तथा जीभ, होंठ और जबड़े के बीच बेहद सटीक तालमेल जरूरी होता है।
 
मनुष्य के सबसे निकट जीव चिम्पांजी और बोनोबो का स्वर तंत्र वैज्ञानिकों की पहले की धारणा से कहीं अधिक हद तक मनुष्य जैसा है। इसके बावजूद उनमें होंठों और जीभ जैसी संरचनाओं पर वैसा सूक्ष्म और स्वैच्छिक नियंत्रण नहीं दिखता, जो मनुष्य को तेजी से लगातार बोलने और तरह-तरह की ध्वनियां निकालने में सक्षम बनाता है।
 
यहीं से एक दिलचस्प सवाल मन में आता है-आखिर हमारे पूर्वजों ने ध्वनियों पर यह असाधारण नियंत्रण कब हासिल करना शुरू किया? इसका एक संभावित साक्ष्य एक अप्रत्याशित स्रोत ‘हंसी’ से मिलता है।
 
 
हंसी का विकास
 
पिछले कई वर्षों से मैं वानर प्रजातियां की ध्वनियों की लयात्मक संरचना का अध्ययन कर रहा हूं। मेरा ध्यान इस बात पर नहीं रहा कि वे ध्वनियां क्या अर्थ व्यक्त करती हैं, बल्कि इस पर रहा कि वे पैदा कैसे होती हैं।
 
ध्वनियों की लय यह बताती है कि सांस लेने और आवाज निकालने की प्रक्रिया में किस तरह तालमेल बैठता है। इससे उन जैविक तंत्रों को समझने में मदद मिलती है, जो इन ध्वनियों का निर्माण करते हैं। चाहे मेडागास्कर के इंद्री लीमर के गीतों का अध्ययन हो या ओरंगुटान की आवाजों का, मेरे सामने बार-बार एक ही सवाल आता रहा है कि अलग-अलग वानर प्रजातियां अपनी आवाज की लय पर कितना नियंत्रण रखती हैं?