दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित फ़ोन-टैपिंग मामले में NSE की पूर्व प्रमुख चित्रा रामकृष्ण की ज़मानत बरकरार रखी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 23-09-2026
Delhi High Court upholds bail for ex-NSE chief Chitra Ramkrishna in alleged phone-tapping case
Delhi High Court upholds bail for ex-NSE chief Chitra Ramkrishna in alleged phone-tapping case

 

नई दिल्ली 
 
दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर चित्रा रामकृष्ण को निचली अदालत से मिली ज़मानत के फ़ैसले को पलटने की मांग की गई थी। यह फ़ैसला जस्टिस मधु जैन ने सुनाया। यह मामला इस आरोप से जुड़ा है कि 2009 से 2017 के बीच आठ साल की अवधि में NSE कर्मचारियों के फ़ोन कॉल गैर-कानूनी तरीके से इंटरसेप्ट (सुनने या रिकॉर्ड करने) किए गए थे।
 
जांचकर्ताओं का आरोप है कि रामकृष्ण ने एक्सचेंज के तीन अन्य वरिष्ठ अधिकारियों - पूर्व CEO रवि नारायण, एग्जीक्यूटिव वाइस-प्रेसिडेंट रवि वाराणसी और महेश हल्दीपुर (जो प्रीमाइसेस डिपार्टमेंट के प्रमुख थे) - के साथ मिलकर काम किया। CBI का कहना है कि इस समूह ने निगरानी के लिए एक बाहरी फ़र्म, iSEC सर्विसेज़ को काम पर रखा था और इस ऑपरेशन को साइबर खतरों के प्रति एक्सचेंज की कमज़ोरी के रूटीन असेसमेंट (सामान्य जांच) के तौर पर दिखाया था।
 
रामकृष्ण को शुरू में दिसंबर 2022 में ट्रायल कोर्ट ने ज़मानत पर रिहा किया था। उस फ़ैसले से असंतुष्ट होकर, CBI ज़मानत के आदेश को पलटने की कोशिश में मामला दिल्ली हाई कोर्ट ले गई थी। इससे पहले, दिल्ली हाई कोर्ट ने 9 जुलाई, 2026 को रामकृष्ण की एक याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उन्होंने प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट (PC एक्ट) के तहत "पब्लिक ड्यूटी" (सार्वजनिक कर्तव्य) और "पब्लिक सर्वेंट" (लोक सेवक) की परिभाषाओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा था कि NSE सार्वजनिक महत्व के काम करता है और इसके शीर्ष अधिकारी को उन कामों से अलग नहीं किया जा सकता।
 
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीज़न बेंच ने कहा कि NSE एक सार्वजनिक कर्तव्य निभाता है और रामकृष्ण, जो उस समय इसकी MD और CEO थीं, उन्हें एक्सचेंज द्वारा किए जाने वाले उन कामों से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता जिनमें आम जनता की बड़ी दिलचस्पी है। बेंच ने प्रिवेंशन ऑफ़ करप्शन एक्ट के तहत उन पर मुकदमा चलाने के लिए दी गई मंज़ूरी को चुनौती देने वाली रामकृष्ण की याचिका को भी खारिज कर दिया।
 
कोर्ट ने आदेश सुनाते हुए कहा, "हमने मंज़ूरी के आदेश पर आपकी दलील को खारिज कर दिया है। हमें मौजूदा याचिका में कोई दम नहीं लगा। इसे, और इसके साथ जुड़ी अर्जियों को, खारिज किया जाता है।" रामकृष्ण ने हाई कोर्ट में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की थी कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) के तहत 'सार्वजनिक कर्तव्य' (public duty) और 'लोक सेवक' (public servant) की परिभाषाएं असंवैधानिक और बहुत व्यापक हैं। उनका तर्क था कि इन परिभाषाओं के कारण NSE जैसी निजी संस्थाओं के अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार-रोधी कानून के दायरे में गलत तरीके से लाया गया। उन्होंने अपने खिलाफ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी (prosecution sanction) की वैधता पर भी सवाल उठाए थे।
 
हालांकि, हाई कोर्ट ने इन तर्कों को मानने से इनकार कर दिया, जिससे उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रहने का रास्ता साफ हो गया। यह मामला नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में कथित अनियमितताओं (जिसमें को-लोकेशन का मामला भी शामिल है) की CBI जांच से जुड़ा है। CBI का आरोप है कि देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज की प्रमुख के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान रामकृष्ण ने अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया। CBI के मामले के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) भी 'मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम' (Prevention of Money Laundering Act) के तहत इस मामले की जांच कर रहा है।